जब भी बात बाबा साहब अंबेडकर (Baba Saheb Ambedkar) के संघर्षों की होती है, उनके उस जीवन की होती है जब वो खुद के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने और उच्च शिक्षा हासिल की जद्दोजहद एक साथ कर रहे थे, तो उस संघर्ष में एक नाम और लिया जाता है जो हमेशा, हर मोड़ पर बाबा साहब के साथ खड़ी रही.. जिनके बारे में हम ये कह सकते है कि बाबा साहब जो कुछ भी बन पाये, जितना नाम कमा पायें, उसके पीछे बाबा साहब की मेहनत के साथ साथ इस दूसरे शख्स का बड़ा त्याग भी शामिल है।
रमा बाई ने आजीवन केवल संघर्ष देखा
जी हां, हम बात कर रहे है बाबा साहब की जीवन संगिनी और पहली पत्नी रमाबाई अंबेडकर की बाबा साहब से मात्र 9 साल की उम्र में ब्याह दी गई रमा बाई ने आजीवन केवल संघर्ष देखा, लेकिन साथ ही आंखों में सपना था अपने पति को बड़ा आदमी बनते देखने का, उन्हें सभ्य समाज का, शिक्षित समाज का हिस्सा बनते हुए देखने का लेकिन इस सपने के रास्ते में जो सबसे बड़ा रोड़ा था वो था पैसा घर के खर्चे के लिए पैसे पूरे नहीं होते थे, तो भला उच्च शिक्षा के लिए कहां से पैसा होगा और तब रमा बाई ने एक बड़ा फैसला लिया था। तो चलिए आपको इस लेख में रमा बाई के उस त्याग के बारे में जिसके कारण बाबा साहब को न केवल उच्च शिक्षा मिली बल्कि आज उन्हें दलितो का मसीहा कहा जाता है।
रमा बाई ने दिया हमेशा साथ
रमा बाई बेहद शांत स्वाभाव की मृदुभाषी महिला था। मातापिता के घर मे बड़ा प्यार से पली बड़ी रमा बाई ने बाबा साहब से शादी के बाद कई अभाव देखे। लेकिन वो बाबा साहब के सपने का भी पूरा सम्मान करती थी। एक तरफ बाबा साहब का परिवार उन्हें घर गृहस्थी संभालने की सीख देता तो रमा बाई उन्हें पढ़ने, शिक्षित होकर बड़ा ओहदा पाने की बात करती थी। बाबा साहब ने बॉम्बे विश्वविद्यालय (Bombay University) से 1912 में ग्रेजुएशन पूरा किया औऱ बड़ौदा राज्य में सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के यहां नौकरी शुरु कर दी, लेकिन उन्हें पढ़ने के लिए विदेश जाना था और बाबा साहब जो भी कमाते थे।
वो उनके लिए पर्याप्त नहीं था, इसलिए सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय ने उन्हें एजुकेशन लॉन देने का फैसला किया और 1913 में वो कोलंबिया विश्वविद्यालय चले गए जहां से उन्होंने 1915 में अर्थशास्त्र में एम.ए की डिग्री प्राप्त की, और फिर नेशनल डेवलपमेंट फॉर इंडिया एंड एनालिटिकल स्टडी’ (National Development for India and Analytical Study) विषय पर शोध करके 1917 में पीएचडी (PHD) की उपाधि प्राप्त की. और उसी साल उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स (London School of Economics) में उन्होंने दाखिला लिया था, लेकिन सयाजी ने और लॉन देने से इंकार कर दिया और मजबूरी में बाबा साहब को वापिस भारत लौटना पड़ा था।
जब पत्नी बनी सबसे बड़ा सहारा
वापिस आने के बाद बाबा साहब को फिर से वहीं जातिवाद, भेदभाव, और आर्थिक अभाव को देखना पड़ा। उनके परिवार में अक्सर जरूरतों को पूरा करने के लिए चीजो को गिरवी रख कर उधार लेते हुए उन्होंने बचपन से ही देखा था। यहां तक कि बाबा साहब के न होने पर रमाबाई ने भी कई बार ऐसा किया था, क्योंकि परिवार अभावो में जी रहा था। अभाव के कारण बाबा साहब के बच्चों की जान चली गई थी, क्योंकि इलाज के लिए पैसे नहीं थे।
गरीबी में परिवार चलाना मुश्किल था तो भला पढ़ाई कहां से पूरी होती..बस फिर क्या था, बाबा साहब की पढ़ाई पूरी करने के लिए रमा बी ने फैसला लिया कि वो अपने गहने साहूकार के पास गिरवी रख देंगी, और उन्होंने वहीं किया। गहने गिरवी रख कर उन्होंने पैसे बाबा साहब को दिए और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करने को कहा।
बाबा साहब ने लंदन में रहते हुए एमएससी और बार एट-लॉ की डिग्री हासिल की थी। हालांकि रमा बाई को उनके गहने वापिस शायद कभी नहीं मिले, क्योंकि वापिस आ कर भी बाबा साहब की इनकम इतनी नहीं थी कि वो परिवार से अलग होकर कुछ खर्च कर सकें, लेकिन रमा बाई के त्याग का उन्होंने सम्मान किया। वो चाहते थे कि रमा बाई भी उनके साथ पढ़ें, ताकि उनके समाज में भी महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया जा सकें लेकिन रमा बाई की शिक्षा के खिलाफ उनका पूरा परिवार था इसलिए वो रमा बाई को कभी पढ़ा लिखा नहीं पायें, लेकिन रमा बाई का स्थान बाबा साहब के जिंदगी में हमेशा बहुत ऊंचा था। रमा बाई के इस त्याग पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।



