India Japan history: भारत से जापान तक संस्कृत का सफर, बौद्ध धर्म ने कैसे जोड़ा दो संस्कृतियों को?

Buddhism in Japan
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India Japan history: 593 ईसवी की बात है, भारत के महान सम्राट अशोक ने तीसरी सदी में बौद्ध धर्म अपनाया और उन्होंने अपने बच्चों के साथ बौद्ध धर्म का विस्तार किया। करीब 84000 बौद्ध स्तूप भी बनावायें, यानि की ये कहा जा सकता है कि भारत के बाहर बौद्ध धर्म को प्रभावित करने में सम्राट अशोक का बड़ा योगदान है.. अब आते है 593 ईसवी में… भारत से करीब 5959 किलोमीटर दूर समुद्र के बीच एक छोटा सा देश है जापान.. 593 ईसवी में जापान का राज्यभार राजकुमार शोतोकू ताइशी ने संभाला है, उस वक्त जापान में शितो धर्म का बोलबाला था, जिसके अनुसार ये माना जाता था कि हर व्यक्ति के अंदर पवित्र आत्मा विराजमान है। सबके अंदर अच्छाई है।

वहीं उस वक्त पहली बार जापान में चीन के प्रभाव के कारण बोद्ध धर्म को लेकर सुगबुगाहट शुरु हो गई थी। चीनी जापान की यात्रा करते और धीरे धीरे जापान में बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे है, लेकिन जापान में बौद्ध धर्म  का प्रभाव होना शुरु हो गया था इसके प्रमाण मिलने है कि जब राजकुमार शोतोकू ताइशी ने भगवान बुद्ध के विचारों बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय विचारधारा से प्रभावित होकर छठी इसवी में 17 अनुच्छेदों में जापान का संविधान तैयार किया जिसमें त्रिरत्न, बुद्ध, धम्म और संघ एक मूलभूत कारक था, ये आपको आज भी जापान के होर्यूजी मंदिर के संग्रहालय में देखने को मिल जायेगा, लेकिन ये पांडुलिपी असल में संस्कृत भाषा से प्रभावित थी.. अब सोचने वाली बात है कि बौध्द धर्म का प्रभाव तो दिख रहा था, लेकिन बौद्ध धर्म को मानने वाले कम थे.. और करीब 200 सालो तक ये गति काफी धीमी रही, जापान में मौजूद शिंतो पंथ दुनिया के सबसे प्रचीन पंथ में से एक है जिसमें कई देवी देवताओं को शामिल किया जाता है और उन्हें कामी कहा जाता है।

राजनीति में बौद्ध भिक्षुओं का प्रभाव

इन्हें शिंतो अथवा शिंतो पंथ भी कहा जाता है। आठवी सदी आते आते जापान के राजनीति में बौद्ध भिक्षुओं का प्रभाव नजर आने लगा.. और तब वहां के सम्राट सोमू भी बौद्ध धर्म के प्रति आस्था रखते थे, जिसके कारण उनके दरबार में बौद्ध लोगो का प्रभाव भी काफी थी, हालांकि तब भी जापान की जनता शिंतो पंथ पर ज्यादा विश्वास करती थी। वहीं भारत में उस वक्त मदुरै में पांड्य वंश का राज था, चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी किताब में लिखा है कि आठवी सदी के आसपास उन्होंने कांचीपूरम के पास स्थित एक क्षेत्र मलकूट के बारे में बात की है, जिसे मदुरै के रूप में पहचान मिली थी, आठवी सदी में मदुरै में वैसे तो बौद्ध धर्म का प्रभाव था लेकिन शैव परंपरा ने फिर से पांव पसारने शुरु कर दिये थे। इस वक्त पांड्य राजवंश में खूब संपदा धन धान्य था, लेकिन 22 साल के राजकुमार बोधिसी का मन राजकाज में नहीं लगता था। नतीजा उन्होंने मन की शांति के लिए शाक्य मुनि गौतम बुद्ध की शरण में जाने का मन बना लिया।

बोधीसेन ने एक लंबी समुद्री यात्रा

इस दौरान महायान परंपरा में सर्वोच्च बुद्धिमत्ता के प्रतीक मंजूश्री पांड्य राजकुमार के सपने में आये और उन्होंने राजकुमार से कहा कि बुटाई की पहाड़ी तक यात्रा करों वहां मेरी तुमसे मुलाकात होगी। राजकुमार के विचलित मन को शांति मिली और वो चल पड़े अपनी बुटाई की यात्रा पर। बुटाई पहाड़ी असल में चीन में थी, इसलिए बोधीसेन ने एक लंबी समुद्री यात्रा की जिसमें वो पहले मलेशिया, फिर फिलीपींस, और फिर चीन पहुचें। बोधिसेन महीनों की लंबी यात्रा करके बुटाई की पहाड़ियों पर पहुंचे, जहां उन्हें मंजूश्री के सपने में आने का मतलब समझ आया, यहां आकर उन्हें समझ आया कि मंजूश्री ने फिर से पुनर्जन्म लिया है, अब सवाल ये था कि वो मंजूश्री को कहां और कैसे खोजे, लेकिन फिर भी उन्होंने चीन में अपनी यात्रा जारी रखी, वो बौद्ध धर्म का प्रचार करते और लोगो को उपदेश देते थे, और कई सालो की यात्रा के बाद 730 ईसवी में टैंक सम्राज्य की राजधानी चांदनान पहुंचे जहां वो एक जापानी राजदूत से मिले, जिसके साथ वो समुद्र के रास्ते जापान के ओसाका पहुंचे थे। वहां बोधीसेन की मुलाकात एक और बौद्ध भिक्षु गियो की से हुई थी।

इस मुलाकात को लेकर कहा जाता है कि जैसे ही बोधी सेना ने गियो की देखा वो भावविभोर हो उठे, उनकी सालो की तलाश पूरी हो चुकी थी, क्योंकि बोधीसेन को उनके मंजूश्री मिल गए थे। गियोकी ही मंजूश्री के पुनर्जन्म थे, और दोनो ने एकदूसरे को देखते ही पहचान लिया था कि दोनो पिछले जन्म में भगवान बुद्ध के प्रथम अनुयायि में से थे। बोधिसेना गियोकी के साथ सम्राट सोमू के दरबार पहुंचे, सम्रांट सोमू बौद्ध धर्म में विश्वास रखते थे, इसलिए बोधिसेन को बड़ा पद मिला, सम्मान मिला। लेकिन शितो परंपरा को मानने वालो अनुयायियों को ये नागावार गुजरा कि राजा किसी और धर्म को सम्मान दे और उसे ज्यादा तवज्जो दें, रही सही कसर तब पूरी हो गई जब 735 के आसपास जापान को चेचक बीमारी ने घेर लिया और एक तिहाई जनता काल के गाल में समा गई। शितो धर्म को मानने वालों ने ये अफवाह फैला दी शितो परंपरा को छोड़ने के कारण ये महामारी फैली है।

खासकर फूजिवारा राजवंश के लोग जो राजदरबार में गहरा प्रभाव रखते थे, वो किसी हाल में नहीं चाहते थे कि बौद्ध धर्म का प्रभाव जापान में बढ़े, इस बीच सम्राट के राजदरबार में मौजूद 4 फूजीवारा वंश के दरबारी की मृत्यु हो गई, जिससे राजा ने फिर से इस वंश के लोगो को सम्मिलित करने के बजाय किसी और को शामिल कर लिया, जबकि निमय के अनुसार फूजीवारा वंश के ही अनुयायी इन पदों पर बैठने चाहिए थे, खासकर जब एक बौद्ध भिक्षु ने सम्राट की मां की जान तंत्र मंत्र से बचाई तब तो उसका विश्वास बौद्ध धर्म में और मजबूत हो गया। लेकिन अब फूजीवारा समुदाय ने बगावत कर दी, जिससे सम्राट ने तय किया कि वो बौद्ध धर्म को मजबूत करने के लिए कोई तीसरा रास्ता निकालेंगे। सम्राट ने बौद्ध धर्म और शिंतो धर्म के बीच सामांजस्य बिठाने के लिए बोधिसेन और गियोकी का सहारा लिया। गियोकी शितों की जनता में काफी प्रचलित थे, उनका धर्मात्मा वाला स्वाभाव, परोपकारी आचरण शिंतो को मानने वालों के बीच भी काफी सम्मानीय था।

जनता उनकी सुनती थी, जो शिंतो जनता को उन्हें समझाना आसान था, लेकिन बौद्ध लोगो का विश्वास कैसे बनता तो उसके लिए बौद्ध की धरती से आये बोधिसेन का कहारा लिया गया, उन्होंने विश्वास दिलाया कि गियोकि मंजूश्री के ही पुर्नजन्म है। गियोकी ने शिंतो पंथ और बौद्ध धर्म को एक साथ जोड़ कर अवधारना पेश की जिसमें उन्होंने ये बताया कि बौद्ध धर्म के वेरोचन बुद्ध और शितों धर्म की अमातेरासू देवी की पूजा एक साथ की जानी चाहिए, लोगो को ये अवधारना पसंद आने लगी और वो बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित होने लगे। वेरोचन बुद्ध को मान्यता मिली और उनकी पूजा होने लगी। उनका विशाल मंदिर बना, वेरोचन बुद्ध को वहां प्रसिद्धी मिली। टोडासेना बुद्ध मंदिर का उद्घाटन बोधिसेना ने किया था, इस मंदिर के निर्मान के साथ राजा ने ये दर्शाया कि बौद्ध धर्म के जापान आने से जापान का भला हुआ है। ये आज भी नारा में मौजूद है। करीब 25 सालों तक वो जापान में रहे थे, जिसके बाद उनका पुनर्निमाण हो गया।

बोधीसेन ने वहां बौद्ध स्कूल की स्तापना की थी और वो संस्कृत में अपनी पांडुलिपी तैयार करते थे, जिसे बाद में जापानी भाषा में ट्रांसलेट किया गया। लेकिन संस्कृत भाषा के प्रभाव के कारण जापानी भाशा की लिपि में 47 अक्षरो को संस्कृत भाषा के आधार पर लिये गए थे।आज भी जापान में शितो धर्म और बौदध धर्म का प्रभाव है, लोग दोनो धर्मों को मानते है, मान्यताओं के अनुसार जन्म या शादी के वक्त शितो मंदिरो में अराधना होती है तो वहीं मृत्तुयु के वक्त बौद्ध परंपरा को फॉलो किया जाता है। यानि की कुलमिलाकर हम ये कह सकते है कि बोधीसेना ने न केवल जापान में बौद्ध धर्म को मजबूत किया था बल्कि संस्कृत भाषा से भी जापान को अवगत कराया था।

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