Tara Devi: बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध ने अपने विचारो को किसी धार्मिक पहचान का मौहताज नहीं बनाना चाहा था, वो तो बस ये कहते थे कि जो ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया वो लोगो तक पहुंचाये, उन्हें सत्कर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें और दुनिया के तमाम प्रपंच, कुरितियों और इच्छाओं से मुक्ति का मार्ग दिखा सकें, उन्हें जीवन के दुखों से दूर कर सकें… लेकिन धीरे धीरे उनके विचार धर्म में बदल गए, आज बौद्ध धर्म अलग अलग समुदायों में बंटा हुआ है.. सबकी अपनी पद्दिति है, उसे मानने का तरीका है..बुद्ध जिन्होंने महायान परंपरा को आगे बढ़ाया था।
महायान किसी भी देवी देवताओं की पूजा पाठ में विश्वास नहीं रखते है, लेकिन क्या आप ये जानते है कि गौतम बुद्ध खुद एक देवी की पूजा करते थे, जिसे आज पूरे तिब्बत में रहने वाले वज्रयान समुदाय के लोग भी पूजते है..ये देवी जो कि हिंदू धर्म में भी बेहद पूजनीय है..जी हां, हम बात कर रहे देवी तारा का…जिनका गौतम बुद्ध के जीवन में विशेष महत्व रहा। तो चलिए आपको इस लेख में हम भगवान बुद्ध के लिए पूजनीय देवी देवी तारा के बारे में बतायेंगे साथ ही वो हिंदू धर्म में भी क्यों इतनी पूजनीय है।
कौन है देवी तारा
आपने टीवी सिरियल या फिर हिंदू धार्मिक ग्रंथो में त्रिदेवों में से एक महादेव की पत्नी सति के बारे में पढ़ा या सुना होगा। सति जो कि आदि शक्ति का रूप थी, जिन्होंने प्रजापति दक्ष की पुत्री के घर जन्म लिया था, लेकिन दक्ष की महादेव के प्रति घृणा के कारण सति ने अग्निकुंड में कूद कर आत्मदाह कर लिया, महादेव सति के जलते शरीर को लेकर सभी लोगो में भ्रमण कर रहे थे, जिससे संसार को बचाने के लिए तब विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के 52 खंड कर दिये थे। धरती पर जहा जहां अंग गिरे वो शक्तिपीठ कहलाये..और इन्ही में से एक पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिला में माता सति की एक आंख गिरी थी जिसे तारापीठ शक्तिपीठ कहा जाता है।
तारापीठ नाम का मंदिर
हिमाचल के शिमला से करीब 13 किलोमीटर दूर शोधी नाम की जगह है जहां माता सती की दूसरी आंख गिरि थी और वहां भी तारापीठ नाम का मंदिर है। ये मंदिर तारा पर्वत पर स्थित है जो कि तारने वाली माता के नाम से प्रसिद्ध है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को महातारा जयंती मनाई जाती है, देवी तारा असल में असल में दस महाविद्या में से एक है, जो कि सती की क्रोध से जन्मी थी। देवी तारा दूसरी महाविद्या है, जो कि असल में शक्ति का उग्र और आक्रामक स्वरूप हैं। जो लोग तंत्र साधना करते है वो देवी तारा को जरूर पूजते है। महर्षि वशिष्ठ ने सबसे पहले तारापीठ में साधना करके सिद्धियां हासिल की थी।
देवी तारा और बुद्ध का रिश्ता
बौद्ध धर्म के वज्रयान समुदाय के लोग जो तंत्र विद्या का उपयोग करते है साधना के लिए.. वो देवी तारा के उपासक है, इसलिए कहा जाता है कि गौतम बुद्ध स्वयं तारने वाली माता की पूजा करते थे। वहीं बौद्ध धर्म की किवंदितियो के अनुसार देवी तारा का जन्म बोधिसत्व के आंसुओं से प्रकट हुए कमल का फूल में हुआ था। इसलिए बौद्ध धर्म में देवी तारा का महत्व बहुत है। बुद्ध द्वारा देवी तारा को पूजे जाने के पीछे का कारण ये भी कहा जाता है कि देवी तारा असल में ज्ञान और मोक्ष देने वाली देवी है, और बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति इनकी ही कृपा से हुई थी, साथ ही उन्होंने ही बुद्ध को मोक्ष का रास्ता बताया था।
बोधिसत्व असल में दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करने वाला ही बोधिसत्व कहलाता है। ये दस पारमिताये है-मुदिता, विमला, दीप्ति, अर्चिष्मती, सुदुर्जया, अभिमुखी, दूरंगमा, अचल, साधुमती, धम्म-मेघा। जिन्हें ये दसों का ज्ञान हो जाता है वो ही ” गौतम बुद्ध ” कहलाते हैं, बुद्ध बनना ही बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है। इसलिए बौद्ध ग्रंथो में कहा जाता है कि बुद्ध बनने के लिए बोधिसत्व को प्राप्त करना आवश्यक है, उसके लिए किसी अवतार या व्यक्ति विशेष नहीं चुना जाता है। सिद्धार्थ गौतम, उन्होंने देवी तारा की आराधना करके ज्ञान प्राप्त किया, मोक्ष के रास्ते को समझा और दसो पारमिताओ का ज्ञान हासिल किया, जिससे वो बुद्ध कहलाये। शायद यहीं कारण है कि वज्रयान समुदाय में देवी तारा का सबसे ज्यादा महत्व है, उनकी साधना की जाती है।



