Nalanda University: पांचवी सदी में जब नालंदा विश्वविद्यालय की शुरुआत हुई थी, तब ये शायद किसी को नहीं पता था कि वो विद्यालय न केवल बौद्ध धर्म का प्रमुख गढ़ बनेगा बल्कि दुनियाभर के छात्रों की पहली पसंद भी बनेगा। इतिहासकारों की माने तो नालंदा में करीब 10 हजार छात्र पढ़ा करते थे, जो दुनिया के कोने कोने से आये थे, वहीं करीब 2000 शिक्षक भी थे, जो अपने ज्ञान को छात्रों में बांटा करते थे, नालंदा विश्वविद्यालय का इतना नाम होने के पीछे इसका कड़ा अनुशासन था, जिसे हर किसी को फॉलो करना होता था।
आज जिस तरह से बड़े यूनीवर्सिटी में एडमिशन लेने के लिए एट्रंस इग्जाम से होकर गुजरना पड़ता है… ठीक वैसे ही नालंदा में प्रवेश करने के लिए छात्रो को तीन अलग अलग परिक्षाओं से गुजरना पड़ता था, जिसे खुद द्वारा पंडित लिया करते थे, जो कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय से भी कठिन हुआ करता था। कहा जाता है कि ये टेस्ट इतने कठिन होते थे कि अगर 100 छात्र टेस्ट देने आते थे तो केवल 20 ही द्वारा पंडित का परिक्षा में पास हो पाते थे, बाकियो को वापिस लौटना पड़ता था। अपने इस लेख में हम नालंदा में प्रवेश करने के लिए द्वार पंडितो के किन टेस्ट से होकर गुजरना पड़ता था उसके बारे में बात करेंगें।
विक्रमशिला के द्वार टेस्ट के बारे में
नालंदा से पहले विक्रमशिला विश्वविद्यालय के बारे में जानना जरूरी है, जिसे विक्रमशिला महाविहार के नाम से जाना जाता है। एक समय के नालंदा विश्वविद्यालय से भी प्रचलित था विक्रमशिला विश्वविद्यालय। जबकि जहां नालंदा को पांचवीं शताब्दी में स्थापित किया गया था वहीं बिहार के ही भागलपुर में आठवीं सदी में पाल राजा धर्म पाल ने स्थापित किया था जो कि बौद्ध धर्म को मानने वाले जो तंत्र शास्त्र सीखना चाहते थे उनका प्रमुख केंद्र था।
ये एक ऐसा विश्वविद्यालय था जिसके नियम नालंदा से भी ज्यादा कड़े थे, और तंत्र शास्त्र को प्राथमिकता देने के कारण नालंदा से ज्यादा प्रचलित हुआ था। दोनों ही विश्वविद्यालयों में प्रवेश करने के नियम लगभग एक समान ही होते थे। लेकिन विक्रमशिला के स्थापित होने बाद नालंदा नौवीं शताब्दी में ज्यादा प्रचलित हुआ था।
नालंदा ने कैसे किया जाता था प्रवेश
नालंदा में केवल अति मेधावी छात्रों को ही प्रवेश मिल पाता था, जैसा कि अभी आप उसे यूपीएससी के एग्जाम से कंपेयर कर सकते है। पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। सबसे पहले नालंदा आने वाले छात्रों को द्वारा पंडित के सामने परीक्षा देनी पड़ती थी। इसमें द्वार पंडित दार्शनिक और अकादमिक ज्ञान से जुड़े बेहद कठिन प्रश्न पूछते थे। जो कि उनके पूरे जीवन, उनके चरित्र का आधार होता है। द्वार पंडित इस बात का पूरा खयाल रखते थे कि नालंदा में प्रवेश करने वाला छात्र न केवल मेधावी और ज्ञानी हो, बल्कि वो चरित्र में भी निपुण और दृढ़ संकल्पी हो।
विद्यार्थी की तर्कशक्ति और समझ
चुकी नालंदा एक ऐसी यूनिवर्सिटी थी जहां केवल पुरुषों को ही प्रवेश मिलता था। इसीलिए उनके ज्ञानी होने के साथ-साथ चरित्रवान होना अनिवार्य था। प्रवेश द्वारा को केवल 20 प्रतिशत छात्र ही पास कर पाते थे, जिसके बाद द्वारा से अंदर जाने के बाद दो और टेस्ट होते थे। जिसमें विद्यार्थी की तर्कशक्ति और समझ का भी परीक्षण होता था। चूंकि नालंदा बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र था इसी लिए यहां बौद्ध धर्म, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष और चिकित्साशास्त्र के साथ-साथ वेद और सांख्य की शिक्षा दी जाती थी।
नालंदा में 24घंटे शिक्षा दी जाती
साथ ही खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए पूरा अलग विभाग था और इस लिए केवल भारत से ही नहीं बल्कि दुनिया भर के कई देश, कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी छात्र यहां पढ़ने के लिए आते थे। इसीलिए केवल bestest स्टूडेंट्स को ही सेलेक्ट किया जाता था। जिसकी जिम्मेदारी द्वारा पंडित के कंधों पर होती थी। नालंदा में आने वाले छात्र यहीं रहते थे और सभी का खर्च नालंदा समिति ही देखती थी। विश्वविद्यालय में आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान द्वारा शिक्षा देने पर विशेष ध्यान देते थे। यहां रहने वाले छात्रो के लिए करीब 300 कमरें थे, छात्र यहां रहते, और शिक्षा ग्रहण करते थे। कहा जाता है कि नालंदा में 24घंटे शिक्षा दी जाती थी, यानि की कभी भी कोई छात्र अपना अध्ययन कर सकता था, और अपने शिक्षको से शंका का समाधान कर सकता था।
चीनी छात्रा ह्वेनसांग 16 सालों तक नालंदा में रहा
यहां आने वाले छात्रों को बाहरी किसी भी परेशानी से दूर रखा जाता था, ताकि वो केवल शिक्षा पर ध्यान दे सकें… यहां से निकले छात्र महान बनेंगे ऐसा माना जाता था। चीनी छात्रा ह्वेनसांग एक सबसे सटीक उदाहरण भी है, जिसके बारे में आज भी पढ़ा और चर्चा की जाती है। जो करीब 16 सालों तक नालंदा में रहा था। नालंदा अपने शिक्षको और छात्रों दोनो को संपूर्ण सम्मान देता था। वहां के प्रगाढ़ शिक्षको के नाम बाहर द्वारा पर सफेद पत्थरों पर लिखे जाते थे, ताकि सभी उनसे प्रेरणा ले सकें।
चुंकि बौद्ध धर्म को मान्यता ज्यादा थी, इसलिए बिना किसी भेदभाव के छात्र एक साथ रहते थे। जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी। नालंदा आज भले ही पूरी तरह से एक खंडहर बन चुका है, लेकिन उसके नियमों और उसकी शिक्षाओं का बखान आज भी होता है, जो भारत के लिए गर्व की बात है। आप नालंदा को लेकर क्या सोचते है, क्या नालंदा आज होती तो उसका स्तर कैसा होता, हमें कमेंट करके जरूर बतायें।



