Princess Sanghamitra: एक राजकुमारी का महान बलिदान, संघमित्रा ने कैसे बदला एशिया का धार्मिक इतिहास?

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Princess Sanghamitra:  जब बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार और उसके विस्तार के बारे में बात होती है तो सबसे ज्यादा नाम मौर्य वंश के महान सम्राट  अशोक का नाम का लिया जाता है। तीसरी सदी में बौद्ध धर्म अपना कर 84 हजार स्तूप बना कर अशोक ने पूरे भारत समेत पूरे एशिया में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार कर मजबूत किया था। अशोक ने बौद्ध धर्म को न केवल अपनाया बल्कि अशोक ने अपने दोनों बच्चों बेटी संघमित्रा और बेटे महेंद्र को भी बौद्ध धर्म की शिक्षा दी। बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर महेंद्र और संघमित्रा दोनों ने भी बौद्ध भिक्षु बन कर अपना जीवन बुद्ध को समर्पित किया।

क्यों एक राजकुमारी ने चुना भिक्षुणी का जीवन?

उन्होंने अपने पिता के आदेश पर श्रीलंका की न केवल यात्रा की बल्कि उनकी बेटी ने वहां जाकर बोधि वृक्ष की एक जड़ को भी स्थापित किया था। आज पूरे श्रीलंका में थेरवाद बौद्ध धर्म का बोलबाला है, और एशिया के सबसे ज्यादा बौद्ध धर्म को मानने वाले देशों में से एक है, लेकिन एक राजुकमारी होते हुए भी संघमित्रा ने पिता के रास्ते को चुना.. सारे एशों आराम को छोड़ कर भिक्षुणी की रास्ता चुना..और अशोक के मिशन को आगे बढ़ाया, अपने इस लेख में हम संघमित्रा के मिशन के बारे में जानेंगे जिसके लिए उन्होंने अलग अलग जगहो पर यात्रा की थी।

संघमित्रा- अशोक की दोनो बच्चे जुड़वा थे, जिसमें पहले उनके पुत्र महेंद्र और फिर पुत्री संघमित्रा का हुआ था, जो कि करीब 282 ईसा पूर्व – 203 ईसा पूर्व में हुआ था। उनके पिता सम्राट अशोक और मां का नाम देवी था, देवी एक बौद्ध अनुयायी थी, कहा जाता है कि अशोक के राज्यभिषेक के वक्त उनके बच्चे अपने मां के साथ ही रहते थे, और मात्र 14 साल की उम्र में म्राट अशोक के भतीजे अग्रिब्रह्मा संघमित्रा की शादी करा दी गई। जो एक अरहंत भी थे। संघमिश्रा ने एक बेटे सामनार सुमना को भी जन्म दिया था, जो कि एक अरहंत बने, अपने मामा के सानिध्य में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए उनके साथ यात्रायें की थी।

कैसे संघमित्रा ने श्रीलंका में फैलाया धम्म?

लेकिन मात्र 18 साल की उम्र में संघमित्रा ने गुरु धम्मपाल द्वारा थेरवाद बौद्ध संघ में प्रवेश हासिल किया..बौद्ध धर्म के प्रति उनकी आस्था इतनी मजबूत थी कि छोटी सी उम्र में ही संघमित्रा एक अरहंत थेरी बन गईं और पाटलीपुत्र में बौद्ध मठ में रहने लगी थी। बौद्ध भिक्षुणी बनने के बाद उन्हें नाम मिला अयापली। इस दौरान श्रीलंका के राजा देवनम्पिया तिस्सा जो कि बौद्ध धर्म से काफी प्रभावित थे, उन्होंने महेंद्र और संघमित्रा को श्रीलंका आकर बौद्ध धर्म की शिक्षाओं पर ज्ञान देने और प्रचार करने का आग्रह किया..   लेकिन सम्राट अशोक ने बेटे को भेजना स्वीकार किया मगर बेटी को नहीं.. इस कारण पहले महेद्र को, जिन्हें महिंदा नाम दिया गया था, उन्होंने श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया.. उनसे प्रभावित होकर लोगो ने बौद्ध धर्म को अपनाना जानना शुरु कर दिया था, ऐसे में महिंदा ने संघमित्रा को बोधी वृक्ष की जड़ लाने को कहा था।

ऐसे में संघमित्रा ने अपने पिता के मिशन को पूरा करने के लिए कुछ ननो भिक्षुनिणों के साथ श्रीलंका की यात्रा की.. और तब पहली बार वहां एक पूरी तरह से दीक्षित महिला बौद्ध मठवासी को पहली बार देखा गया था, महिलाओ को बौदध भिक्खु बनाने के लिए राजा तिस्सा के कहने पर अनुराधापुरा में संघमित्रा ने नन-वंश शुरू किया, और उसमें उन्होंने सबसे पहले रानी अनुला के साथ साथ राजघराने की करीब 500 महिलाओं को बौद्ध नन बनने की इच्छा जाहिर की थी, और एक महिला को महिला भिक्खु की दीक्षा दे सकती थी इसलिए संघमित्रा से बेहतर ये काम कोई नहीं कर सकती थी।

जब बेटी संघमित्रा लेकर पहुँचीं बोधि वृक्ष की जड़

संघमित्रा के आने के बाद भिक्खुनी संघ या मेहेनी सासना की स्थापना की गई। संघमित्रा ने श्रीलंका में महिलाओं को भिक्षुणी बनने के लिए प्रेरित किया। धीरे धीरे ये संघ बर्मा, चीन और थाईलैंड में भी स्थापित हुआ। इतना ही नहीं जिस दिन संघमित्रा बोधि की जड़ को श्रीलंका ले कर आई थी, बोधि का पौधा अनुराधापुर के महामेघवन ग्रोव में बड़ी धूमधाम से लगाया गया था। यह आज भी उसी जगह पर देखा जाता है। वहां आज भी हर साल दिसंबर की पूर्णिमा के दिन श्रीलंका में थेरवाद बौद्धों द्वारा उडुवापा पोया या उपोसथ पोया और संघमिता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

पहली बार भिक्षुणियों के अलग से संघ

संघमित्रा ने बौद्ध धर्म परिवर्तन को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया था। अनुला भिक्षुणी के रूप में दीक्षित होने वाली पहली श्रीलंकाई महिला थीं, इसके साथ ही उनकी 1000 से अधिक सहेलियों को भी पब्बज्जा अभिषेक प्रदान किया गया। जिससे पहली बार भिक्षुणियों के अलग से संघ को एक नई पहचान दिलाई थी। इस वक्त संघमित्रा की उम्र करीब 32 साल रही होगी। श्रीलंका में राजा ने भिक्षुणियों के कहने पर ‘हठलखा-विहार’ नाम की रहने की जगह बनवाई, ताकि महिला भिक्खु एकांत में रहकर सिर्फ़ भक्ति और धार्मिक कामों पर ध्यान दे सकें।

संघमित्रा का अंतिम संस्कार

संघमित्रा ने महिला भिक्क्षु संघ की शुरुआत करके बौद्ध धर्म के प्रति महिलाओं को जागरूक करने का अपना दायित्व बखूबी निभाया था। वो आजीवन श्रीलंका में ही बौद्ध भिक्षुणी बन कर रही थी, 203 ईसापूर्व 79 साल की उम्र में संघमित्रा ने राजा उत्तिया के राज में हठलोक उपासिकारामय अनुराधापुर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। संघमित्रा का अंतिम संस्कार थुपाराम के पूरब में चित्तशाला के पास, उनके ही लाये गए बोधि वृक्ष के सामने किया गया था। अंतिम संस्कार की जगह थेरी संघमित्रा ने खुद चुनी थी। उत्तिया ने उनकी राख पर एक स्तूप भी बनवाया था।

संघमित्रा का असल मकसद

महिला भिक्खुनियों की पहचान और संघ करीब 1000 तक फलां फूला लेकिन दक्षिण भारत के हिंदू शासकों चोलों के हमले के कारण भिक्खु और भिक्खुनियों को श्रीलंका से दूरी बनानी पड़ी। हैरानी की बात तो ये है कि जहां श्रींलंका में तीसरी सदी में ही भिक्षुनी संघ की स्थापना हो गई थी, वहीं भारत में ये छठी सदी में आगे बढ़ा। संघमित्रा असल में जिस मकसद से श्रीलंका गई थी, उन्होंने उसे बखूबी पूरा किया था, और शायद यहीं कारण है कि पुरूषों से ज्यादा महिलाओं में बौद्ध धर्म को जानने और समझने का कौतुहल काफी मजबूत रहा है। संघमित्रा का संघंर्ष और उनके कार्यो के लिए बौद्ध अनुयायी सदैव उनके शुक्रगुजार रहेंगे।

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