Milind Kamble: ये मेरा सौभाग्य था कि महाराष्ट्र में उस समय में पैदा हुआ जब बाबा साहब अंबेडकर का प्रभाव बहुत ज्यादा था, एक दलित समाज से होने के बाद भी मेरे गांव में आर्यसमाजी वातावरण था, जिसके कारण सबको बराबर समझा जाता था, यहां तक की आकाल के वक्त जहां दूसरे गांवों में दलितों को भेदभाव सहना पड़ता था वहीं हमारे गांव में एक ही कुएं से हर जाति का व्यक्ति पानी पी सकता था.. और वो भी खुशी खुशी, मैने या मेरे पिता ने कभी भी जातिगत भेदभाव नहीं सहा, हमें बराबरी का हक मिला था लेकिन फिर भी मैं दलितो की व्यथा को समझ सकता था।
उनकी स्थिति हमसे छिपी नहीं थी और इसीलिए उन्हें शशक्त बनाने के दिशा में उन्होंने दलित चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की स्थापना की. और आने वाले समय में वो 100 अरबपतियों को बनाने का सपना संजोय हुए है.. जी हां, ये बोल है एक गांव से उठकर सालो की मेहनत से अरबपति बनने वाले दलित बिजनसमैन मिलिंद कांबले के। मिलिंद कांबल… जो आज के समय में दलितों के उत्थान के लिए लगातार प्रयासरत है..लेकिन कैसे वो एक गांव से उठ कर आज अरबपति व्यापारी बने। अपने इस वीडियो में हम मिलिंद कांबले की कहानी को जानेंगे..साथ ही कैसे वो इतने बड़े स्तर पर पहुंचे।
जानें कौन है मिलिंद कांबले
17 फ़रवरी, 1967 को महाराष्ट्र के लातूर जिले के चोबली गाँव में प्रहलाद भगवान कांबले के घर बड़े बेटे के रूप में जन्मे थे मिलिंद कांबले। उनके पिता ने औरंगाबाद के मिलिंद महाविद्यालय से ग्रेजुएशन का था, और उसी महाविद्यालय के नाम पर उन्होंने अपने बेटे का नाम मिलिंद रखा था। मिलिंद कांबले का गांव चोबली पर आर्य समाज लोगो की जनसंख्या ज्यादा थी और इस करण उनकी सोच का प्रभाव गांव में भी बहुत ज्यादा देखने को मिलता था। आर्यसमाजी लोग शिक्षा, समाज-सुधार पर ध्यान देते है और ऊँच-नीच, जात-पात में विश्वास नहीं करते है, जिस कारण अकेले उनके गांव में ही जातिगत भेदभाव का असर नहीं थी। इतना ही नहीं मिलिंद के पिता की परवरिश भी एक सवर्ण जाति से आने वाले अन्ना राव पाटिल ने ही की थी, क्योंकि उन्होंने 7 साल की उम्र में ही अपने पिता को खो दिया था।
सवर्ण बाला साहब पाटिल ने मदद की
अन्ना राव पाटिल ने प्रहलाद भगवान कांबले की परवरिश बहुत अच्छे से की और उन्हें पढ़ाया लिखाया भी। एक दलित होते हुए भी उन्हें जातिगत भेदभाव नहीं सहना पड़ा था। इसके बाद हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए दूसरे गांव गए जहां वो एक और सवर्ण बाला साहब पाटिल ने उनकी मदद की थी। सवर्णों की मदद का ही नतीजा था कि ज़िला परिषद स्कूल में उनकी सरकारी नौकरी लग गई। उनका जीवन सवर्णों की ही तरह ही भरपूर खुशियों और अभावो के बिना ही बीता था। उन्हें इस बात की खुशी और सूकून है कि कम से कम उन्हें आसपास के गांवो की तरह भेदभाव वाले माहौल में नहीं रहना पड़ा था।
लेकिन फिर भी वो ये जानते थे कि केवल एक गांव की सोच बदलने से कुछ नहीं होगा, इसके लिए उनका मजबूत होना भी आवश्यक था। सरकारी नौकरी ने पिता का ही नहीं बल्कि मिलिंद का भी सम्मान बढ़ा दिया था। उनकी दी गई शिक्षा के चर्चे दूर दूर तक होते थे। उनका ऐसा प्रभाव था कि जहां दूसरे गांवो में दलितों की बस्ती में सवर्ण जाते तक नहीं थे वहीं उनके पिता से शिक्षा लेने के लिए वो सवर्ण जाति के लोग दलित बस्ती में आते थे।
मिलिंद मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहते
मिलिंद खुद मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहते थे, लेकिन उनके पिता की इच्छा के कारण 1983 में दसवी की परिक्षा देने के बाद नांदेड के पॉलिटेक्निक कॉलेज में सिविल इंजीनियर बनने के लिए डिप्लोमा में एडमिशन करवा दिया। यहां वो पहली बार कॉलेज वीजिट के दौरान एक कंस्ट्रक्शन साइट पर गए जहां वो कांट्रेक्टर विलास बियानी से मिले, जो 5 सालों से कंस्ट्रक्शन में काम कर रहे थे और उनके पास एक पर्सनल जीप थी, जो उन्होंने टेंडर के मुनाफे से लिया था। बियानी उनके कॉलेज के सीनियर स्टूडेंट रह चुके थे। उन्होंने वीजिट करने आये छात्रों को बताया कि कामयाब होने के लिए दृढ़ संकल्प ज़रूरी है, बिना कठोर निश्चय और मेहनत के कामयाबी कभी भी हासिल नहीं की सकती है। यहीं उन्होंने ये तय कर लिया कि वो कारोबारी बनेंगे, सरकारी नौकरी नहीं करेंगे।
दलित पैंथर्स का एकजुट आंदोलन
अपनी पढ़ाई के दौरान मिलिंद दलित पैंथर्स के संपर्क में आ गए थे। वहां उन्होंने देखा कि दलित पैंथर्स दलितों के लिए केवल लड़ाई ही नहीं लड़ रहे है बल्कि वो दलितों को एकजुट करने की भी कोशिश कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने ये भी देखा कि दलित सरकारी अधिकारी आंदोलनों में आते तो थे लेकिन पुलिस के आने के बाद वो अलग हो जाते थे, धीरे धीरे मीलिंद को पता चला कि अगर सरकारी नौकरी वालों को गिरफ्तार कर लेंगे तो उनकी नौकरी चली जायेगी, इसीलिए उन्होंने और तय किया कि वो किसी भी हाल में सरकारी नौकरी नहीं करेंगे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के भी संपर्क में आये और उनके कई दोस्त बने।
साल 1987 में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद भी पिता के बार बार समझाने के बाद भी वो सरकारी नौकरी के लिए तैयार नहीं हुए, कारोबार करना चाहते थे, लेकिन पिता की मदद नहीं लेना चाहते थे, लेकिन मां यशोदा ने उनकी जिद देखी और मिलिंद के हाथों में 500 रूपय देकर कहा कि वो इसे सोच समझ कर खर्च करें, जेब में 500 रूपय और आँखो में बड़ा कारोबारी बनने का सपना लेकर मिलिंद पूणे आ गए।
मिलिंद को पहली नौकरी मिली
लेकिन अब जरूरी था कि कारोबार शुरु करने से पहले कारोबार के गुर सीखे जाये औऱ ज़ॉप माहल्घी एसोसिएट्स नाम की इस कंपनी में मिलिंद को पहली नौकरी मिली औऱ सैलरी थी 700 रूपय। मिलिंद ने फिर महर्षि कर्वे संस्था नाम की दूसरी कंस्ट्रक्शन कंपनी ज्वाइन कर ली। और यहां उन्होंने एक फ्लैट भी किराये पर ले लिया। लेकिन यहां कंपनी मालिक के बहुत बड़े भ्रष्टाचार के बारे में मिलिंद को पता चला और वो लोगो की जिंदगी से किसी कीमत पर खिलवाड़ करने के लिए तैयार नहीं हुए, मजबूरन उनकी नौकरी चली।जिसके बाद मंत्री हाउसिंग कंपनी में उन्हें 3750 रुपये महीना सैलरी में नौकरी मिली।
नौकरी के दौरान शुरु की कंपनी
अपनी तीसरी नौकरी के दौरान ही उन्होंने मिलिंद कांबले सिविल इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स नाम से अपनी कंपनी शुरु की, वो छुट्टी वाले दिन अपने लिए काम तलाशते थे और ये तलाश खत्म हुई उनके पहले ठेके से..जब पुणे के बृहन महाराष्ट कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स (बीएमसीसी) की बाउन्ड्री वॉल बनाने का काम/ठेका मिला। काम छोटा था लेकिन फिर भी मिलिंद को पहला मौका मिला था, और इस जगह पर उनके दो सवर्णों दोस्त भी काम आये, जिन्होंने उन्हें 10 हजार रूपय दिये थे। इस काम ने बीएमसीसी के प्रिंसिपल काफी प्रभावित हुई और उन्होंने मिलिंद को महर्षि कर्वे स्त्री शिक्षण संस्थान मीम मरम्मत के काम का एक ठेका भी दिलवा दिया।
अपने नौकरियों के दौरान उन्होंने न केवल काम के गुर सीखे, बल्कि मजदूरो के बारे में भी जाना। मिस्त्रियों के कामकाज के तरीके, उनकी दिक्कतों, समस्याओं को भी जाना-समझा, और सभी तौर तरीको को जानकर उन्होंने इस इंडस्ट्री में पूरी तरह से कदम रखा। इस दौरान उनकी मुलाकात अनिल मिश्रा से हुई और दोनो ने साथ मिलकर सफलता के झंडे गाड़े। यहां भी मिलिंद दलित थे तो वहीं अनिल मिश्रा ब्राह्मण थे, लेकिन दोनो की जाति कभी उनके सफलता के आड़े नहीं आई। 19 मई 1995 को मिलिंद ने सीमा से शादी की, मिलिंद तब तक एक बड़े व्यापारी बन गए थे। मिलिंद ने कभी भी भ्रष्टाचार, नाइंसाफी, अत्याचार या गलत लोगो के सामने सिर नहीं झुकाया।
दलित इंडियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्री
साल 2005 में मिलिंद ने तय किया कि वो दलित वर्ग को भी व्यापार में बढ़ावा देंगे और इसके लिए उन्होंने दलित विचारक चन्द्रभान के साथ मिलकर दलित इंडियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्री की स्थापना की। जिससे डिक्की भी कहा जाता है। उनका मकसद है कि वो दलितों को मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है। इसके लिए वो दलित कारोबारियों को एकजुट कर रहे है। आज यूके, यूएई, जापान, जर्मनी, नीदरलैंड जैसे देशोंमें भी ‘डिक्की’ की शाखाएं खुल चुकी हैं।
आज डिक्की दलित उधमियों की मदद के ले कई योजनाये चलाती है। स्टैंड अप इंडिया, मुद्रा योजना, वेंचर कैपिटल फंड या क्रेडिट इनहांसमेंट स्कीम जैसी योजनाओं के तहत दलित उद्यमियों को 50 हजार से लेकर 15 करोड़ तक का कर्ज लेने की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। मिलिंद कहते है कि देश में बिजनस लीडर तो बहुत है लेकिन दलित लीडर नहीं औऱ डिक्की के ज़रिये देश में दलित बिज़नेस लीडर बनाने की पहल शुरु हुई। वो चाहते है कि दलित इतने मजबूत हो कि वो देश के आर्थिक विकास में बड़ा योगदान दें। किसी भी काम में सफल होने के लिए आपका उस काम के प्रति समर्पण और उस काम से प्यार होने जरूरी है। तभी आप दिल लगा कर काम कर सकेंगे, और फिर आपको सफल होने से कोई रोक नहीं सकता है।



