Moradabad news: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है। यूपी के मुरादाबाद (Moradabad) में रहने वाले एक बीएलओ (BLO) सर्वेश सिंह ने सोशल मीडिया पहले एक वीडियो बनाया और फिर फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली। सर्वेश ने एक सुसाईड नोट भी छोड़ा है, जिसमें उन्होंने बताया कि वो सरकार के उच्च अधिकारियों का दवाब झेल नहीं पा रहे है।
वो अपना वर्क टारगेट पूरा नहीं कर पा रहे है, समय कम है और काम बहुत ज्यादा.. उनका सुसाईड लेटर उनके तकलीफो और प्रशेर की प्रत्यक्ष कहानी कह रहा है..अब सवाल ये है कि आखिर किस काम का दवाब था सर्वेश पर… और किस का टारगेट पूरा करने के लिए उनके उच्च अधिकारी उन पर दवाब बना रहे थे.. तो चलिए आज एक बड़े खेल से पर्दा हटाते है।
संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने की साजिश
इन दिनों देश में केंद्र सरकार ने SIR यानि की (Special Intensive Revision) की मुहीम शुरु कर दी है। जिसे लेकर एक तरफ विपक्ष काफी विरोध कर रहा है, तो वहीं सरकार इसे देश में गैर कानूनी तरीके से रह रहे रोहिंग्या और बंगलादेशियो (Rohingyas and Bangladeshis) के खिलाफ बड़ा कदम बता रही है…वहीं विपक्ष का कहना है कि SIR की आड़ में देश के दलितों, पिछड़ो और गरीब तबके के लोगो के खिलाफ बड़ी साजिश चल रही है। न केवल उनके संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने की साजिश है बल्कि संविधान से एससी एसटी (SC-ST) और ओबीसी (OBC) वर्ग को मिले आरक्षण को भी पूरी तरह से खत्म करने की तैयारी चल रही है।
जिस कारण एसआईआर का पुरजोर विरोध हो रहा है, वहीं केंद्र और कई राज्य की सरकारें इसे जल्द से जल्द पूरा कर लेना चाहती है..अब सवाल ये है कि आखिर क्या है एसआईआर..और क्यों हो रहा है इसका विरोध..साथ ही कैसे ये दलितों और पिछड़ों के खिलाफ गहरी साजिश का संकेत दे रही है।
एसआईआर (SIR) क्या है?
सबसे पहले ये जानते है कि आखिर एसआईआर है क्या SIR यानी Special Inquiry Report, जिसे देश की चुनाव आयोग जमा कर रही है, इस रिपोर्ट में देश में रहने वाले वोटर्स, का सहीं और सटीक जानकारी रखी जा रही है, ताकि वो वोटर्स लिस्ट में सही तरीके से दर्ज हो। जो कि चुनाव आयोग विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले अपडेट करती है। इसे Special Summary Revision कहा जाता है।
बीएलओ (BLO) यानि की ब्लॉक लेवल ऑफिसर, जो लोगो के घर घर जाकर नाम, पता, उम्र और परिवार के सदस्यों की सही जानकारी वेरिफाई करता है। जब चुनाव आता है तो हर बार वेरिफिकेशन होता है, जिसमें ये बताया जाता है कि की सदस्य जो 18 साल का हुआ हो, या फिर किसी की मृत्यु हुई हो, या कोई बाहर चला गया हो, या फिर कोई डुप्लीकेट तो नहीं है। बीएलओ सभी दस्तावेजो की कॉपी ही लेता है साथ ही किसी तरह की कोई चार्जेस नहीं लिये जाते है। वैसे तो ये एक सामान्य प्रक्रिया है, जो हर एक वोटर्स के लिऐ उनके भारतीय नागरिक होने की पहचान है।
क्यों लग रहे है ये आरोप जानें
दरअसल बिहार विधानसभा चुनावों के बाद चुनाव आयोग ने अगले साल होने वाले चुनावों को लेकर करीब 12 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर गणना करने के आदेश जारी कर दिये है। जिसके लिए चार नवंबर से शुरू हुए एसआईआर के इस दूसरे चरण के तहत इस काम को एक महीने के भीतर यानी चार दिसंबर तक पूरा करना है, वहीं विपक्ष ने कहा कि इसमें इतनी जल्दबाजी इसीलिए की जा रही है ताकि सबके नाम इसमें शामिल न हो सकें, और खासकर दलितों औप पिछड़ो को अलग थलग किया जा सकें।
एसआईआर (SIR) का टारगेट पूरा करना कठीन
वहीं राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने ये भी कहा कि एसआईआर (SIR) का टारगेट पूरा करना इतना कठीन है कि दवाब में आकर 6 राज्यों में अब तक 16 बीएलओ नै आत्महत्या कर ली है। वहीं विपक्ष का कहना है कि एसआईआर की आड़ में वो लोगो की नागरिकता को भी रद्द करने की बड़ी साजिश कर रहे है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहले ही साफ कर चुका है कि एसआईआर केवल वोटर्स की सटीक जानकारी की प्रक्रिया मात्र है। बता दें कि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव आयोग को केंद्र सरकार की कठपुतली कह रहा है। चुनाव आयोग पर विपक्ष ने पक्षपात करने, वोट चोरी, इलेक्शन सिक्यूरिटी और वोटर लिस्ट में घपलेबाजी करने के भी आरोप लगाये गए है।
क्यों कहा जा रहा है दलित विरोधी
विपक्ष सरकार और चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहा है कि एसआईआर के जरिये दलितों और पिछड़ो की नागरिकता को ही छीनने की प्लानिंग चल रही है। जानबूझ कर दलितों और पिछड़ो को अनदेखा कर के उनके नाम वोटर लिस्ट से निकालने की तैयारी चल रही है। बिहार चुनावों में भी विपक्ष आरोप लगा रही थी कि बीएलओ असल में दलितों की बस्ती में जाते ही नहीं है, या फिर उनके न पढ़े लिखे होने का गलत फायदा उठाया जा रहा है, और फॉर्म भरने के नाम पर उनके साथ धोखाधड़ी की जा रही है।
हालांकि बिहार चुनाव के जो नतीजे आये, उसके बाद जनता के मन में विपक्ष के प्रति थोड़ा सा अविश्वास जरूर होने लगा है। हालांकि दलितों की बस्ती उजाड़ने का एसआईआर की कनेक्शन हो सकता है लेकिन विपक्ष कभी इसे पूरी तरह से साबित नहीं कर पाई है। खासकर सुप्रीम कोर्ट की सफाई के बाद तो एसआईआर का विरोध सही है या गलत, ये अब वाकई में चर्चा का विषय बन गया है। वैसे आपकी क्या राय है.. क्या वाकई में एसआईआर दलितों और पिछड़ो के विरोधी है।



