Mayawati Comeback: मायावती 14 साल बाद नोएडा लौटीं, बीएसपी की नजर पश्चिमी यूपी में वापसी पर

Mayawati, Mayawati Rally in Noida
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Mayawati’s return to Noida: 6 दिसंबर को दलितों के मसीहा और पिछडों के लिए एक मजबूत नेता बाबा साहब भीम राव अंबेडकर (Baba Saheb Bhim Rao Ambedkar) के परिनिर्वान दिवस, कई मामलों में राजनैतिक तौर बेहद अहम और नाजुक माना जा रहा है। खासकर पूरी तरह से डूब चुकी यूपी की सबसे बड़ी बहुजन पार्टी बसपा के लिए.. 2007 में कभी यूपी की सबसे बड़ी पार्टी रहने वाले बसपा का 2022 में जो हश्र हुआ..उसके बाद फिर से उसके खड़े होने की कोशिश का नया उदाहरण सामने आया है। जी हां, बीते महीने 9 अक्टूबर को बसपा के संस्थापक कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस के दिन लखनऊ (Lucknow) में हुई बसपा की रैली में ऐतिहासिक भीड़ के बाद बहुजन समाज पार्टी के हौसलो को फिर से उड़ान मिलने लगी है।

वो इस बदलाव को भुनाने का मौका किसी भी हाल में छोड़ना नहीं चाहती। जनता का ध्यान फिर से बसपा (BSP) की ओर ही रहे इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक दांव की तैयारी की जा रही है। दरअसल बसपा सुप्रीमा मायावती 14 सालों के बाद आखिरकार नोएडा (Noida) की धरती पर कदम रखने जा रही है। ये रैली बसपा की शक्ति प्रदर्शन करने के लिए की जा रही हैं, और इसे पश्चिमी यूपी में बसपा की “वापसी की शुरुआत” भी माना जा रहा है। 6 दिसंबर को राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल (National Dalit Prena sthal) में बसपा की नई रणनीतिक रैली की जायेगी जो कि लखनऊ की लोकप्रियता को भुनाने का काम करने वाली है।

लखनऊ की रैली से बढ़ा मनोबल, अब नजर नोएडा पर

दरअसल 9 अक्टूबर को बसपा द्वारा लखनऊ में कांशीराम परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित रैली में लाखों की भीड़ उमड़ी थी। एक लंबे समय के बाद ऐसी भीड़ बसपा कार्यकर्ताओं के लिए मनोबल बढ़ाने वाली साबित हुई। इसी ऊर्जा को आगे बढ़ाते हुए अब पार्टी नोएडा में अपने शक्ति प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। नोएडा का कार्यक्रम सिर्फ एक श्रद्धांजलि सभा नहीं, बल्कि बसपा के राजनीतिक पुनरुत्थान का इशारा माना जा रहा है।

14 साल बाद नोएडा में मायावती की वापसी

मायावती पिछले 14 सालो से नोएडा नहीं आई है। आखिरी बार 2011 में सीएम रहते हुए ही वो नोएडा दौरे पर आई थी। लेकिन 14 साल बाद उनका यहां लौटना, अपने आप में एक राजनीतिक संदेश देता है कि बसपा अब रि एक्टिव मोड में आ चुका है और आगामी 2027 विधानसभा चुनावों के लिए कमर कस ली गई है।

बसपा की गिरती ग्राफ की बड़ी कहानी

2007 में बसपा को 206 सीटों पर प्रचंड बहुमत मिली, मायावती चौथी बार सीएम बनी और बसपा सत्ता में आई लेकिन 2012 में सब बदलने लगा. हर चुनाव में बसपा ग्राफ गिरता गया जिसमें 2012 में बसपा को मात्र 80 सीटें मिली तो वहीं 2017 में 19 सीटें और 2022 की तो बात ही न की जायें तो बेहतर, बसपा मात्र 1 सीट पर सिमट गई थी। लेकिन पार्टी अब फिर से अपनी स्थिति सुधारने की राह पर आगे बढ़ रही है और नोएडा का कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण कोशिश है।

इतनी तैयारी क्यों? पश्चिमी यूपी में खोया जनाधार वापस पाने की कोशिश

2012 से पहले बसपा का सबसे ज्यादा प्रभाव पश्चिमी यूपी पर था। लेकिन जैसे जैसे पार्टी कमजोर पड़ा प्रभाव भी कम होता गया। रिपोर्ट्स की माने दलित मतदाता सबसे ज्यादा बिखर गए, मुस्लिम मतदाता सपा की ओर चले गए। वहीं विपक्ष ने बसपा को लेकर यह नैरेटिव बना दिया कि बसपा बीजेपी के इशारे पर चल रही है। जिससे कहीं न कहीं दलित और मुस्लिम वोटर्स ने बसपा को छोड़ना शुरु कर दिया।

लखनऊ भीड़ से छवि सुधरेगी

लखनऊ की भीड़ से मायावती ने कहीं न कही इस नैरेटिव को तोड़ने की कोशिश की और अब नोएडा उनके उसी आत्मविश्वास का दूसरा चरण है। इस मुद्दे पर गौतमबुद्ध नगर के जिलाध्यक्ष लख्मी सिंह की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में पश्चिमी यूपी के कई जिलों से वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए थे, जिन्हें खासकर ये आदेश जारी किया गया कि बसपा को बूथ स्तर तक पहुंच बनाने की जरूरत है। रैलियों में अधिकतम भीड़ जुटाई जाए, सोशल मीडिया पर कैंपेन तेज किया जाए, और सबसे जरूरी पार्टी छोड़ चुके वोटरों को वापस बसपा से जोड़ा जायें। बसपा की प्लानिंग बता रही है कि बसपा चुनाव मोड में आ चुकी है।

दलितमुस्लिम गठजोड़ की तैयारी

पश्चिमी यूपी में दलितों में जाटव समाज सबसे ज्यादा है, कुछ जिलों में 30% तक।
वहीं मुस्लिम आबादी भी यहां निर्णायक है। इसीलिए बसपा ने पश्चिम यूपी की कमान अपने मुस्लिम चेहरे नौशाद अली को दी है। यह साफ संकेत है कि मायावती इस बार दलित + मुस्लिम करके मजबूत चुनावी समीकरण बनाने की कोशिश में हैं।

चंद्रशेखर को काउंटर करने का भी लक्ष्य

पश्चिमी यूपी में दलित राजनीति में बसपा का समीकरण बिगाड़ने वाले और नई पहचान बनकर उभरे आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद बसपा के लिए बड़ी चुनौती तो थे लेकिन पिछले कुछ समय से उनसे जुड़े विवादों के कारण उनकी छवि को नुकसान हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि बसपा इस सभा के जरिए दिखाना चाहती है कि दलितों का असली भरोसा अभी भी मायावती पर ही है।

नोएडा बसपा की छवि सुधारने में अहम है क्योंकि वो दिल्ली के पास है, जिससे मीडिया कवरेज आसान है और हरियाणा और दिल्ली के बसपा कार्यकर्ताओं की बड़ी उपस्थिति भी संभव है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक इस कार्यक्रम में 1 से 2 लाख लोगो के आने की संभावना है।

मायावती के आने को लेकर सस्पेंस, लेकिन संकेत साफ

हालांकि अभी तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि मायावती आएंगी, लेकिन दिल्ली में उनके मौजूदा ठहराव और पार्टी नेताओं की लगातार तैयारियों से यह लगभग तय माना जा रहा है कि वे 6 दिसंबर को नोएडा पहुंचेंगी। मंच भले न लगाया जाए, पर भीड़ के दम पर बसपा अपनी ताकत दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

2027 की लड़ाई का आगाज यहीं से?

बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल के अनुसार, पश्चिमी यूपी के 6 मंडल आगरा, मेरठ, अलीगढ़, सहारनपुर, मुरादाबाद और बरेली का जनसैलाब नोएडा में जुटेना का लक्ष्य रखा गया है। ये रैली बसपा का सिर्फ शो नहीं, बल्कि 2027 से पहले फिर से मजबूत पहचान बनाने की ताकतवर शुरुआत है। ये मायावती के राष्ट्रीय स्तर पर कमबैक का ऐलान भी माना जा सकता है। नोएडा की भीड़ जुटा कर बसपा संदेश देना चाहती है कि बसपा अब भी फिर से मजबूती से खड़ी होने का ताकत रखती है। दलित–मुस्लिम वोटों में उसकी पकड़ आज भी मजबूत हो सकती है और 2027 में वह फिर से बड़ा खिलाड़ी बनने की तैयारी कर रही है।

वेल लखनऊ की रैली में जमा भीड़, क्या नोएडा में भी नजर आयेगी, ये तो 6 दिसंबर के कार्यक्रम के बाद पता चल ही जायेगा, साथ ही बसपा का भविष्य किस ओर जाने वाला है ये भी तय हो जायेगा।

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