Piprahwa-Buddha: क्या है पवित्र पिपरहवा अवशेषों की कहानी, जिसे 127 सालों बाद लाया गया भारत, क्यों है हर एक बौद्ध के लिए खास

Buddha Emperor, Piprahwa Relics
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Piprahwa Buddha: 3 जनवरी 2026 की तारीख भारत के इतिहास के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया भर में रह रहे हर एक बौद्ध के लिए किसी ऐतिहासिक दिन से कम नहीं मानी जा सकती है। दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था. जिसकी जानकरी खुद देश के पीएम नरेंद्र मोदी ने दी थी..अब सवाल ये कि इस प्रदर्शनी में ऐसा क्या खास था..

जिसके बारे में खुद पीएम ने जानकारी दी, तो आपको बता दें कि ये प्रदर्शनी थी बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के जीवंत अवशेषों की कहानी कहती पिपरहवा के पवित्र बौद्ध अवशेष की। इस प्रदर्शनी को Lotus Light: Relics of the Awakened One’ नाम से आयोजित किया गया था। पिपरहवा अवशेषों का छठा हिस्सा जिसे 127 सालों के बाद वापिस भारत की धरती पर वापिस लाया गया। क्यों है ये अवशेष इतने खास, और अगर ये छठा हिस्सा है तको इसके बाकी के हिस्से कहां है, और कैसे से हिस्सा हांगकांग में निलामी के लिए पहुंच गया..सबकुछ जानेंगे विस्तार से…

पहले जानते है कि पिपरहवा से बुद्ध का क्या रिश्ता है

बुद्ध के जीवन से जुड़े 8 प्रमुख स्थानों में से एक पिपरहवा असल में वो स्थान है जहां बुद्ध ने अपने जीवन के करीब 29 साल बिताये थे। उत्तर प्रदेश में एक जिला है सिद्धार्थनगर, जहां पर मौजूद एक गांव, जहां सुगंधित चावल उगाये जाते है, इस गांव का नाम है पिपरहवा। बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी से मात्र 9 मील दूर स्थित है, इसे जन्म स्थली लुंबिनी के केंद्र के रूप में देखा जाता है। आपको इस बात से भी कंफ्यूज नहीं होना चाहिए कि कपिलवस्तु और लुंबिनी एक स्थान हो सकते है। दरअसल आज के समय में कपिलवस्तु नेपाल बॉर्डर पर है और लुंबिनी से करीब 16 मील की दूर है। हालांकि ऐतिहासिक रूप से बौदध काल में दोनो की दूरी 10 से 25 किलोमीटर रही होगी।

कपिलवस्तु तौलीहावा मे है, और लुंबिनी जहां बुद्ध की जन्म स्थली है तो वहीं कपिलवस्तु शाक्य वंश की राजधानी थी, जिस वंश के गौतम बुदध राजकुमार सिद्धार्थ थे। पिपरहवा वो स्थान है जिसके आसपास गौतम बुद्ध ने अपने राजकुमार रहते हुए 29 साल बिताये थे औऱ वो कपिलवस्तु राजधानी का ही हिस्सा था।

पिपरहवा स्तूप और अवशेषों की कहानी

दरअसल पिपरहवा स्तूप की कहानी पहली बार प्रचलित हुई ब्रिटिश काल में 1898 में..जब पहली बार रेल लाईन और सड़क मार्ग बिछाने की खुदाई के दौरान ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे को पिपरहवा स्तूप के पास से कुछ अवशेष मिले थे, जबकि पेप्पे ने ये खुदाई केवल 22 फीट तक ही कराई थी। इस अवशेष में क्रिस्टल के ताबूत, सोने के आभूषण, रत्न और बलुआ पत्थर के संदूक के साथ साथ एक पेटी पर ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेख मिले थे, जो कि शाक्य वंश के समय के थे। पिपरहवा स्तूप को बुद्ध के शारीरिक अवशेषों के लिए जाना जाता है।

क्यों आया पेप्पे का जिक्र – Why was Peppe mentioned?

अब सवाल से है कि पेप्पे का जिक्र पिपरहवा स्तूप में मिले अवशेषों को लेकर क्यों आया- दरअसल बीते साल जुलाई 2025 में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इन अवशेषों को निसामी के लिए हांगकांग के Sotheby’s नीलामी में सामने आए थे। जब भारत की संस्कृति विभाग को इसकी जानकारी लगी तो उन्होंने तुरंत हस्तक्षेप किया। भारतीय कानून के अनुसार ‘AA’ श्रेणी की प्राचीन धरोहर को बेचना या भारत से बाहर ले जाना भी गैरकानूनी है, और ये अवशेष जिन्हें निलाम किया जा रहा था, वो उस अवशेष का छठा हिस्सा था।

जिसे पेप्पे अपने साथ ईनाम के तौर पर अपने साथ ईंग्लैंड ले गए थे, और ये निलामी के लिए देने वाले भी कोई और नहीं बल्कि पेप्पे के पोते क्रिस्टोफर पेप्पे ने ही थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने उससे पहले भी इन अवशेषों को लौटाने का प्रयास किया था लेकिन ये सबकुछ इतना पेचिदा था कि उन्होंने यहीं तरीका बेहतर समझा। भारत सरकार के हस्तक्षेप के बाद हांगकांग ने इन अवशेषों को भारत को लौटा दिया और 30 जुलाई 2025 को ये अवशेष भारत लौट आये। इन अवशेषों में कुछ अस्थियां भी है, जिससे ये अनुमान लगाया जा रहा है कि ये बुद्ध की अस्थियां हो सकती है।

बुद्ध की अस्थियों से जुड़ी कहानी

480 ईसा पूर्व जब बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था, तब यूपी के ही कुशीनारा में उन्होंने अपनी अंतिम श्वास ली थी। उस वक्त वहां पर मल्ल शासको लोगो का शासन था, बुद्ध के प्रति श्रद्धा के कारण उन लोगो ने बुद्ध के अंतिम संस्कार करने और उनकी अस्थियों को अपने पास रखने का फैसला किया, लेकिन वहीं कपिलवस्तु के लोगो ने इस पर विरोध जताया कि बुद्ध उनके भी है इसलिए बुद्ध का अंतिम संस्कार कपिलवस्तु में होना चाहिए.. जिससे विवाद बढ़ गया.. जिसके बाद दोना ब्राह्मण ने इस मुद्दे मे हस्तक्षेप किया और बुद्ध के बताये मार्ग के बारे में बात करते हुए कहा कि बुद्द हिंसा, रक्तपात और युद्ध के सख्त खिलाफ थे।

इसलिए उनके जुड़े 8 महत्वपूर्ण स्थानों पर बुद्ध के अवशेषों को रखा जाना चाहिए। ये 8 स्थान थे- कपिलवस्तु, वैशाली, कुशीनारा, राजगृह, अल्लकप्पा, रामग्राम, बेथदीप,पावा। जिसके बाद बुद्ध के देह का अंतिम संस्कार पिपरहवा में ही किया गया, और वहां उनके कुछ अस्थि अवशेषों को रखा गया, जिसके साथ क्रिस्टल की पेटियां, सोने के आभूषण,रत्न और बलुआ पत्थर का एक खूबसूरत बॉक्स भी रखा गया था। यहां बने स्तूप बुद्ध के अस्थियों के ऊपर बने थे, इसलिए शारीरिक स्तूप कहे जाते है।

1898 में पहली बार बुद्ध से जुड़े अवशेष मिले

1898 में जब पेप्पे ने सूखा की समस्या से निकलने के लिए यहां नहर की खुदाई का काम शुरु कराया था तब उन्हें ही पहली बार बुद्ध से जुड़े अवशेष मिले थे और उन्होंने बिना देरी के लंदन की रॉयल एशियाटिक सोसाईटिक को रिपोर्ट भेज कर इसकी जानकारी दी। इस खुदाई में जो संदूक मिला था उसमें 5 बर्तनों के साथ साथ करीब 1800 रत्न थे, और कुछ हड्डियां और राख भी मिली। बुद्ध के वो अवशेषों जो करीब 2000 सालों तक विलुप्त हो चुके थे, उनके बारे में जानकारी मिलना बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

इनमें से छठा हिस्सा पेप्पे को इंग्लैड ले जाने की अनुमति मिल गई, वहीं थाईलैंड के राजकुमार के साथ हुई संधि के बाद अस्थि अवशेष का एक हिस्सा थाईलैंड भेज दिया गया तो वहीं बाकि का अधिकांश अवशेष सोने-आभूषण और कलश कोलकाता के भारतीय संग्रहालय (Indian Museum, Kolkata) में रखे गए थे। हालांकि बीते साल भारत सरकार ने पिपरहवा स्तूप से जुड़े ज्यादातर अवशेषों को एकत्रित करके राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली और पिपरहवा के संग्रहालय में रखा है जिसे आमजन को देखने के लिए रखा गया है।

सम्राट अशोक ने 84000 स्तूपों के निर्माण किया

पिपरहवा स्तूप असल में बुद्ध के जीवन से जुड़े उस पल की कहानी कहते है जब बुद्ध महापरिनिर्वाण कर चुके थे, और उनके अवशेषों को ऊपर स्तूप बनवाये गए थे। इस स्तूप को तीन अलग अलग हिस्सों में बनाया गया, पहले पिपरहवा के शाक्य वंश लोगो ने बनाया था, जिसे मिट्टी से करीब 2 फीट की गोलाकार संरचना में बनाया गया था, लेकिन उसके बाद तीसरी शताब्दी में मौर्य काल में सम्राट अशोक ने 84000 स्तूपों के निर्माण के लिए इस स्तूप को खोला था और उनके कुछ अवशेषों को निकाल कर स्तूप के ऊपर मिट्टी और धान की भूसी से मजबूत गोलाकार दीवारे बनवाई थी।

तिसरी बार कुषाण काल में, जब कुषाण शासकों ने इसका विस्तार करते हुए ऊंचा किया और चौकोर दीवार बनवाई और इसके आसपास बड़े बड़े मठो का निर्माण कराया। पिपरहवा स्तूप बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए बेहद अहम मानी जाती है। ये धरोहर है भारत की जो भारत के उस इतिहास की कहानी बताती है जब बौद्ध धर्म भारत में एक मजबूत स्थित में था, जब भारत शांति औऱ अहिंसा को ही परमो धर्म मानता था।

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