उत्तराखंड के जंगलों से तस्करी हो रही बौद्ध धर्म की कीमती लकड़ी, चीन, तिब्बत और नेपाल में है मांग

Kajal Kath Wood, Buddhism Precious Wood
Source: Google

Precious wood of Buddhism:  जैसे हिंदू धर्म में चंदन की लकड़ी का महत्व है. वैसे ही बौद्ध धर्म में भी एक ऐसी ही लकड़ी है, जिसका महत्व सबसे ज्यादा है. हर बौद्ध भिक्षु के पास इस लकड़ी से बने पात्र नजर आते हैं. लेकिन ब्राह्मणवादियों ने बौद्ध धर्म को इस कदर दबाया कि इससे जुड़ी तमाम चीजें आज तक बाहर ही नहीं निकल पाई हैं. बौद्ध धर्म में पवित्रता का प्रतीक बनी इस लकड़ी का नाम है काजल-काठ. यह वैसी लकड़ी है जिसे पाने के लिए आज भी लोग पहाड़ों के जंगल छान मारते हैं और इसकी कालाबाजारी इतनी ज्यादा है कि भारत से बाहर निकलते ही इसकी कीमत 70-80 लाख रुपये पहुंच जाती है.

बौद्ध धर्म की कीमती लकड़ी काजल-काठ

दरअसल, उत्तराखंड के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ियों पर और यहां के जंगलों में काजल-काठ लकड़ी मिलती है. यह काफी दुर्लभ लकड़ी है और इस लकड़ी की उपलब्धता किसी खजाने से कम नहीं होती. काजल नाम से आपको लग सकता है कि ये शायद कोई काली या गहरी लकड़ी होगी लेकिन इसकी असली पहचान सिर्फ जानकार ही कर सकते हैं. काजल-काठ लकड़ी बेहद सुगंधित, टिकाऊ और दुर्लभ होती है. बौद्ध धर्म में इसकी इतनी महत्ता है कि भिक्षु इस लकड़ी से अपने खाने-पीने के बर्तन यानी बाउल बनवाते हैं.

काजल-काठ की मेडिटेशन बाउल

कहा जाता है कि इस लकड़ी से बने बाउल में अगर कोई भोजन करे या पानी पिए तो उसका मन शांत होता है और ध्यान की शक्ति बढ़ती है. यानी इस लकड़ी से सिर्फ बर्तन नहीं बनते बल्कि यह आध्यात्मिक ऊर्जा का वाहक मानी जाती है और बौद्ध धर्म में इसकी काफी मान्यता है. यही कारण है कि नेपाल, चीन और तिब्बत जैसे देशों में इस लकड़ी से बने बाउल की मांग काफी ज्य़ादा है. नेपाल में तो इन्हें मेडिटेशन बाउल कहा जाता है, जहां भिक्षु और अनुयायी इन्हें पूजा, ध्यान और औषधीय उपयोगों में इस्तेमाल करते हैं.

लाखों रुपये प्रति बाउल कीमत

भारत के उत्तराखंड के जंगलों से जब ये लकड़ी चोरी-छिपे निकलती है तो सीमाओं को पार करते ही इसकी कीमत लाखों रुपये प्रति बाउल तक पहुंच जाती है. यही वजह है कि काजल-काठ की तस्करी लगातार बढ़ रही है और ये अब सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय कारोबार का रूप ले चुकी है.

हाल ही में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की. डुंडा चौकी पुलिस ने एक यूटिलिटी वाहन को रोका और जब उसकी तलाशी ली गई तो हर किसी की आंखें फटी रह गई. इस वाहन में काजल-काठ लकड़ी के 597 टुकड़े छिपाए गए थे. पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मौके से 2 लोगों को गिरफ्तार किया. गिरफ्तार किए गए लोगों में एक का नाम गोपाल बोहरा है, जो नेपाल का रहने वाला है लेकिन इन दिनों देहरादून में रह रहा था.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में 60 से 70 लाख रुपये कीमत

जबकि दूसरा आरोपी विजय, उत्तरकाशी का ही स्थानीय निवासी है. पुलिस की जांच में यह पता चला कि ये लकड़ी अगोड़ा इलाके के जंगलों से काटी गई थी और इसे सहारनपुर होते हुए नेपाल भेजने की तैयारी थी. वन विभाग के मुताबिक, बरामद की गई काजल-काठ की लकड़ी की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 60 से 70 लाख रुपये आंकी गई है.

काजल की लकड़ी में एक विशेष औषधीय तत्व

अब सवाल ये है कि आखिर बौद्ध धर्म में इस लकड़ी को इतना खास क्यों माना जाता है? इसका जवाब बौद्ध धर्मग्रंथों में मिलता है. बौद्ध मान्यता के अनुसार, काजल की लकड़ी में एक विशेष औषधीय तत्व होता है, जो शरीर और मन दोनों को शुद्ध करता है. कहा जाता है कि भगवान बुद्ध के समय में भी भिक्षु इसी लकड़ी से बने बाउल में जल और भोजन ग्रहण करते थे.

नेपाल और तिब्बत के कई मठों में आज भी परंपरा है कि दीक्षा के समय नव-भिक्षु को काजल-काठी का बाउल भेंट किया जाता है, जो उसके तप, संयम और आध्यात्मिक सफर की निशानी होती है.आपको बता दें कि उत्तराखंड के जंगलों से यह लकड़ी अब धीरे-धीरे गायब हो रही है. स्थानीय वन विभाग ने इसे प्रतिबंधित श्रेणी में रखा है लेकिन अभी भी इसकी तस्करी जमकर हो रही है..जिस पर और मुस्तैदी दिखाने की आवश्यकता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *