Buddhist nuns: छत्तीसगढ़ के तुरतुरिया में है बौद्ध धर्म का अनोखा केंद्र, जानें भिक्षुणी विहार का इतिहास

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Buddhist nuns: एक ओर जहां मनुवादियों ने शुरु से ही महिलाओं को गुलाम माना…मनुस्मृति की आड़ में उनका शोषण किया, उन्हें घूंघट में रखा और घर से बाहर निकलने नहीं दिया…वहीं, दूसरी ओर उसी दौर में भगवान बुद्ध ने महिलाओं के उत्थान की कहानी लिखी. जब मनुवादी समाज में हिंदू महिलाओं का शोषण हो रहा था, उस समय भगवान बुद्ध बौद्ध महिलाओं के लिए नई दुनिया तैयार कर रहे थे. जी हां, शुरु में तो बौद्ध धर्म में महिलाओं को भिक्षु बनने की मनाही थी लेकिन भगवान बुद्ध की मां ही पहली भिक्षुणी बनी थीं. आज के समय में भारत में बौद्ध भिक्षुणियों का मठ भी है, जहां काफी बड़ी संख्या में बौद्ध महिलाएं रहती हैं…

बौद्ध धर्म की महायान परंपरा

दरअसल, जब भगवान बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की थी तो पहले उन्होंने इसे केवल पुरुषों के लिए ही स्थापित किया था. भारत में बौद्ध धर्म की महायान परंपरा को फॉलो किया जाता है. यानी जो बौद्ध धर्म अपनायेगा, उसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा, उसे मठो में रहना होगा और भिक्षु बन कर रहना होगा. महायान परंपरा को फॉलो करने वाले भिक्षुओं को बौद्ध धर्म में तय किये गए सारे नियमों को मानना होता है. ऐसा जीवन जीना महिलाओं के लिए आसान नहीं था और यही कारण था कि भगवान बुद्ध ने केवल पुरुषों को ही भिक्षु बनने की सलाह दी.

प्रजापति गौतमी पहली बौद्ध भिक्षुणी बनी

लेकिन जैसे-जैसे भगवान बुद्ध की महिमा का विस्तार हुआ, वैसे ही पुरुषों के साथ साथ महिलाएं भी इससे जुड़ने लगी. हालांकि, भगवान बुद्ध ने कभी भी स्त्रियों को भिक्षुणी बनने की आज्ञा नहीं दी. लेकिन बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद जब भगवान बुद्ध पहली बार जब अपने पिता की नगरी कपिलवस्तु पहुंचे तो उनकी मौसी प्रजापति गौतमी उनसे सबसे ज्यादा प्रभावित हुई. और प्रजापति गौतमी पहली महिला बनीं, जिन्होंने भगवान बुद्ध के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया. उन्होंने भगवान बुद्ध से अनुरोध किया कि वो उन्हें दीक्षा दें लेकिन बुद्ध नहीं मानें.

अपने प्रिय शिष्य के हस्तक्षेप और प्रजापति गौतमी की करुण प्रार्थना के बाद आखिरकार भगवान बुद्ध को अपना ही बनाया नियम तोड़ना पड़ा. और बौद्ध मठों में तो नहीं लेकिन विहारो में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी. और इस तरह से प्रजापति गौतमी पहली बौद्ध भिक्षुणी बन गईं. इसी कड़ी में बौद्ध धर्म की सबसे प्रसिद्ध भिक्षुणी आम्रपाली भी भगवान बुद्ध के रास्ते पर चल कर भिक्षुणी बन गई थी.

महिलाओं को आज भी बौद्ध मठों में जाने की अनुमति नहीं

ध्यान देने वाली बात है कि महिलाओं को आज भी बौद्ध मठों में जाने की अनुमति नहीं है. जो महिलाएं बौद्ध भिक्षुणी बनीं उनके रहने के लिए विशेष स्थान तय किया गया. भारत में ऐसा एक ही स्थान है, जहां सिर्फ बौद्ध भिक्षुणी ही नहीं बल्कि शैव परंपरा और वैष्णव परंपरा की महिला साध्वी भी रहती हैं. यह स्थान है छत्तीसगढ़ के रायपुर के बलौदा बाजार जिले का ग्राम तुरतुरिया. हालांकि, तुरतुरिया गांव रामकथा के पौराणिक आख्यानों को फॉलो करने के लिए जाना जाता है लेकिन यह भारत का इकलौता बौद्ध महिला विहार भी है. यहां हर कार्य महिलाएं ही करती हैं. पूजा-पाठ से लेकर अनुष्ठान तक, यहां सब कुछ महिलाएं करती हैं.

आपको बता दें कि तुरतुरिया के अलावा भी पहले कई महिला बौद्ध विहार हुए लेकिन उनके बारे में पुख्ता प्रमाण नहीं हैं…लेकिन तुरतुरिया में बौद्ध भिक्षुणी के प्रभावशाली होने के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं. इस स्थान पर बौद्ध धर्म से जुड़े अनगिनत अवशेष मौजूद हैं. किसी समय में यहां ईंटो से बना स्तूप भी थी लेकिन अब वह ध्वस्त हो चुका है. चीनी यात्री व्हेनसांग ने अपनी यात्रा के वर्णन में तुरतुरिया के बारे में भी लिखा है. उनके अनुसार, उस दौर में तुरतुरिया से कुछ दूरी पर सिरपुर नाम की जगह थी, जहां 100 से भी ज्यादा बौद्ध मठ मौजूद थे और 10 हजार से भी ज्यादा बौद्ध वहां शिक्षा ग्रहण करते थे. तुरतुरिया मौजूदा समय में भी महिला मौद्ध भिक्षुणियों का एकमात्र विहार है, जहां महिलाएं अपने अनुसार रहती हैं.

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