क्या बौद्ध भिक्षु मांस खाते हैं? जानिए अहिंसा के मार्ग पर मांसाहार का सच!

Buddha,
Source: Google

Do Buddhist Monks Eat Meat: यह तो हम सभी जानते हैं की बौद्ध धर्म में सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चल कर धर्म का पालन करने की सीख के कारण ही अपने शुरूआती दौर में ये धर्म इतना ज्यादा फला फूला था,  जिसमें सबसे पहले पशु हत्या को ही वर्जित कहा था, बुद्ध ने सदैव सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा और सीख दी थी, लेकिन क्या आप ये जानते है कि बौद्ध धर्म में ही गौतम बुद्ध ने अपने अनुयायियों को मांस खाने की अनुमति दी थी।

इतना ही नहीं उनके अनुयायी मांस खाते भी थे। जिसके कारण बुद्ध को लेकर बड़ा विवाद भी खड़ा हुआ था, लेकिन सवाल ये है कि बुद्ध जो मानवता, सत्य और अहिंसा के प्रेरक थे, जो पशु हत्या के सख्त विरोधी थे उन्हों बौद्ध भिक्षुओं को मांस खाने की इजाजत क्यों दी थी, साथ ही जब इसका विरोध हुआ तो फिर क्या हुआ। क्या ये नियम बदले या फिर विरोध करने वाले लोगों की सोच।

क्यों बढ़ा बौद्ध धर्म का आकर्षक

बौद्ध धर्म ग्रंथों के अनुसार जब बुद्ध ने अपनी शिक्षा का विस्तार शुरू किया था तब ब्राह्मणवादी विचारधारा काफी हावी थी, दान दक्षिणा, पूजा अर्चना के नाम पर गरीब और कमजोर तबको को का शोषण होता था, उनके पशुओ की बलि मांगी जाती थी, जिससे गरीब और पिछड़े लोगो के बेसिक जरूरतें भी पूरी नहीं हो पाती थी, ऐसे में बुद्ध के विचारों से वो तबका ज्यादा प्रभावित हुआ जो इन उत्पीड़न को बर्दाश्त कर रहा था, जिसमें शूद्र और पिछड़ी जाति ज्यादा थे।

नतीजा ये हुआ कि उन लोगो ने बुद्ध की बातों में कुछ नयापन देखा और उन्हें फॉलो करना शुरु कर दिया.. ये वक्त था जब ब्राह्मण मांस खाते थे और बलि के नाम पर पशुओ का रक्त बहाते थे। बेचारे गरीब पिछड़े लोगो को बौद्ध धर्म मानसिक शांति देने वाले धर्म के साथ साथ उन्हें आर्थिर रूप से कमजोरी से बचाने वाला धर्म लगा.. और ब्राह्मणों की सत्ता कमजोर होने लगी.. लेकिन फिर भी सभी में ये परिवर्तन नहीं हुआ था।

जब बौद्ध भिक्षुओं को खाना पड़ा मांस

बुद्ध अपने विचारो के कारण बेहद पूजनीय हो गये लोग उन्हें अपने घरों में बुलाने लगे, लेकिन चुंकि उन्होंने वैराग्य अपना लिया था और बौद्ध भिक्षु संघ के लिए बनाये नियमों को मानना अनिवार्य था। जो भिक्षा में मिले उसे ही खाना होता था, और अगर भिक्षा नहीं मिले तो भूखे रहना पड़ता था। ऐसे में बुद्ध ने तय किया कि वो भिक्षा में क्या मिल रहा है, उसे खाना है या नहीं.. इस बात में कोई दायरा तय नहीं करेंगे.. ऐसे समय में जब भिक्षु भिक्षा लेने जाते तो उन्हें कई बार भिक्षा में मांस भी दिया करते थे.. ऐसे में बुद्ध ने भिक्षुओं को भिक्षा में मिला मांस खाने की इजाजत दें दी थी, अगर भिक्षा में मांस लेने से इंकार किया जाता तो वो भिक्षा देने वाला का, औऱ भिक्षा का अपमान होता.. हालांकि उस मांस को खाने के तीन आधार तय किये गये।

कौन से थे तीन आधार

दरअसल बुद्ध ने कहा कि जिस भिक्षु को भिक्षा में मांस मिल रहा है, उसे खाने से पहले तीन बातों का ध्यान रखना अनिवार्य था, जिसका जिक्र त्रिपिटिक बौद्ध ग्रंथ के जीविका सुत्त में ये तीन नियम बताये गए है। जिसे त्रिकोटी परिशुद्ध कहा गया। पहला- जिस पशु का मांस है, भिक्षु ने खुद उसकी बलि पड़ते नहीं देखा, दूसरा नियम – वो मांस स्पेशली उस भिक्षु के लिए ही न लाया गया और तीसरा भिक्षु ने उस पशु को आवाज न सुनी हो।

बुद्ध मानते थे कि अगर भिक्षु स्वयं हत्या करने में शामिल नहीं हो और उसके लिए पशु हत्या न की गई हो तो वो पाप का भागी नहीं होगा.. सच तो ये है कि हिंसा मानव की चेतना में होती है.. और भिक्षु के मन में पशु हत्या जैसा पाप नहीं आया तो वो पापी नहीं होगा। बचा हुआ भोजन केवल उसे जीवित रखने के लिए खाया गया था।

देवदत्त ने की बुद्ध के खिलाफ साजिश

देवदत्त बुद्ध के चचेरे भाई थे और उसने भी बौद्ध भिक्षु होने का प्रपंच तो रचा था लेकिन वो बुद्ध के लिए अपनी इर्ष्या छिपा नहीं पाया। खुद को बुद्ध से बेहतर साबित करने की भूल में उसने बुद्ध के अनुयायियों द्वारा मांस खाये जाने की बात का बड़ा मुद्दा बन कर 5 कड़े नियम रखे थे।

लेकिन बुद्ध ने अपने संघ के भिक्षुओं की परवाह की और भिक्षुओ के हक में फैसला सुनाते हुए देवदत्त के प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिसमें भिक्षुओ के मांसाहार पर रोक लगाई गई थी। बुद्ध कहते थे कि खाना जीवन का आधार है और जीविच रहने के लिए मांस खाना भी कोई अनैतिक नहीं है। और अगर पेट खाली रहा तो भिक्षु कभी अपने परिनिर्वाण पर पूर्ण ध्यान ही नहीं लगा पायेंगे। इसलिए उनका ध्यान इस पर नहीं होना चाहिए कि उन्हें क्या खाना है क्या नहीं..

बुद्ध ने मांसाहार का विरोध किया

बौद्ध धर्म के अलग अलग समुदाय में अलग अलग खाने की पद्दति है। जिसमें थेरवाद के भिक्षु भिक्षा से ही जीवन चलाते है लेकिन वो मांस मछली भी खाते है। जो मिला उसे चुपचाप खा लेते है। तो वहीं महायान में करूणा को अहम माना जाता है, इसलिए महायान को मानने वाले पूर्ण शाकाहार को फॉलो करते है.. महायान में कहा जाता है कि बुद्ध ने मांसाहार का विरोध किया है और कहा कि जब हम हर जीवित प्राणी को अपना परिवार मानते है तो फिर अपने ही परिवार का मांस कैसे खा सकते है। अप्रत्यक्ष हत्या के भी वहीं भिक्षु जिम्मेदार है।

इसके अलावा वज्रयान में भी मांस खाने को प्राथमिकता दी जाती है.. क्योंकि वज्रयान जिन इलाको में फॉलो होता है वहां का बातावरण ही ऐसा रहा कि वहां शाकाहार भोजन नहीं किया जा सकेगा.. हालांकि वो मासाहांस करने से पहले मंत्रों का जाप करके मरे हुए जीव की आत्मा को मुक्ति मिले..और भिक्षु सदैव धर्म के राह पर रहे। यानि की बौद्ध धर्म में आज भी मांस वर्जित नहीं है। बस उनके अपने अपने नियम लागू किये गए है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *