BNS Section 289: सावधान! मशीन की खराब वायरिंग पड़ सकती है भारी, मालिक को हो सकती है जेल

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289 BNS in Hindi:  भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 289 भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 289 औद्योगिक और कार्यस्थल सुरक्षा के नज़रिए से एक बड़ा बदलाव है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (BNS) में इसके के बारे में क्या कहा गया है।

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धारा 289 क्या कहती है? BNS Section 289 in Hindi

जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस (BNS) की धारा 289 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 289..यह सेक्शन खास तौर पर मशीनरी से जुड़े लापरवाही वाले बर्ताव से संबंधित है।

अगर कोई व्यक्ति मशीनरी (Machinery) के संबंध में इस तरह से लापरवाही करता है जिससे इंसानी जान खतरे में पड़ती है या किसी दूसरे व्यक्ति को चोट लगती है, तो अपराधी को सज़ा दी जा सकती है। इसमें ऐसे मामले भी शामिल हैं जहां मशीनरी का मालिक या कब्ज़ेदार उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी सावधानियां बरतने में नाकाम रहता है।

BNS 289 Important Points

  • यह पहले IPC की धारा 289 (जानवरों से संबंधित) थी, जिसे अब बदलकर BNS की धारा 289 कर दिया गया है, जो मशीनरी पर केंद्रित है।
  • यह धारा उन जगहों, कंस्ट्रक्शन साइट्स और फैक्ट्रियों में सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को सख्ती से लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। जहाँ कोई बड़ी दुर्घटना और चोट लगाने की संभावना हो।

बीएनएस धारा 289 का उदहारण 

For Example: यह सेक्शन ऐसे फैक्ट्री मालिक पर लागू हो सकता है जो खराब वायरिंग वाली मशीन को बिना ठीक किए चलाता है, अगर इससे कर्मचारियों को बिजली का झटका लगता है, जिससे उनकी जान को खतरा हो सकता है। इसलिए, यह सेक्शन उस पर लागू हो सकता है।

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बीएनएस धारा 289 की और सजा

इसके अतिरिक्त, बीएनएस (BNS) की धारा 289 के तहत, यदि किसी व्यक्ति को दोषी (Guilty) ठहराया जाता है, तो उसके लिए सजा निर्धारित की गई है। यह तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति लापरवाही से ऐसा कुछ करता है जिससे बीमारी फैलने, या चोट लगाने की संभावना हो। इस सेक्शन के तहत, 6 महीने तक का साधारण कारावास (Simple imprisonment) और अपराधी को 2000 हजार रुपये जुर्माना लगाया जाता हैं। इसके अलवा आपको बता दें, यह एक गैर-संज्ञेय (non-cognizable) अपराध है, इसलिए पुलिस को जाँच के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति चाहिए होती है।

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