डॉ. बी.आर. अंबेडकर क्यों चाहते थे बेटी? जानें क्यों अधूरा रह गया यह सपना

Baba Sahib.
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Ambedkar Wanted a Daughter:  बाबा साहेब अंबेडकर जब तक जिंदा रहे हमेशा दूसरों के लिए जीते रहे…सड़क से लेकर सरकार तक हर स्तर पर उन्होंने पिछड़ों की लड़ाई लड़ी..जमकर संघर्ष किया…कई आंदोलन चलाए और संविधान में आरक्षण का अधिकार देकर पिछड़ों को सशक्त करने का काम किया…लेकिन इन सब के चक्कर में वो अपनी जिंदगी जीना ही भूल गए…पढ़ाई और आंदोलन के चक्कर में हमेशा परिवार से दूर रहे अंबेडकर के अपने भी कई सपने थे, जो कभी पूरे नहीं हो पाए…उनके इन्हीं सपनों में से एक सपना यह था कि वो एक बेटी के पिता बनना चाहते थे लेकिन उनका यह सपना भी कभी पूरा नहीं हो पाया.

बाबा साहेब की पहली पत्नी रमाबाई

दरअसल, 1935 में बाबा साहेब की पहली पत्नी रमाबाई की मृत्यु हो गई. बाबा साहेब अंबेडकर और रमाबाई के 5 बच्चे हुए, जिनमें से 4 बच्चों की मौत बचपन में ही हो गई थी..अकेले यशवंत अंबेडकर ही जीवित बच पाए थे. रमाबाई की मृत्यु के बाद बाबा साहेब का दुनिया से मोहभंग हो गया था…वह पूरी तरह से टूट गए थे. रिपोर्ट्स बताती हैं कि भगवा धारण कर कुछ समय के लिए वो साधु भी बन गए थे…लेकिन फिर से दलित समाज की जिम्मेदारियों ने उन्हें रणभूमि में उतरने पर मजबूर कर दिया. रमाबाई की मृत्यु के बाद बाबा साहेब का हेल्थ भी काफी तेजी से गिरने लगा…वहीं, सामाजिक कार्यों में उलझे रहने के कारण यशवंत अंबेडकर से बढ़ती दूरी गृह कलेश का कारण बन गई.

बाबा साहेब के साथ सविता का 8 साल का सफ़र 

यशवंत को लगने लगा था कि बाबा साहेब उन्हें अनदेखा कर रहे हैं…जबकि ऐसा नहीं था…इसी दौर में ईलाज के दौरान इनकी मुलाकात सविता अंबेडकर से हुई और कुछ सालों बाद इन दोनों ने शादी कर ली. शादी के बाद सविता मात्र 8 सालों तक ही बाबा साहेब के साथ रह पाईं और डॉ अंबेडकर से हुई मुलाकात से लेकर उनकी मृत्यु तक को इन्होंने अपनी आत्मकथा Babasaheb: My Life with Dr. Ambedkar में काफी खूबसूरती से पिरोया है.

अपनी इसी पुस्तक में उन्होंने बाबा साहेब की जिंदगी से जुड़े उन पहलुओं की भी चर्चा की है, जिससे सालों तक दुनिया अनजान रही…इस पुस्तक में उन्होंने बाबा साहेब से मुलाकात, उनसे शादी और उनके अधूरे ख्वाबों के बारे में बात की है…सविता अंबेडकर की यह आत्मकथा मराठी भाषा में है, जिसका इंग्लिश अनुवाद नदीम खान ने किया.

अपनी इस पुस्तक में सविता अंबेडकर ने डॉ अंबेडकर से अपनी पहली मुलाकात का जिक्र किया है…सविता बताती हैं कि बाबा साहेब के एक पुराने मित्र राव साहब की बेटियों से उनकी अच्छी दोस्ती थी और राव साहेब के यहां ही उनकी मुलाकात बाबा साहेब अंबेडकर से हुई थी.

बाबा साहेब का ख़राब स्वास्थ्य 

1942 में बाबा साहेब वायसराय के यहां कानून मंत्री के रूप में कार्यरत थे और दिल्ली में रहते थे. लेकिन जब वो मुंबई आते तो राव साहेब से मुलाकात जरुर करते. 1947 में राव साहेब ने ही इनदोनों की मुलाकात कराई थी. इसके बाद इन दोनों की कई बार मुलाकात हुई और सविता बाबा साहेब अंबेडकर के व्यक्तित्व से प्रभावित होती चली गईं…आजादी के बाद के वर्षों में बाबा साहेब का स्वास्थ्य ज्यादा खराब हुआ और इस समय में उन्हें कोई ऐसा चाहिए था,

जो हर वक्त उनके साथ रह सके और उनकी देख भाल कर सके. दूसरी ओर सवित अंबेडकर पेशे से डॉक्टर थीं और ब्राह्मण समुदाय से आती थीं. ऐसे में एक दिन बाबा साहेब ने उन्हें शादी के लिए प्रोपोज कर दिया और 15 अप्रैल 1948 को दोनों ने शादी कर ली… 39 साल की उम्र में सविता ने 57 साल के बाबा साहेब से शादी कर ली और दिल्ली में ही बाबा साहेब के साथ रहने लगीं.

बेटी के पिता बनने की थी बाबा साहेब की इच्छा

बाबा साहेब की यह शादी उनके बेटे यशवंत अंबेडकर को नामंजूर थी और उन्होंने इसका विरोध भी जताया. दोनों के बीच में दूरी पहले सी ही थी और इस शादी ने उस दूरी को बढ़ाने का काम किया था…अपनी किताब में सविता आगे बताती हैं कि बाबा साहेब की इच्छा थी कि वो एक बेटी के पिता बनें. जिसके लिए सविता ने उनकी बहन की बेटी को गोद लेने का प्रस्ताव भी रखा था लेकिन बाबा साहब जैविक रूप से अपनी संतान चाहते थे. सविता एक बार गर्भवती भी हुई थी. इन्हें लगने लगा था कि उनका ये सपना पूरा हो जाएगा लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था.

सविता और बाबा साहेब 1953 में जम्मू कश्मीर गए थे, जहां उन्हें शेख अब्दुल्ला ने डिनर के लिए आमंत्रित किया था… इस मुलाकात के दौरान सविता अंबेडकर की तबीयत बिगड़ने लगी और और उन्हें तुरंत स्पेशल प्लेन से दिल्ली लाया गया, जहां अस्पताल मं इलाज के दौरान उनका गर्भपात हो गया. इस घटना से बाबा साहेब और सविता दोनों काफी टूट गए थे और दोनों माता-पिता बनते बनते रह गए थे…

बाबा साहेब का एक बेटी का पिता बनने का सपना कभी भी पूरा नहीं हुआ… 1956 में उन्होंने अपनी पत्नी और करीब 4 लाख पिछड़े लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था और इसी साल में उनकी मृत्यु भी हो गई…देश और समाज की लड़ाई लड़ने वाले महान डॉ अंबेडकर अपने इस सपने से हार गए थे…और इसका मलाल जीते-जी उन्हें हमेशा रहा.

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