Top 5 Dalit news: राजस्थान में दलित कल्याण पर सियासत तेज़, बजट का 23% पैसा वापस होने पर नेता प्रतिपक्ष का बड़ा हमला

Tika ram Juli, Tika ram Juli statement
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Top 5 Dalit news: कोई लाख कोशिशें कर लें, इसके लिए हजारों लोगों का खून बह जायें, लेकिन जब तक अपने अधिकारों की लड़ाई खुद नहीं लड़ी जायेगी.. जब तक मनुवादियों की दमनकारी नीति के खिलाफ खुद दलित मजबूत नहीं होंगे..तब तक दलितों पर अत्याचार कम नहीं होगा, और न ही उनकी किसी को परवाह होगी। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितो के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में जानेंगे, जो इस वक्त सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियों में है।

राजस्थान में दलितो को लेकर सरकार की नियत पर उठे सवाल

1, दलितों से जुड़ा पहला मामला राजस्थान से है, जहां दलितों के साथ होने वाली अन्नाय को लेकर नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने राज्य सरकार पर करार हमला किया है। राजस्थान में दलितो की स्थिति कितनी दयनीय है, वो यहां आये दिन होने वाले दलित उत्पीड़न की खबरों से पता चल ही जाता है, लेकिन सरकार का रवैया भी उनके लिए कितना बुरा है उसका सबूत मिला है अभी हाल ही में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोरट के सामने आने के बाद..जिसमें एससी एसटी जातियों के लिए लागू किये बजट को पूरा खर्च करने के बजाय सरकार 23 प्रतिशत राशि वापिस लौटा दी है, जिसे लेकर अब टीकाराम जुली ने सरकार की नियत पर हमला किया है।

जुली ने कहा कि दलितों के कल्याण के लिए मिले 10 हजार 309 करोड़ रुपये में से सरकार ने 2 हजार 345 करोड़ रुपये वापिस कर दिये… जबकि दलितों की स्थिति अभी भी दयनीय ही है, ये केवल बीजेपी की दलित विरोधी मानसिकता का प्रतीक है, जो नहीं चाहते है कि दलित विकास करें.. दलितो के कल्याण का केवल दिखावा किया जाता है लेकिन होता नहीं है। उन्होने ये भी कहा कि पहले जितनी राशि आवंटित होती थी उसमें भी 30 प्रतिशत की कटौती कर दी गई, ऊपर से 23 प्रतिशत लौटा दिया गया..सच्चाई तो ये ही है कि सरकार ने दलित कल्याण को कभी प्राथमिकता दी ही नही.. जुली के इस खुलासे के बाद राज्य सरकार की नियत पर सवाल उठने लगे है.. अब देखना ये होगा कि सरकार की इस पर क्या प्रतिक्रिया होती है।

दलित महिला से जबरन बंधुआ मजदूरी की मांग

2, दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के जौनपुर से है, जहां आज भी कुछ मनुवादी दलितों को अपना बंधुआ मजदूर समझ कर उनसे बेगारी करवाने की कोशिश कर रहे है..और जब दलित ने मना किया तो उन्हें बुरी तरह से पीटा..जातिसूक गालियां दी। ताजा मामला जौनपुर के केराकत थाना क्षेत्र के डेहरी गांव का है, पीड़िता जलसा ने पुलिस को तहरीर देते हुए बताया कि वो गांव के ही असराफ के यहां पिछले 4 सालो से काम करती थी, लेकिन तबियत खराब होने के कारण उसने अब काम करने से इंकार कर दिया था।

लेकिन इसी बीच वो उसके खेतों में कुछ सरसो बिनने गई..मगर असराफ इस बात से नाराज हो गया.. महिला ने बताया कि आरोपी कई बार महिला को बंधुआ मजदूर बन कर काम करने का दवाब दे चुका है लेकिन महिला ने इंकार कर दिया था.. जिससे कारण वो नाराज था, और जब उसने पीड़िता को सरसो बिनते देखा तो उसे मौका मिल गया, उसने पीड़िता को जातिसूचक गालियां दी, और बुरी तरह से पटक पटक कर पीटा.. और जाम से मारने की धमकी दी.. पीड़िता बुरी तरह से घायल है।

पीड़िता की तहरीर पर असराफ के खिलाफ मामला दर्ज कर उसकी तलाश शुरु कर दी गई है..फिलहाल वो फरार चल रहा है.. वहीं पुलिस इस मामले में चश्मदीदों से जांच कर रही है। हैरानी की बात है कि देश की आजादी के इतने सालों बाद भी दलितों और पिछड़ों को बंधुआ मजदूर से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता है, तो कहां से उन्हें सामाजिक बराबरी और न्याय मिलेगा।

कर्नाटक में मंदिर प्रवेश की लड़ाई दलित ने जीती

3, दलितो से जुड़ा अगला मामला कर्नाटक के मंड्या जिले से है, जहां एक दलित परिवार ने 2 सालो तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद आखिरकार मंदिर में प्रवेश करने की लड़ाई जीत ही ली। ये खबर मंड्या जिले के मडदूर ताल्लुक के हुलिकेरे गांव का है। जहां दो साल पहले गांव के बसवेश्वर मंदिर में अपने बेटे का मुंडन कराने आए सतीश और उनकी पत्नी श्वेता को दलित होने के कारण पुजारी ने मंदिर में प्रवेश ही नहीं करने दिया था.. लेकिन इस घटना से आहत होने के बजाये सतीश ने कानूनी लड़ाई लड़ी।

सतीश को उसके ही गांव से कोई मदद नहीं मिली तो उसने समाज कल्याण विभाग, मानव अधिकार आयोग, नागरिक अधिकार विभाग और पुलिस का सहारा लिया.. जिसका नतीजा ये हुआ कि दो सालों के बाद उसे न्याय मिला और पुलिस और तहसीलदार की उपस्थिति में सतीश ने मंदिर में प्रवेश किया और मुंडन संस्कार भी पूरा किया। सतीश का ये कदम बताता है कि दलितो को आज भी देश की कानून व्यवस्था पर भरोसा है.. कि उन्हें भी आज नहीं तो कल न्याय जरूर मिलेगा। वैसे क्या आपको कानून पर भरोसा है या नहीं हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

ओड़िसा में आदिवासी समुदाय की महिलाओं पर हमला

4, दलितों से जुड़ा अगला मामला ओड़िसा के मयूरभंज से है, जहां आदिवासी महिलाओं ने उत्पीड़न के लिए आवाज उठाने की कोशिश की तो पुलिस ने उनकी आवाज को शांत करने के लिए क्रूरता की सारी हदें पार कर दी। ये घटना मयूरभंज के सनापोसी गांव का है, सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है जिसमें कई पुलिस वाले महिलाओं को बुरी तरह से लाठियों से पीट रहे है, इस मारपीट के बाद पुलिस वालो ने 28 महिलाओं औऱ 6 पुरुषों को गिरफ्तार कर जेल में भी डाल दिया.. जो केवल इस बात का सबूत है कि दलित और आदिवासियों की आवाज को कितनी बर्बरता से दबाने की कोशिश की जा रही है।

चाहे उसके लिए निर्दोषो का खून ही क्यं न बहाना पड़े। दरअसल ये महिलाओं 13 मार्च को एक 14 साल की आदिवासी लड़की के साथ छेड़छाड़ करने के मामले में तिनपिंग थाना क्षेत्र के एनएच 220 पर प्रदर्शन शुरु किया था, लेकिन पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की बात सुनने के बजाये उल्टा उन पर ही एक्शन दिखा दिया..जिसे लेकर अभी तक महिलाओं की रिहाई नहीं हुई है, और पीड़ितों ने अब इस मामले में बीजू जनता दल (BJD) के कार्यकर्ताओं ने नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड ट्राइब्स (NCST) को ज्ञापन सौंप पर पीड़ितो के लिए न्याय की गुहार लगाई है। अब देखना ये होगा कि गिरफ्तार हुए लोगो की रिहाई कब तक होगी.. न्याय की आवाज उठाने के बदले अत्याचार क्यों… इसका जवाब भी मिलना चाहिए।

विवादिक वकील ने बीजेपी सरकार को लपेटा

5, दलितों से जुड़ा अगला मामला मध्य प्रदेश के विवादित वकील अनिल मिश्रा को लेकर है, जिन्होंने सरकार को स्वर्ण विरोधी बताते हए दलित हितैषी करार दिया है। अनिल मिश्रा ने कहा कि सरकार दोनो समुदाय के साथ दोहरा व्यावहार कर रही है, जब सवर्ण किसी आंदोलन की परमिशन मांगते है तो उन्हें साफ इंकार कर दिया जाता है लेकिन जब वहीं यहां एससी एसटी वाला कोई आ जाता है तो उन्हें पुलिस की सुरक्षा देकर आंदोलन कराया जाता है। अनिल मिश्रा ने बाराबंकी में हुए आजाद के प्रोग्राम को लेकर सरकार को घेरते हुए कहा कि करणी सेना के अभिनव शर्मा ने केवल बात कही थी कि बाराबंकी में प्रोग्राम नहीं होना चाहिए ।

लेकिन उन्हें न केवल करणी सेना से निकाल दिया बल्कि पुलिस ने सुरक्षा देकर प्रेग्राम करवाया..ये सरकार पूरी तरह से सवर्ण विरोधी है.. जो कभी नहीं चाहती है कि सवर्ण आगे बढ़ें उन्हें उनका अधिकार मिले। हैरानी की बात है कि यूपी हो या एमपी.. दलितो की स्थिति कितनी बुरी है वो किसी से छिपी नहीं है.. ये भीम आर्मी चीफ की हिम्मत है कि वो दलितों और पिछड़ो के लिए संवैधानिक रूप से लड़ रहे है.. बिना किसी के बारे में कुउ गलत कहें.. बिना कानून तोड़े..तो भला किस आधार पर कानून उन्हें रोक सकती है.. लेकिन अनिल मिश्रा ने उसे भी सरकार और आजाद की मिली भगत बता दिया है। ऐसे में देखना ये होगा कि क्या आजाद अनिल मिश्रा के आरोपो का कोई पलटवार करेंगे, और क्या वाकई में करना चाहिए।

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