बाबा साहब ने क्यों कहा कि हिंदू धर्म का उद्देश्य केवल लोगो को मानसिक रूप से बंधक बनाना है, ऐसे धर्म की रक्षा क्यों हो?

BR Ambedkar Maharashtra Life
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Dr. B.R. Ambedkar on Hinduism: जब 1935 में नासिक के येओला में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने की बात कही थी तब उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। वीर सावरकर,. बी.एस. मुंजे जैसे समाज सुधारक और हिंदूवादी नेता ने बाबा साहब के इन विचारों को समाज और हिंदुत्व के लिए एक खतरा माना था। हिंदू संगठन RSS के संस्थापकों में से एक डॉ. बी.एस. मुंजे ने दलितों के धर्मांतरण को हिंदू धर्म के लिए खतरा मानते हुए इसे ‘सांप को दूध पिलाने’ जैसा कदम कहा था,

लेकिन इन सबके उलट बाबा साहब जातिगत भेदभाव जैसी कुरीतियों और हिंदू धर्म में फैले प्रपंच को लेकर मानते थे। कि हिन्दू धर्म असल में लोगों को मानसिक रूप से बंधक बनाता है, और इस लिए ऐसे धर्म की रक्षा क्यों करें। अब सवाल ये है कि आखिर बाबा साहब ने हिंदू धर्म को मानसिक रूप से बंधक बनाने वाला धर्म क्यों कहा था, और तमाम विरोधों के बाद भी वो अपने फैसले से क्यों नहीं बदले।

बाबा साहब के पास दो पीएच़डी

बाबा साहब की कई किताबें जैसे कि शूद्र कौन थे, जातिवाद का अंत.. में उन्होंने न केवल ब्राह्मणवाद पर निशाना साधा था, बल्कि उन्होंने जातिवाद और भेदभाव के लिए ब्राह्मणों की नीतियों को ही जिम्मेदार ठहराया था। बाबा साहब बचपन से ये मानते थे कि शूद्र शिक्षित नहीं है इसलिए उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है, अगर वो एक बार शिक्षा का महत्व समझ लें, और शिक्षित होने के लिए आगे बढ़े तो दलितों और शुद्रो के हक में वो लड़ने लगेंगे, लेकिन बाबा साहब ने दो पीएच़डी हासिल की, उनके पास 32 डिग्रिया थी, वो नौ भाषायें जानते थे, लेकिन जब वो वापिस भारत आये तो उनकी इस सोच को बड़ा धक्का लगा।

बाबा साहब की कुढ़न हिंदू धर्म को लेकर

मुम्बई के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में बतौर शिक्षक कार्यरत होते हुए भी उन्हें अन्य प्रोफेसर से जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता था। उन्होंने अमेरिका की जिंदगी देखी थी, इसलिए वो ये स्वीकार ही नहीं कर पा रहे थे कि इतना शिक्षित होने के बाद भी उनकी पहचान उनकी महार जाति से ही है, उनकी शिक्षा, उनकी प्रतिभा से नहीं.. जिसके कारण बाबा साहब की कुढ़न हिंदू धर्म को लेकर और बढ़ गई। वो समझ गए थे कि हिंदू धर्म और जातिवाद एक गाड़ी के दो पहिये की ही तरह है।

जातिवाद खत्म करने के लिए हिंदू धर्म को ही खत्म करना होगा…लेकिन वो इसका भी अंजाम जानते थे…जैसा कि बौद्ध धर्म के साथ हुआ, जो जब हिंदू धर्म पर हावि होने लगा तो ब्राह्मणों की कूटनीति के कारण बौद्धों को ही पतन होना शुरु हो गया और एक समय में बौद्ध धर्म भारत से लगभग खत्म ही हो गया था। इसलिए बाबा साहब ने हिंदू धर्म से न लड़ने का फैसला किया था। वो समझ गए कि अगर जिससे लड़ा नहीं जा सकता है उससे दूर हटना ही बेहतर होगा औऱ उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था।

क्यों करें ऐसे धर्म की रक्षा

बाबा साहब से पहले भी जातिगत भेदभाव के लिए कई बार आवाज उठाई गई, बाबा साहब ने ताउम्र जातिगत भेदभाव के खिलाफ और सामाजिक समानता के लिए लड़ाई लड़ी थी, लेकिन फिर भी उन्हें अवहेलना का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म को मानने वाले कुरितियों और अंधविश्वास के गुलाम है, ये धर्म आपको आडंबरो और परंपरा के नाम पर मानसिक रूप से गुलाम बनाता है, जिसमें सबसे ज्यादा बड़ी भूमिका तो ब्राह्मणवादी सोच की है, और हिंदू धर्म में कभी भी चारों वर्णों में सबसे ऊपर वर्ण की अवहेलना नहीं करेंगे क्योंकि सामाजिक व्यवस्था वही तय़  करते है, ऐसे में वो भला एक ऐसे धर्म की रक्षा करने का दायित्व क्यों लें, जो उन्हें या उनके जैसे चौथे वर्ण को इंसानो की कैटेगरी में भी नहीं समझते है।

पुरुष प्रधान समाज की मान्यता

इस कारण जब नागपुर में बाबा साहब ने बौद्ध धर्म अपनाया था तो उनके साथ करीब साढ़े तीन लाख और शूद्र दलित थे, जिन्होंने बाबा साहब को फॉलो करने का फैसला किया था, और इतनी भारी तादाद में धर्म परिवर्तन हुआ लेकिन बाबा साहब ने इसे स्वीकार किया, क्योंकि वो खुद इस धर्म की रक्षा करना जरूरी नहीं समझते थे, तो भला वो अपने जैसे लोगो को कैसे इस धर्म में बने रहने औऱ उसकी रक्षा करने की सलाह देते। सदियों से पुरुष प्रधान समाज की मान्यता और पितृसत्तात्मक समाज से वो घृणा करने लगे थे।

समाजिक रूप से कितनी भी कोशिश की जायें लेकिन सदियों से चली आ रही रूढिवादी परंपरा को तोड़ना आसान नहीं है और जो हिंदू धर्म के खिलाफ जाकर काम करेगा, उसे पतन का सामना करना पड़ेगा, इसलिए बाबा साहब ने हिंदू धर्म में रह कर शोषित होने के बजाय बौद्ध धर्म चुन लिया ताकि वो सम्मान और समानता के साथ रह सकें, और शूद्रों के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकें कि अगर उन्हें हिंदू धर्म में सम्मान नहीं मिलता तो ऐसे धर्म की रक्षा करने की कोई जरूरत नहीं है ऐसे धर्म को छोड़ देना ही बेहतर है। वैसे हम आपसे पूछते है कि बाबा साहब हिंदू धर्म को मानसिक रूप से बंधन बनाने का साधन मानते थे, इस बात पर आप कितना सहमत है।

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