Karnataka news: तकनीक के दौर में भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंच चुका है, लेकिन विडंबना देखिए कि समाज के एक वर्ग की सोच आज भी सदियों पीछे जकड़ी हुई है। दिलों की दूरियां और जातिवाद की दीवारें आज भी इतनी ऊंची हैं कि एक तरफ जहां हम आधुनिकता के शिखर को छू रहे हैं और दुनिया AI व स्पेस की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जातिगत भेदभाव और मनुवादी मानसिकता की बेड़ियां हमारे समाज को आगे बढ़ने से रोक रही हैं। कर्नाटक के गदग जिले के शिंगातलूर गांव की घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वाकई आधुनिक हुए हैं? यह आधुनिक भारत की एक कड़वी सच्चाई है कि आज भी दलितों को बाल कटवाने जैसे बुनियादी हक के लिए सरकार का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।
जानें क्या है पूरा मामला?
कर्नाटक के गडग जिले के शिंगातलूर गांव में सालों से चली आ रही एक भेदभावपूर्ण परंपरा अब खत्म हो गई है। यहां दलित समुदाय के लोगों को एक खास समय पर बाल कटवाने की सेवा नहीं दी जाती थी। इस वजह से उन्हें मजबूरी में पड़ोसी गांवों में जाकर बाल कटवाने पड़ते थे, जिससे समय और पैसे दोनों की परेशानी उठानी पड़ती थी
अंधविश्वास की जड़ें
सामाजिक कल्याण विभाग के अनुसार बताया जा रहा है कि इस भेदभाव के पीछे एक गहरा अंधविश्वास था। गांव में यह मान्यता प्रचलित थी कि महानवमी के दौरान भगवान वीरभद्रेश्वर स्वामी हडपदा (नाई) समुदाय के घरों में निवास करते हैं। लोगों का मानना था कि इस पवित्र अवधि के दौरान यदि दलितों के बाल काटे गए, तो देवता नाराज हो जाएंगे और गांव पर कोई बड़ा दुर्भाग्य या प्राकृतिक विपत्ति आ जाएगी। इस सोच की वजह से कुछ लोगों ने दलितों को बाल कटवाने की सेवा देना बंद कर दिया था। धीरे-धीरे यह सामाजिक भेदभाव का रूप ले चुका था।
प्रशासन का कड़ा रुख
जब यह मामला अधिकारियों तक पहुंचा, तो जिला प्रशासन और समाज कल्याण विभाग ने गांव का दौरा किया। ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की गई, लेकिन जब रूढ़िवादी सोच नहीं बदली, तो सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए गांव में एक ‘सरकारी सैलून’ शुरू करने का निर्णय लिया। प्रशासन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अब भी किसी ने भेदभाव किया, तो उनके खिलाफ SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
यह सैलून सामाजिक कल्याण विभाग, तालुक प्रशासन, तालुक पंचायत, दलित संगठनों और शिवशरणा हडपदा अप्पन्ना समुदाय की संयुक्त पहल से शुरू किया गया है। तिप्पापुर गांव के बसवराज हडपदा को इस सैलून का संचालन सौंपा गया है।
सामाजिक समरसता की दिशा में कदम
समाज कल्याण विभाग द्वारा मिली जानकारी के मुताबिक, यह पहल ‘अस्पृश्यता उन्मूलन जागरूकता’ और ‘सामंजस्यपूर्ण जीवन कार्यक्रम’ का एक हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल बाल काटने की सुविधा देना नहीं, बल्कि गांव में व्याप्त ऊंच-नीच की खाई को पाटकर सामाजिक सद्भाव (Social Harmony) स्थापित करना है। नए सैलून का उद्घाटन स्थानीय अधिकारियों और ग्रामीणों की मौजूदगी में एक उत्सव की तरह किया गया।
यह कदम यह सुनिश्चित करता है कि भारत के संविधान द्वारा दिया गया ‘समानता का अधिकार’ केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर भी उतरता दिखे। इसे शिंगातलूर गांव में सामाजिक समरसता की दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव माना जा रहा है।अब उम्मीद की जा रही है कि इस पहल से न सिर्फ भेदभाव खत्म होगा, बल्कि गांव में आपसी भाईचारा भी मजबूत होगा।



