Buddhism: तीसरी शताब्दी में जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया, तो उन्होंने बौद्ध धर्म को केवल भारत में ही नहीं बल्कि भारत के पड़ोसी देशों में भी विस्तार करने के लिए कार्य किये। अशोक ने अपने गुरू के कहने पर 84000 बौद्द विहारों और स्तूप का निर्माण कराया, जिनमें से कई के अवशेष अब भी मौजूद है। तीसरी शताब्दी के बाद बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा और वो तेजी से फला फूला औऱ फैला था। लेकिन 11वी-12वी शताब्दी के बाद भारत से बौद्ध धर्म का पतन होने लगा।
खासकर जब हिंदू राजाओं का फिर से उदय शुरु हुआ और मुस्लिम शासको ने भारत की धरती पर पैर जमाना आरंभ किया तो बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होता चला गया और एक वक्त ऐसा आया जब बौद्द अनुयायी बौद्ध धर्म छोड़ कर दूसरे धर्मों को अपनाने लगे। लेकिन सवाल ये उठता है कि कभी सबसे ताकतवर माना जाने वाला धर्म कैसे इतना प्रभावहीन धर्म हो गया। इस सवाल का जवाब ढूंढ निकाला है ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने। तो चलिए जानते हैं कि बौद्ध धर्म के पतन का कारण और ब्रिटिश पुरातत्वविदों की खोज के बारे में जानते हैं।
बौद्ध धर्म के पतन का कारण
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने बौद्ध धर्म का उदय अस्त, पुनरोदय” नामक किताब में बौद्ध धर्म के उदय से लेकर अस्त होने के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने बताया कि बौद्ध धर्म जो कि भारत से निकला, अशोक के प्रचार के कारण एक समय में पूरे भारत में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं थी जहां बौद्ध विहार, औऱ मठ न हो। यानि की बौद्ध धर्म तब इतना शाक्तिशाली हो चुका था, कि उसने पूरे भारत में अपना प्रभाव बना लिया था। लेकिन बौद्ध धर्म के विस्तार से सबसे ज्यादा जिन्हें नुकसान हुआ, वो था ब्राह्मणी परंपरा को मानने वाले। अक्सर बौद्ध अनुयायी और सनातनी ब्राह्मणों में विवाद हो जाया करता था।
बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा धार्मिक अनुष्ठान
एक समान रूपता वाले बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा धार्मिक अनुष्ठान जैसी चीजो के बजाय आध्यात्म ज्ञान और साधना पर ध्यान ज्यादा दिया जाता था, जिससे ब्राह्मणी सोच के लोगो की दुकान बंद होने लगी…बौद्ध धर्म में सबसे ज्यादा जातिवादी भेदभाव पर चोट पड़ी थी, जिससे ब्राह्मणों की बनाई व्यवस्था उखड़ने लगी थी। बौद्ध धर्म को मानने वाले अहिंसा के रास्ते पर चलने को कहते और बलि प्रथा के खिलाफ थे। वो कहते थे कि ईश्वर केवल एक अंधविश्वास है जिसे ब्राह्मणों ने अपने मतलब के लिए लोगो को डराने के लिए कल्पनिक तौर पर गढ़ा है।
बौद्ध धर्म का पतन शुंग राज के आने के बाद शुरू
हालांकि बौद्ध धर्म का पतन शुंग राज के आने के बाद शुरू हुआ। इतिहासकार मानते है कि उड़ीसा के पुरी में एक समय में बहुत बड़ा बौद्ध विहार था, लेकिन ब्राह्मणों की धूर्त चाल का शिकार शुंग वंश का राजा पुष्यमित्र भी हो गया, और उसने सामूहिक रूप से बौद्ध भिक्षुओं की हत्याएं की, उनके मठो को उजाड़ दिया गया। आर्थिक तौर पर उनकी सहायता बंद कर दी गई, उनके मठो को अलग थलग कर दिया गया, भ्रष्टाचार बढ़ने लगा, लोगों का विश्वास बौद्ध धर्म के प्रति कमजोर होने लगा, जिससे वो वापिस हिंदू धर्म में लौटने लगे। धीरे धीरे 10 सदी के बाद बौद्ध धर्म के समुदायों में भी बंटवारा हो गया।
हजारों की संख्य में बौद्ध स्तूप तोड़े
महायान के अलावा थेरवाद, हीनयान जैसी समुदाय बन गए जो बौद्ध धर्म के नियमों को अपने अनुसार तोड़ मरोड़ कर मानने लगे, जिससे लोगों का बंटवारा होने लगा। बौद्ध धर्म धीरे धीरे आर्थिक रूप से कमजोर होने लगा और भारत में अलग थलग पड़ गया। हिंदू राजाओं के प्रभाव के बढ़ने के साथ साथ इस्लामिक शक्तियां भी बढ़ी। मुसलिम शासकों ने नालंदा विश्व विद्यालय और तक्षशिला जैसी प्रमुख बौद्ध शिक्षा के संस्थाओं को सबसे ज्यादा क्षति पहुंचाया। हजारों की संख्य में बौद्ध स्तूप तोड़े गए। कई स्थानों में तो पूरी तरह से बौद्ध धर्म को खत्म करने के लिए उनके साक्ष्यों को मिटा दिया गया। स्थानीय झगड़ो और बौद्ध अनुयायी की कमजोर संगठन के कारण ही महाबोधि मंदिर का पतन हुआ..और शायद यहीं कारण था कि बौद्ध धर्म भी धीरे धीरे कमजोर होता गया।
ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने फिर से खोजा बौद्ध धर्म
दरअसल मुगलो के आने के बाद बौद्द धर्म पूरी तरह से भारत से खत्म ही हो गया। लेकिन जब ब्रिटिश भारत में आये तो उन्होंने बौद्ध धर्म को दुबारा खोजना शुरु किया, जिसके पीछे का एक कारण ये भी रहा होगा कि ईसाईयों के भगवान ईसा मसीह खुद भारत में बौद्ध धर्म के बारे में जानने आये थे लेकिन पुरी में बौद्ध मठो की स्थिति देखकर वो तिब्बत की तरफ चले गए और तिब्बत में बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को लेकर वापिस लौट गए।
भारत में पहली बार पुरातत्व विभाग बना
1861 में पहली बार भारत में पुरातत्व विभाग बनाया गया, और इस विभाग के पहले पुरातत्वविद सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने मुख्यत बौद्ध धर्म को लेकर ही खोजबीन की, जिस कड़ी में उन्होंने तक्षशिला से लेकर सांची, सारनाथ और बोधगया तक के प्राचीन स्थलों की पहचान की और उनका मानचित्र तैयार किया था, जो कि स्तूपों और बौद्ध अवशेषों के आधार पर बनाया गया। उन्होने ही अपनी खोज में महाबोधि मंदिर खोजा, बोधि वृक्ष की महत्ता को समझा, और उसकी एक जड़ सारनाथ में भी उगाई। कहते है कि अभी हमें जो महाबोधि वृक्ष दिखता है वो अपने मूल सरचनाओं से काफी अलग है।
इतना ही नहीं नालंदा विश्वविद्यालय में बौदध धर्म कितना शसक्त था उसकी जांच के लिए वहां भी खुदाई की गई। वहां पर विशाल प्रांगण, मठ और व्याख्यान कक्ष के साथ साथ 108 मठीय खंड मिले, जिनके बारे में पहले यूरोप के विश्वविद्यालयों ने भी चर्चा नहीं की थी। हालांकि समय के साथ मानसिकता बदलती गई और लोगो पर सनातन और इस्लाम पूरी तरह से हावी हो गया। दुख की बात तो ये है कि बौद्ध तीर्थ स्थल में विदेशी बौद्ध लोग तो ज्यादा है लेकिन भारतीय कम है। बौद्ध अवशोषो पर अब भी जांच जारी है, लेकिन इस बात झुठलाया नहीं जा सकता है कि भारत में वर्तमान में बौद्ध धर्म काफी कमजोर है।



