कौन थीं सुमित्रा देवी? जिन्हें राजनीति में लोहा मनवाने के कारण मिला बिहार की इंदिरा गांधी का खिताब

Sumitra Devi, Sumitra Devi Struggle
Source: Google

Who was Sumitra Devi: सदियों में कोई कोई ही ऐसा सशक्त व्यक्ति होता है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाता है, एक ऐसी ही शख्सियत थी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी..जिन्होंने अपनी सूझबूझ के दम पर न केवल बांग्लादेश को आजाद कराया था बल्कि उन्होंने भारत का एक और टुकड़ा होने से रोका औऱ खालिस्तान का सपना देखने वालों के सपने पर पानी फेर दिया था.. इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर शख्सियत का दुबारा होना मुम्किन तो नहीं है लेकिन एक ऐसी महिला जरूर हुई, जिन्होंने वो मुकाम हासिल किया जिसके लिए लोग सालों जूते घिसते है।

जिन्हें क्रेडिट मिलता है बिहार की पहली महिला कैबिनेट मिनिस्टर होने का। जिनका प्रभाव तब ऐसा था कि लोग उन्हें बिहार की इंदिरा गांधी कहने लगे थे, अपने इस लेख  में हम बिहार की इंदिरा गांधी सुमित्रा देवी के बारे में जानेंगे, जिन्होंने एक दलित जाति से होने के बाद भी बिहार के पुरुष प्रधान समाज को अपने आगे झुकने पर मजबूर करके जनता का भरोसा जीता था, वो भी उस दौर में जब जातिवाद के कारण बिहार की राजनीति में दलितों के जगह कम थी। अपने इस वीडियो में हम सुमित्रा देवी के बारे में जानेंगे।

कौन थी सुमित्रा देवी – Who was Sumitra Devi?

अभी बीते साल 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए थे, इन चुनावों में 258 सीटों पर महिला उम्मीदवार थी, लेकिन विडंबना देखिये कि मात्र 28 सीटो पर ही महिला उम्मीदवार जीत सकीं.. यानि की बात साफ है कि बिहार का पुरुष प्रधान समाज कभी महिलाओं को शसक्त होते नहीं देखना चाहता है। मगर करीब 74 साल पहले एक दलित महिला सुमित्रा देवी ने पुरूषो को न केवल टक्कर दी थी बल्कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस  की तरफ से जीत कर विधायक भी बनी थी।

सुमित्रा देवी का जन्म बिहार के मुंगेर जिले में 25 सितंबर साल 1922 को एक कुशवाहा जाति में हुआ था। पिता सिद्धेश्वर प्रसाद कुशवाहा ने सारी बेड़ियो को तोड़ते हुए बेटी तो पढ़ाने का फैसला किया.. जबकि उस जमाने में बेटी के पढ़ाने को लेकर समाज खिलाफ रहता था, और ऐसे में दलितों की बेटी को पढ़ाने की बात तो भूल ही जाइये, लेकिन सुमित्रा के पिता ने किसी की भी नहीं सुनी और बेटी के पढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश के हाथरस स्थित गुरुकुल में करा दिया।

सुमित्रा देवी ने बिहार में शिक्षा अभियान चलाया

पिता की सारी मेहनत रंग लाई, औऱ सुमित्रा ने अपने पिता को निराश नहीं किया। 1936 में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से  पास कर सुमित्रा ने न केवल अपने पिता का भरोसा बनाये रखा, बल्कि अपने समाज को ये भी संदेश दिया कि जरूरत है तो बस पंखो की, उड़ान तो उनकी बेटियां खुद भर लेंगी। दसवीं पास करने के बाद उनकी शादी भोजपुर जिले के जगदीशपुर अनुमंडल के निवासी ज्ञानेश्वर प्रसाद से कर दी गई, लेकिन शादी के बाद भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।

पिता की तरह पति भी प्रगतिशील सोच के धनी थे, सुमित्रा की पढ़ाई में उन्होंने पूरी मदद की औऱ अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उन दिनों उनके पति देश की आजादी के आंदोलन में शामिल होते थे, उन्होंने गौर किया कि सुमित्रा एक बेहतरीन वक्ता है, बस फिर क्या था, पति ने सामाजिक कार्यों शामिल होने और उन्हें संबोधित करने के लिए प्रेरित किया। पति के सहयोग से सुमित्रा देवी ने बिहार की पिछड़ी और दलित महिलाओं की शिक्षा के लिए अभियान चलाया।

पहली बार जगदीशपुर विधानसभा सीट से चुनाव में खड़ी हुई

वो हिंदी और इंग्लिश दोनो भाषाओं को बखूबी बोलती थी, जिसका फायदा उन्हें लोगो में जागरूकता फैलाने में हुआ.. एक मुखर वक्ता होने के कारण वो 1942 में पहली बार आरा नगरपालिका की सदस्य चुनी गई.. धीरे धीरे वो बिहार की राजनीति में सिक्का जमाने लगी, और कांग्रेस पार्टी का हिस्सा बन गई। साल 1952 में वो पहली बार जगदीशपुर विधानसभा सीट से चुनाव में खड़ी हुई.. और जीत कर विधायक बनी, जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, 1957  में पीरो विधानसभा सीट से, 1962 में वे आरा विधानसभा सीट से , 1967 में भी वे आरा से ही विधायक चुनी गई, लेकिन 1969 में वो हार गई मगर 1972  में उन्होंने वापसी की और फिर से आरा से जीत दर्ज की, 1977 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी का दामन थामा औऱ 1977  में वो आरा से फिर सो विधायक चुनी गई।

जब कहलाई बिहार की इंदिरा गांधी

दरअसल सुमित्रा देवी जब विधानसभा में खड़ी होकर भाषण देती थी तो सभी उन्हें सुनने को मजबूर हो जाते थे, उनके प्रभावशाली भाषण और एक दलित महिला का इतना शसक्त होना बिहार की जनता को लुभा गया था, जिसके कारण साल 1963  में जब विनोदानंद झा  बिहार के सीएम पद पर थे, तब पहली बार सुमित्रा देवी को कैबिनेट मंत्री चुना गया और उन्हें एक नहीं बल्कि दो दो विभाग दिया गया, सूचना प्रसारण और परिवार नियोजन मंत्रालय। बिहार की राजनीति में किसी महिला को पहली बार महिला कैबिनेट मंत्री का पद मिला था और वो भी एक दलित जाति से आने वाली महिला को। सुमित्रा देवी की प्रभावशाली छवि के कारण उन्हें बिहार की इंदिरा गांधी कहा जाने लगा था।

सुमित्रा देवी भले ही दलित थी लेकिन उन्होंने सभी को बराबरी से देखा, उन्होंने महिलाओं को, पिछड़ो को बराबरी देने के लिए काम किया.. किसान कॉलेज सोहसराय को सुमित्रा देवी ने ही शुरु किया था, शिक्षा का महत्व वो जानती थी, इसलिए सभी को शिक्षा मिले इसके लिए उन्होंने अपनी सारी संपत्ति खर्च कर दी थी।

भारत के पूर्व पीएम से रिश्ता

सुमित्रा देवी की शिक्षा ने उन्हें जातपात के बंधन  मुक्त कर दिया था, जिसका नतीजा ये हुआ कि उन्होने पिछड़ी जाति से होकर भी भारत के एक दलित नेता जो पीएम बनते बनते रह गए थे, जगजीवन राम, जो कि दलित जाति से आते थे, उनकी बेटी को अपने घर की बड़ी बहू बना लिया था। जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार की शादी सुमित्रा देवी ने अपने बड़े बेटे मंजुल कुमार से करवा दी थी… ये फैसला राजनीति और सामाजिक रूप से काफी क्रांतिकारी था। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार उनकी ही बड़ी बहू है।

सुमिता देवी ने पटना शहर की आज की रूपरेखा को तैयार किया था, मौर्य लोक की स्थापना में नेतृत्व देने का श्रैय भी उन्हें ही जाना जाता है जो पटना का पहला शॉपिंग कॉम्पलैक्स भी है। 3 फरवरी 2001 को उम्र संबंधी समस्या के कारण उनका निधन हो गया। सुमित्रा देवी पूरे जीवन दूसरों के लिए जीती रही.. उन्होंने खुद को ऐसा बनाया कि कोई उनसे टकराने से पहले 100 बार सोचे.. और वो भी दलित होकर.. जो सबूत है कि शिक्षा आपको वो ताकत देती है जो आपको सबसे ऊपर रखता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *