Devadatta vs Buddha: आपने गौतम बुद्ध के परिवार का बारे में कई बार सुना होगा, बुद्ध बनने से पहले जब वो राजकुमार थे, तब उनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के राजा था, मां महामाया का निधन बुद्ध के जन्म के सातवें दिन हो गया था तो वहीं उनकी मौसी महाप्रजापति जो उनकी सौतेली मां भी थी, उन्होंने बुद्ध को पाला, वहीं उनकी पत्नी यशोधरा और बेटा राहुल भी थी। एक राजकुमार के तौर पर उन्हें सभी स्नेह करते थे, लेकिन बावजूद इसके उनका अपना चचेरा भाई देवदत्त उनसे बैर रखता था।
इतना ही नहीं बुद्ध बनने के बाद देवदत्त ने उन्हें मारने की भी कोशिश की थी। लेकिन फिर भी वो सफल नहीं हो सका, अब सवाल ये है कि आखिर जब बुद्ध ने वैराग्य अपना लिया था तब देवदत्त को आखिर उनसे क्या खतरा था, और क्यों देवदत्त ने बुद्ध को मारने की कोशिश की। अपने इस लेख में हम बुद्ध और उनके चचेरे भाई के बीच के रिश्ते को लेकर बात करेंगे, साथ ही ये भी जानेंगे देवदत्त को अपनी गलती का अहसास हुआ या नहीं।
राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त का रिश्ता
बचपन में आपने एक कहानी जरूर पढ़ी होगी जिसमें देवदत्त एक पक्षी का शिकार करता है जो कि तड़पते हुए सिद्धार्थ के पास गिरता है, सिद्धार्थ उसकी देखभाल करते है लेकिन देवदत्त उस पक्षी पर अपना दावा करता है मगर जब ये मामला राजा के पास जाता है तो राजा फैसला करते है कि मारने वाले से ज्यादा अधिकार बचाने वाला का है और देवदत्त के हाथो से उसका शिकार, बुद्ध की दयालुता के कारण चला गया था, इसके अलावा भी कई कहानियां है, जिसके कारण देवदत्त बुद्ध से बैर रखने लगा था, और एक समय ऐसा आया जब बुद्ध को मारने की भी कोशिश की।
बुद्ध की पत्नी पर नजर
देवदत्त को हमेशा से लगता था कि केवल राजा का पुत्र होने के कारण सिद्धार्थ को बिना किसी परिश्रम के सब कुछ मिल गया, चुंकि वो सिद्धार्थ का बड़ा भाई था, इसलिए यशोधरा से विवाह करने की इच्छा उसने ही पहले दिखाई थी, लेकिन यशोधरा ने देवदत्त के बजाये सिद्धार्थ को पति के रूप में स्वीकार कर लिया था, जिससे देवदत्त की नफरत और बढ़ गई। लेकिन जब बुद्ध ने गृह त्याग कर दिया तो उसे फिर से यशोधरा के करीब जाने का मौका मिल गया। एक रात वो जबरन यशोधरा के कक्ष में चला गया था लेकिन यशोधरा ने देवदत्त से पूछा कि क्या वो बुद्ध का कोई संदेश लाया है।
यशोधरा ने देवदत्त को दुत्कारा
जिसपर देवदत्त ने अपने मन की नफरत को छिपाये बिना कहा- जो शख्स अपनी पत्नी और बच्चे को महल में अकेला छोड़ कर, इतना सुख छोड़ कर वैरागी बनने तला चला गया, ऐसे शख्स की भला क्या चिंता करना.. जिसके बाद देवदत्त ने यशोधरा पर दवाब डाला कि वो बुद्ध के बदला लें, लेकिन यशोधरा ने फिर से देवदत्त को दुत्कारते हुए कहा क उनके विचारों और उसकी वाणी से दुर्गंध आती है। देवदत्त ने क्रोधित होकर कहा कि उसके पति को उसकी कभी चिंता ही नहीं रही, सच तो ये है कि देवदत्त ही उससे सच्चा प्यार करता है और उसे अपने पति से बदला लेना चाहिए.. देवदत्त ने कहा कि अगर यशोधरा उससे प्रेम करती है तो उससे उसका बदला भी पूरा होगा और उसे प्रेम भी मिलेगा। लेकिन यशोधरा ये क्रोधित हो उठी और देवदत्त को अपने कक्ष से अपमानित करके निकाल दिया।
देवदत्त ने भगवान बुद्ध को मारने की कोशिश की
देवदत् ये समझ गया था कि जब तक बुद्ध का अस्तित्व है, यशोधरा कभी उसे नही अपनायेगी.. इस लिए देवदत्त ने 3 बार बुद्ध को मारने की कोशिश की थी। पहली बार जब भगवान बुद्ध गृतकृथ पर्वत के नीचे पेड़ की छाया में टहल रहे थे, बस फिर क्या था वो पर्वत पर चढ़ गया और एक बड़ा पत्थर बुद्ध की तरफ फेक दिया, लेकिन वो दूसरी चट्टान पर आकर अटक गया लेकिन उसकी छोटी छोटी चट्टान उनके पैरो पर आकर लगी, जिससे बुद्ध को थोड़ी-मोड़ी चोट आई, वहीं दूसरी बार देवदत्त ने तब के एक क्रूर और घमंडी शासक अजातशत्रु से मदद मांगी।
अजातशत्रु ने देवदत्त को कुछ ऐसे लोग दिये जो बुद्द की हत्या करने में उसकी मदद करते, देवदत्त के कहने पर जब हत्यारे बुद्ध को मारने पहुंचे तो वो उस वक्त अपने शिष्यों को जीवन का रहस्य समझा रहे थे, जिसे हत्यारो ने भी सुना और तुरंत उनका हृद्य परिवर्तन हो गया और उन लोगो ने देवदत्त से बुद्ध के मारने से इंकार कर दिया। वहीं तीसरी बार बिहार के राजगीर में हाथी के पैरो के नीचे दबवा कर मारने का प्रयास किया। उस वक्त राजगीर में नालागिरी नाम का एक खूंखार हाथी का आतंक छाया हुआ था, देवदत्त ने हाथी को संभालने वालों को लालच दिया कि अगर उन लोगो ने तथागत बुद्ध को मारने में उसकी मदद की तो वो उनका पद और तनख्वा बढवा देगा, सभी मान गए, लेकिन जैसे ही हाथी बुद्ध के सामने पहुंता, वो स्थिर हो गया। ऐसे लग रहा था जैसे बुद्ध कह रहे हो कि अब बस हिंसा का रास्ता त्याग दो और अहिंसा का रास्ता अपना लो।
देवदत्त को उसकी करतूत की सजा मिली
देवदत्त के बार बार प्रयास असफल हो गए और बुद्ध जीवीत रहे थे, लेकिन देवदत्त को उसकी करतूत की सजा मिली, उससे राजसी ठाटबाठ सभी छीन लिया गया। वो भिक्षा मांगने पर मजबूर हो गया था, लेकिन उसकी करतूतो के कारण भिक्षा भी नहीं मिलती थी, इसलिए वो कौशल प्रदेश चला गया लेकिन वहां भी उसे उसके कर्मों का फल मिला। लोग उसे घृणा की नजरों से देखते थे।
बुद्ध से प्रभावित होकर देवदत्त ने संघ में प्रवेश लिया था, लेकिन बुद्ध ने उस् अर्हच पद नहीं दिया जिससे वो काफी क्रोधित हो गया, बुद्ध की बढ़ती लोकप्रियता के कारण वो मन ही मन द्वेष करने लगा। उसने बार बार बुद्ध को मारने की कोशिश की, लेकिन उसके धूर्त और ईष्यालु आचरन के कारण वो कभी एक पूर्ण भिक्षु संघ का हिस्सा बन ही नहीं पाया था, और अंत में बुद्ध के अनुयायियो ने देवदत्ता का पूरी तरह से निष्कासित ही कर दिया था। देवदत्त ताउम्र अपने किये गए पापो का बोझ अपने कंधे पर धोते रहा। शायद इसिलिए बुद्ध इतने महान हुए।



