जातिवाद की आंच में झुलसता समाज, यूजीसी कानून के समर्थन में चंदौली की सड़कों पर आक्रोश

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Chandauli news: जातिगत भेदभाव की चिंगारी आज इतनी तीव्र हो चुकी है कि वह आग बनकर देशभर में धधक रही है। डर है कि कहीं इस आग की लपटों में हमारा साझा सामाजिक ताना-बाना जलकर खाक न हो जाए। इतिहास की राख में दबी जातिवाद की यह चिंगारी आज एक ऐसी ज्वाला बन चुकी है, जो समाज की एकता को भस्म करने पर उतारू है।

यदि समय रहते न्याय और समानता की फुहारों से इसे शांत नहीं किया गया, तो आने वाली नस्लों के पास विरासत में केवल राख ही बचेगी। चंदौली की सड़कों पर उतरा जनसैलाब इसी सुलगते हुए सच की एक झलक है, जहां यूजीसी कानून को लेकर हुआ प्रदर्शन यह बताने के लिए काफी है कि समाज में असंतोष की खाई कितनी गहरी हो चुकी है।

जानें क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिला मुख्यालय पर गुरुवार को विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने यूजीसी कानून लागू (यूजीसी (इक्विटी) नियमावली) कराने की मांग को लेकर प्रदर्शन और जुलूस निकाला। इस प्रदर्शन में इंकलाबी नौजवान सभा, भीम आर्मी, जन अधिकार पार्टी और अपनी जनता पार्टी के कार्यकर्ता शामिल हुए प्रदर्शनकारियों का कहना था कि महाविद्यालयों में दलित और ओबीसी वर्ग के छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए यूजीसी कानून लाया गया था।

लेकिन विरोध के चलते इसे लागू करने में देरी हुई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बताया जा रहा है कि चंदौली में हुआ यह प्रदर्शन विशेष रूप से उन संगठनों का जवाबी विरोध था जो इस कानून को काला कानून बता रहे थे, उनका तर्क है कि अदालत द्वारा दोबारा समीक्षा के बाद कानून लागू करने का फैसला लिया गया है, इसलिए सरकार को इसे जल्द प्रभावी रूप से लागू करना चाहिए।

बढ़ते भेदभाव के मामलों पर चिंता

प्रदर्शन के दौरान विभिन्न संगठनों के नेताओं ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसरों में जातीय भेदभाव और उत्पीड़न के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। हाल ही में सरकार की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि भेदभाव और उत्पीड़न के मामलों में 118 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उच्च शिक्षण संस्थानों में सुरक्षित और समान वातावरण सुनिश्चित नहीं किया गया, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा होगा।

रोहित वेमुला का मामला बताया उदाहरण

प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने रोहित वेमुला समेत अन्य छात्रों के साथ हुई घटनाओं को भेदभाव का उदाहरण बताया। उनका कहना था कि दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों का कॉलेजों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने से उनके साथ लिंग, नस्ल और क्षेत्रवाद के आधार पर भेदभाव की संभावना बनी रहती है।

यूजीसी नियमों को और प्रभावी बनाने की मांग

प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मांग की कि यूजीसी रेगुलेशन को अधिक जवाबदेह और प्रभावी बनाया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि इसमें चुने हुए छात्र प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों को भी शामिल किया जाए, ताकि जातिगत उत्पीड़न के मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

इस मौके पर ठाकुर प्रसाद, अर्जुन प्रसाद आर्य, उमेश भारती और श्रवण कुशवाहा सहित कई लोग मौजूद रहे। कुल मिलाकर चंदौली में हुआ यह प्रदर्शन उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और भेदभावमुक्त माहौल की मांग को लेकर उठ रही आवाजों को दर्शाता है।

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