UP Crime: अभी मेरठ के कपसाढ़ में दलित समाज के साथ जो हुआ उसकी आग शांत भी भी हुई थी कि इसी मेरठ में एक घर के चिराग को बड़ी निर्माता से जिंदा जला कर बुझा दिया गया। कश्यप समाज से आने वाले रोहित उर्फ रोनू उर्फ सोनू कश्यप, जो अपनी मां के बुढ़ापे का इकलौता सहारा था, अपनी बहन की राखी का इकलौता रखवाला था, उसे कुछ लालची लोगों के लालच के भेंट चढ़ा दिया गया, और प्रशासन ने जो लापरवाही की है.. उसने पीड़ित परिवार के जख्मों पर मरहम नहीं बल्कि नमक रगड़ने का काम किया है।
इसी कड़ी में दलितों के नेता चंद्र शेखर आजाद जब इस पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे तो पुलिस ने उन्हें पीड़ित परिवार तक से मिलने नहीं दिया, जिससे नाराज होकर इस मुद्दे पर हो रही सियासत को लेकर आजाद ने सरकार को बुरी तरह से घेरा है। आइए जानते है कि क्या है रोनू कश्यप की कहानी, जो कुछ लोगों के लालच के भेंट चढ़ गया और अब कुछ लोगों की राजनीति का मुद्दा बन गया।
सरधना में अधजली लाश मिली
दरअसल 6 जनवरी को मेरठ के सरधना में एक अधजली लाश मिली थी, पुलिस ने तुरंत लाश की जांच की तो पाया कि पहले उसे ईंट से मारा गया और फिर पहचान मिटाने के लिए उसके शरीर पर मोबिल डाल कर उसे जलाया गया। रोनू यूपी के मुजफ्फरनगर का रहने वाला है और मेरठ की तहसील सरधना क्षेत्र के ज्वालागढ़ में काम के सिलसिले में आया हुआ था। पुलिस ने जांच शुरू की तो इस मामले में ठाकुर समाज से आने वाले एक नाबालिग आरोपी जो कि ऑटो रिक्शा चलाता था, उसे गिरफ्तार किया और न्याय बोर्ड के समक्ष पेश कर बाल सुधार गृह भेज दिया, और अभी भूमिका से पल्ला झाड़ लिया।
80 हजार के लिए छीन ली जान
लेकिन…जब पीड़ित परिवार की कहानी सुनेंगे तो पाएंगे कि पुलिस की भूमिका ही इसमें संदिग्ध है। दरअसल 5 जनवरी की रात को रोनू के पास 80 हजार रूपये थे, उस दौरान रोनू को ठाकुर समाज के कुछ लोगों ने मिलकर पहले शराब पिलाई, फिर उसके साथ लूटपाट की और फिर उसे जिंदा जला कर मार दिया। इस मामले में केवल एक आरोपी नहीं है बल्कि और भी है लेकिन पुलिस ने एक नाबालिग को पकड़ कर अपना पल्ला झाड़ लिया है। वहीं इस मामले में अब जमकर राजनीति शुरू हो गई है।
चंद्रशेखर आजाद का आरोप पुलिस प्रशासन की लापरवाही
एक तरफ सपा प्रमुख ने रोनू कश्यप के लिए न्याय की आवाज बुलंद की है तो वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि ऐसे असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए, अपराधियों को कानून का डर भी नहीं है। वहीं अब इस मामले में भीम आर्मी चीफ और नगीना से सांसद चंद्र शेखर आजाद ने पुलिस प्रशासन की लापरवाही और रोनू के परिवार से न मिलने देने को लेकर तीखा प्रहार किया है। आजाद खुद रोनू के परिवार से मिलने के लिए ज्वालगढ़ हुए थे लेकिन पुलिस का रवैया बेहद ही बुरा था। पुलिस किसी भी हाल में रोनू के परिवार से किसी को भी मिलने नहीं दे रही है।
पुलिस चंद्रशेखर को पीड़ित परिवार से मिलने क्यों नहीं दे रही है?
आजाद ने मीडिया के सामने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें लग रहा है कि अब तो वो उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी अछूत हो गए है। जब भी किसी दलित, पिछड़े और मुसलमानों के साथ कोई अन्याय होता है, अगर आजाद उनकी मदद के लिए आगे जाते है तो उन्हें मिलने तक नहीं दिया जाता है। वहीं बीजेपी के नेताओं के लिए कोई माहौल खराब नहीं होता है, वो सिक्योरिटी के साथ पीड़ितों से मिलने पहुंच जाते है। लेकिन आजाद के जाने से वहां का माहौल बिगड़ जाता है। अजीब थ्योरी है पुलिस वालों की। उन्होंने आगे ये भी दोहराया कि रोनू के मामले में तो पुलिस ने आरोपी को भी गिरफ्तार कर लिया है फिर उन्हें क्यों पीड़ित परिवार से मिलने नहीं दिया जा रहा है।
रोनू कश्यप को पहले शराब पिलाई
आखिर पुलिस दुनिया से छिपाना क्या चाहती है, किसे बचाने की कोशिश कर रही है पुलिस, जो उनके जाने से सच सामने आ जाएगा। उन्होंने पुलिस के साथ साथ सरकार के रवैये पर भी तीखा प्रहार करते हुए कहा कि उनके साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है जैस वो उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि पाकिस्तान में घूम रहे है। उन्हें हर जगह जाने से रोक जा रहा है, जबकि वो खुद एक प्रतिष्ठित पद पर है। बताते चले कि आजाद ने रोनू को हत्या को लेकर पहले ही एक्स पर एक पोस्ट करके इस मुद्दे पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था कि रोनू कश्यप को पहले शराब पिलाई गई, फिर उसके पास से 80 हजार रूपये लूटे और फिर उसे जिंदा जला कर मार दिया गया।
मामले की सीबीआई जांच
उन्होंने ये भी कहा कि वो सरकार से मांग करते है कि इस मामले की सीबीआई जांच हो और सभी आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए, साथ ही पीड़ित परिवार को 50 लाख रुपए का मुआवजा मिलना चाहिए और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिलें। आजाद ने ये ऐलान कर दिया है कि पीड़ित परिवार के लिए न्याय की इस लड़ाई में वो उनके साथ खड़े है। हालांकि चंद्र शेखर आजाद के साथ होने वाले इस व्यवहार से प्रशासन की भूमिका पर भी सवालियां निशान खड़े हो गए है। क्या सच में प्रशासन कोई गहरा सच छिपाने की कोशिश कर रही है।



