Top 5 Dalit news: अगर कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ही खुलेआम दलितों और पिछड़ो को सार्वजनिक रूप से अपमानित करता है तो फिर भला वैसे लोगो को क्या संवैधानिक पद पर बैठने का अधिकार है… जिस समाज में दलित को सबसे बड़ा वोटबैंक माना जाता है, वहीं समाज मतलब निकलने पर उन्हें अछूत कह कर उनसे पल्ला झाड़ लेता है। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितों के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में बताते है, जो इस वक्त सोशल मीडिया पर सुर्खियों में छाई हुई है।
अनिल मिश्रा ने फिर किया बाबा साहब को अपमानित
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला मध्य प्रदेश के ग्वालियर से है जहां एक बार फिर से मनुवादी मानसिकता वाले विवादित वकील अनिल मिश्रा के बल बाबा साहब को लेकर बिगड़ गए हैं एक के बाद एक बाबा साहब के लिए अपमानित शब्दों का इस्तेमाल करने के बाद अब उसने भरे मंच पर बाबा साहब अंबेडकर का नाम लेना भी आसम्मानित बताया है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है जिसमें उसने खुले तौर पर कहा कि वो आंबेडकर नाम नहीं लेगा क्योंकि वो बहुत असम्मानित है। हैरानी की बात है कि अभी कुछ दिन पहले जब खुद जेल की हवा खा रहा था तब इसी के लोग मीडिया के सामने सीख कर कह रहे थे कि उन्हें अंबेडकर के संविधान पर पूरा भरोसा है।
अनिल मिश्रा को संवैधानिक तरीके से न्याय मिलेगा, वो जेल से रिहा हो जाएगा। और अब रिहा होने के बाद फिर से बाबा साहब का अपमान करना शुरू कर दिया। अनिल मिश्रा के ये बोल उसके डबल स्टैंडर्ड कैरेक्टर को प्रदर्शित करते है। दलित समाज ने जो भी उसके बारे में कहा वो पूरी तरह से सही साबित होता नजर आ रहा है कि केवल अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए वो बाबा साहब के नाम का इस्तेमाल कर रहा है, एक बार कहीं से इलेक्शन टिकट मिल जाए फिर यही अनिल मिश्रा बाबा साहब का गुणगान करता नजर आएगा।
सच तो ये है कि बाबा साहब जैसा कोई नेता ब्राह्मणों के पास है ही नहीं, इसीलिए अनिल मिश्रा जैसे लोग खुद को फर्जी मसीहा बनाने पर तुले है। लेकिन दलितों की एकजुटता का प्रमाण पहले ही वो देख चुका है, इसीलिए इस तथाकथित मसीहा की बातों पर ध्यान देना भी समय की बर्बादी है।
बीजेपी विधायक ने दलित समाज के व्यक्ति का किया अपमान
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला कर्नाटक के दावणगेरे से है, जहां झील की मिट्टी की लेने के मामले में हरिहर बीजेपी विधायक बीपी हरीश ने पीड़ित के साथ जातिगत गाली गलौच कर उसे अपमानित किया। ये मामला दावणगेरे पुलिस स्टेशन क्षेत्र में पड़ने वाले कडज्जी गांव की है। पीड़ित कांतराज एच जो कि भोवी समुदाय से आते है, उन्होंने दावणगेरे पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि उन्हें अपने खेतों के लिए मिट्टी चाहिए थी, तो वो तालुका में कडज्जी झील के पास ट्रैक्टर से मिट्टी भर रहा था, लेकिन इस दौरान विधायक बीपी हरीश, उनके बेटे और कुछ सहयोगी भी वहां आ गए।
पहले उन लोगो ने मिट्टी न लेने की चेतावनी दी, क्योंकि वो एक सार्वजनिक झील के पास से मिट्टी ले रहा था लेकिन जब पीड़ित ने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया उन लोगो ने पीड़ित को गालिंया देना शुरु कर दिया, उसे जातिसूचक शब्दों से बुलाया। पुलिस ने पीड़ित की शिकायत के आधार पर SC, ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है, लेकिन हैरानी की बात है कि दलितों के अधिकारों को छीनते छीनते सत्ता में बैठे लोगो की हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वो पानी और मिट्टी तक को उन्हें छूने नहीं देना चाहते है। इन मुद्दे पर पुलिस जांच कर रही है, लेकिन अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
तमिलनाडु में दलित बच्चों क शिक्षा के खिलाफ दायर हुई अपील
3, दलितों से जुड़ा अगला मामला तमिलनाडु से है, जहां जातिगत भेदभाव की जड़े इतना मजबूत होती जा रही है कि अब SC/ST बच्चों के लिए बनाये गए स्कूलों पर भी सरकार जो पैसा खर्च कर रही है उस पर भी रोक लगाने के लिए याचिका दी जा रही है। इस मुद्दे पर अभी हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्कूल के लिए खर्च किए जाने वाले पैसो का इस्तेमाल करने का फैसला सुनाया है। दरअसल तमिलनाडु आदि द्रविड़ार हाउसिंग डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (TAHDCO) को केंद्र सरकार की तरफ से राज्य के 170 SC/ST स्कूल और हॉस्टल की इमारतों के रिनोवेशन और नए निर्माण के लिए 50 करोड़ रूपय आवंटित किये गए थे।
लेकिन सी सेल्वकुमार नाम के शख्स ने इस रिनोवेशन और पैसे के खर्च के खिलाफ याचिका दायर की थी जिसमें उसने दलील दी थी कि SC/ST छात्रों के लिए स्कूल और हॉस्टल के रिनोवेशन की योजना केंद्र सरकार की है, तो राज्य सरकार 50 करोड़ रूपय खर्च क्यों कर रही है, इससे फंड का गलत इस्तेमाल हो सकता है। वहीं कोर्ट ने उसकी य़ाचिका को खारिज कर दिया और कहा कि पैसों के आवंटन से दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों को फायदा होगा। इस स्कूलों के जीर्णोद्धार के लिए और दलित बच्चों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है जितनी कि अन्य वर्ग की।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस विधायक के बिगड़े बोल
4, दलितों से जुड़ा अगला मामला मध्य प्रदेश के भोपाल से है, जहां एक कांग्रेस विधायक ने दलित पिछड़े वर्ग के विधायकों को कुत्ता कह कर बुलाया है। दरअसल भोपाल डिक्लेरेशन के दौरान कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया ने कुछ ऐसा कहा जिससे ये समझना मुश्किल है कि वो दलितों और पिछड़े विधायकों के लिए आवाज उठा रहे है या उनका सार्वजनिक अपमान कर रहे है। जी हां, बरैया ने डिक्लेरेशन में लोगो को संबोधित करते हुए कहा कि SC और ST विधायकों की हालत को “कुत्तों जैसी हो गई है क्योंकि उन्हें जॉइंट इलेक्टोरेट सिस्टम के तहत आवाज उठाने का मौका नहीं मिल पाता है।
इसलिए सेपरेट इलेक्टोरेट होगा तो विधायक अपनी आवाज उठा पायेंगे। इतना ही नहीं उन्होंने आदिवासी समाज को भड़काने का काम किया है, उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि कोशिश करनी होगी कि आदिवासी समाज हिंदूवादी न हो। क्योंकि वो हिंदू बन जायेंगे तो मर जायेंगे। मौजूदा समय में धर्म देश से ऊपर जा रहा है इसलिए ऐसे धर्म को लात मार देना चाहिए।
अब जरूरी है कि अलग इलेक्टोरेट होना चाहिए। उन्होंने बाबा साहब की बातों पर जोर देते हुए कहा कि ये बाबा साहब ने कहा था कि अलग इलेक्टोरेट से दलित प्रतिनीधि ऐसे हो जायेंगे जैसे कि कुत्ते के मुंह पर पट्टी बंधी हो, जिससे उसके पास भौंकने की भी ताकत नहीं होगी। हैरानी क बात है कि अभी जब दलितों के लिए समाजिक तौर पर उनके खिलाफ एक एजेंडा चल रहा है ऐसे में उनके लिए इस तरह के अपमानित शब्दों का इस्तेमाल क्या उचित है।
बुलंदशहर में दलितों को न्याय के लिए करना पड़ा 11 साल इंतजार
5, दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से है, जहां जातिगत उत्पीड़न को लेकर पीड़ित को न्याय के लिए 11 सालो का इंतजार करना पड़ा, और जब कोर्ट ने सजा सुनाई तो वो भी मात्र 3 साल की… ये घटना जहांगीरपुर कोतवाली क्षेत्र के कपना गांव की है, जहां साल 2014 में मामूली कहासुनी को लेकर छोटे और हरेंद्र सिंह ने दलित समाज से आने वाले ताराचंद को न केवल जातिसूचक गालियां दी थी, बल्कि उसके साथ बुरी तरह से मारपीट कर उसे जान से मारने की भी धमकी दी थी। इस मामले में 21 सितंबर 2014 को थाना जहांगीरपुर में पीड़ित ने शिकायत दर्ज कराई थी।
पुलिस ने आईपीसी की कई धाराओ के साथ साथ एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया था और आठ अक्तूबर 2014 को आरोपपत्र भी दाखिल कर दिया गया, लेकिन उसके बाद लचर कानून व्यवस्ता नजर आने लगी। पीड़ित को न्याय के लिए 11 सालों तक कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े और आखिरकार विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) मनोज कुमार मिश्रा ने दोनो आरोपियों को 3-3 साल की जेल और उनपर 10-10 हजार रूपय का जुर्माना लगाया है। सजा से ज्यादा तो पीड़ितो को न्याय के लिए इंतजार करना पड़ता है और अगर वो एससी एसटी वर्ग से है, फिर तो व्यवस्था और लचर हो जाती है।



