Dr. Ambedkar on Bhagavad Gita: आखिर क्यों बाबा साहब ने गीता को नकारा था, क्यों नहीं था उन्हें गीता पर विश्वास?

Dr. Ambedkar on Bhagavad Gita
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Dr. Ambedkar on Bhagavad Gita: बाबा साहब अंबेडकर जब कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे, तब उन्होंने करीब 20 हजार किताबों का सग्रहण किया था क्योंकि बाबा साहब ये मानते थे कि किताबें ही उनके हर सवाल का जवाब दे सकती है, हर तर्क वितर्क किताबों के ज्ञान पर निर्धारित होता है, इसिलए वो जितना ज्यादा हो किताबों को पढ़ कर ज्ञान को अर्जित करने की कोशिश करते थे, ये उनकी किताबों के प्रति लगाव की ही देन रही कि उनके पास 32 डिग्रिया थी, दो पीएचडी होल्डर थे, मगर बावजूद इसके उन्होंने हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ गीता को मानने से इंकार कर दिया था।

बाबा साहब गीता को अंधविश्वास को बढ़ावा देना वाला कहते थे, जो तर्क के आधारों पर नहीं बल्कि अंधविश्वास के आधार पर विश्लेषण करना सिखाता है। अपने इस लेख में हम जानने की कोशिश करेंगे कि जिस गीता को आज दुनिया भर में मान्यता मिल रही है, लोग उसे फॉलो कर रहे है, उसकी पवित्र भगवत गीता को आखिर बाबा साहब ने मानने से इंकार क्यों कर दिया था।

हिंदू धर्म से विरक्ति

बाबा साहब खुद एक हिंदू थे, लेकिन उन्होंने वर्ण परंपरा और उसके आधार पर लोगो का बंटवारा करके उनके साथ भेदभाव करने की पद्दति की हमेशा अवहेलना की है। हालांकि अपनी तरफ से उन्होंने पूरी कोशिश की कि वो हिंदू धर्म में फैले जातिवाद की कुरिती से लड़ाई लड़े और इस कुरीति को खत्म कर सकें, लेकिन जो परंपरा औऱ नीतियों सदियों से लोगो के खून का, उनकी सोच का हिस्सा बन गई हो, उनके अंदर से प्राण निकलना आसान होगा, लेकिन जातिवादी, ब्राह्मणवादी मानसिकता नहीं..

बस फिर क्या था बाबा साहब समझ चुके थे कि हिंदू धर्म से न तो कभी जातिवाद जा सकता है औऱ न ही वर्ण विचार, ये ही कारण था कि वो अपनी मृत्यु से पहले बौद्ध बन गए थे, लेकिन ये भी कहीं हद तक सच है कि हिंदू धर्म के धार्मिक ग्रंथ भी इस भेदभाव के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार थे, जिसमें बाबा साहब ने गीता को भी जिम्मेदार माना।

गीता को लेकर बाबा साहब की सोच

बाबा साहब ने अपनी लिखी एक किताब प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति में गीता को लेकर कई बातें लिखी है। बाबा साहब का मानना था कि गीता दरअसल एक ऐसा ग्रंथ है जो वर्ण व्यवस्था को समर्थन करने के साथ साथ समाजिक असमानता, और जाति व्यवस्था का समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि गीता में वैश्य और शूद्रों को हीन और नीचा माना गया है। गीता असल में समाज को बांटने वाला ग्रंथ है। गीता के अध्याय 4 के 13वे श्लोक और अध्याय 9 के 32वें श्लोक में चार वर्णो की व्यवस्था को न्याय संगत और उचित करार देते हुए शूद्रो की अवहेलना बताई गई है। वर्ण व्यवस्था को ईश्वर की बनाई नीति कहा गया है।

गीता समाज सुधार को रोकने वाला ग्रंथ

बाबा साहब कहते थे गीता असल में कोई दार्शनिक ग्रंथ नहीं बल्कि अन्याय को बढ़ावा देने वाला ग्रंथ है, जो बाकि के तीनों वर्णों द्वारा किये गए अन्याय को उचित मानता है। गीता असल में समाज सुधार की कोशिश को रोकने वाला ग्रंथ है।      वहीं बाबा साहब मानते है कि गीता में हिंसा और युद्ध को धर्म बताया गया है, जबकि जब भी आप किसी पर भरोसा करते है तो वो तर्क के आधार पर होना चाहिए न कि अंधविश्वास के आधार पर। गीता को मानने वाले अक्सर तर्क पर अंदविश्वास के आधार पर चल रहे है। धर्म और हिंसा एक साथ कभी नहीं हो सकती है। युद्ध केवल तकलीफ और दूरी बढ़ाता है जबकि गीता में युद्ध को सही ठहराया गया है।

वर्ण व्यवस्था और ब्राह्मणवादी सोच

बाबा साहब ने कहा कि उन्हें गीता एक तऱफा ग्रंथ लगती है जो वर्ण व्यवस्था को ब्राह्मणवादी सोच के आधार पर चलने के लिए कह रही है। बाबा साहब इसीलिए कभी भी गीता के विचारों से सहमत नहीं हुए। हालांकि उन्होंने ये कभी नहीं कहा कि गीता को नहीं मानना चाहिए, लेकिन कोई व्यक्ति उसे किस तरह से मान रहा है वो जरूरी है। किसी भी किताब या ग्रंथ को मानने की नीव तर्क के आधार पर होनी चाहिए। जब तक आप तर्क नहीं करेंगे, तब तक पीढ़ी दर पीढ़ी ये कुरीतियां चलती ही रहेगी।

सामाजिक और राजनैतिक दस्तावेज

बाबा साहब ने ये भी तर्क दिया था कि आज की गीता असल में तब इस रूप में आई जब बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा होगा। क्योंकि ब्राह्मणों ने चाल के तहत बौद्ध धर्म को दबाने और अपना वर्चस्व फिर से कायम करने के लिए गीता को ये रूप दिया गया होगा। बाबा साहब ने गीता को मात्र के सामाजिक और राजनैतिक दस्तावेज माना था.. जो असमानता को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया होगा, क्योंकि बौद्ध धर्म समानता और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, वहीं गीता की बातों को फैला कर लोगो में अंधविश्वास पैदा करने का काम किया गया होगा, जो आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है।

गीता समाजिग असमानता को बढ़ावा देती है, जिससे पिछड़ो शूद्रों के शोषण को न्याय संगत करार दे दिया जाता है, और यहीं कारण रहा कि बाबा साहब ने गीता के विचारों को मानने से इंकार किया था और कभी भी गीता पर विश्वास नहीं किया। वैसे अब तक आप गीता को लेकर क्या सोचते थे, और बाबा साहब के इन तर्कों से आपकी सोच में क्या बदलवान है।

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