Mandal commission report: पिछले कुछ समय से एससी एसटी वर्ग के लोगों के लिए क्रिमी लेयर का अवधारणा को लाने की वकालत लगातार जारी है। क्रिमी लेयर को इससे पहले ओबीसी कैटेगरी में लागू किया था, लेकिन एससी एसटी वर्ग के लिए क्रिमी लेयर क्यों लागू नहीं किया जा सकता है, और ओबीसी वर्ग को कैसे बांट दिया गया। जिसे बांटने में मंडल कमीशन की रिपोर्ट ने सबसे अहम भूमिका निभाई थी।
ये मंडल कमीशन की ही रिपोर्ट की देन थी कि भले ही 10 सालो से ज्यादा का इंतजार करना पड़ा, लेकिन ओबीसी वर्ग को न केवल 27 प्रतिशत का आरक्षण मिला बल्कि उन्हें वो अधिकार भी मिले… जिसे केवल एसीसी एसटी वर्ग तक ही सिमित किया गया था। अपने इस वीडियो में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षक की ताकत देने वाले मंडल कमीशन के बारे में बतायेंगे, साथ कैसे ये ओबीसी के लिए वरदान साबित हुआ.. और कैसे हुई इसकी शुरुआत।
SC/ST की तरह ही ओबीसी वर्ग की भी पहचान
1 जनवरी साल 1979 का समय था, केंद्र में मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री के पद पर आसीत थे, मोरारजी देसाई ओबीसी वर्ग को लेकर थोड़े नर्म रहे थे.. उन्हें ऐसा लगता था कि एससी एसटी की तरह ही ओबीसी वर्ग की भी पहचान की जानी चाहिए.. क्योंकि ऐसे बहुत से वर्ग थे जो आरक्षण जैसी छूट से वंचित रह गए थे.. बस फिर क्या था मोरारजी देसाई ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (BP Mandal) को इसकी जिम्मेदारी दे दी और उन्हें दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग का प्रमुख चुन कर रिपोर्ट तैयार करने का काम दिया गया।
बीपी मंडल ने पूरे दो सालों का समय लिया ओबीसी वर्ग की रिपोर्ट तैयार करने में.. और 31 दिसंबर 1980 को रिपोर्ट तैयार हुई..लेकिन इससे पहले की इस रिपोर्ट को लेकर कोई फैसला होता, केंद्र की सरकार बदल गई और इंदिरा गांधी देश की पीएम बन चुकी थी, जिनकी मौत के बाद राजीव गांधी पीएम बने और मंडल की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई.. वो भी करीब एक दशक के लिए.. सवाल ये है कि इंदिरा गाँधी ने इन रिपोर्ट को लेकर चर्चा क्यों नहीं की.. ऐसा क्या था इस रिपोर्ट में तो चलिये आपको बताते है।
3743 जातियों और समुदायों को रेखांकित
दरअसल जब रिपोर्ट सामने आई तो इसमें देश भर की करीब 3743 जातियों और समुदायों को रेखांकित किया गया ओबीसी यानि की अति पिछड़े वर्ग में.. जो कि इस वक्त देश की जनसख्या का करीब 52 प्रतिशत था। जिसमें एससी एसटी वर्ग शामिल नहीं थे। ये गणना 1931 की जनगणना के आधार पर तय की गई थी। लेकिन विडंबना ये थी कि 52 प्रतिशत संख्या होने के बाद भी उन्हें आरक्षण केवल 27 प्रतिशत की दिया जा सकता था, इससे ज्यादा आरक्षण देना सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ होता जब 1963 के एमआर बालाजी बनाम मैसूर राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए 50 फीसदी की सीमा तय कर दी थी।
जिसमें से एससी और एसटी के लिए पहले से 22.5 प्रतिशत तय किया गया थी, ऐसे में केवल 27 प्रतिशत ही आरक्षण बचता है.. इसलिए मंडल कमीशन में 52 प्रतिशत जनता के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की ही मांग की गई थी। साथ ही रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि ओबीसी वर्ग को ओबीसी वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण के साथ साथ प्रमोशन में भी लागू किया जाये, एससी-एसटी की तरह ओबीसी को भी उम्र में छूट दी जाये। मंडल कमीशन में सरकार से ओबीसी वर्ग के लिए नए प्रावधान लाने का जिक्र भी किया था।
क्यों इंदिरा गाँधी और राजीव गांधी ने की अनदेखी
अब सवाल ये है कि जिस मंडल कमीशन को मोरारजी देसाई ने खुद आगे बढ़ाने की पेशकश रखी थी, उस मंडल कमीशन को इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने लागू करने की पहल क्यों नहीं की,… तो इसके पीछे कई कारण थे.. पहला कांग्रेस का निचली और पिछड़ी जातियों को लेकर रवैया कैसा रहा है, वो तो आप बाबा साहब अंबेडकर के साथ हुए रवैये से अंदाजा लगा ही सकते है।
मंडल कमीशन की रिपोर्ट
दूसरा इंदिरा गांधी को डर था कि ओबीसी वर्ग को अगर 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया तो सवर्ण वोट बैंक पूरी तरह से नाराज हो जायेगा और कांग्रेस से बंट जायेगा..कांग्रेस का मानना था कि ये रिपोर्ट जाति आधारिक विभाजन पर बेस्ड है, जो सरकारी नौकरियों में योग्यता के लिए खतरा बनेगी। वहीं राजीव गांधी ने तो मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूरी तरह से दोषपूर्ण करार देते हुए ओबीसी को आरक्षण देने का ही विरोध किया था। वहीं उन्हें ये भी डर था कि कहीं इससे जातिगत भेदभाव और सौहार्द न खराब हो जाये, जो बड़े तनाव का कारण बन सकता है..और कांग्रेस को वोट बैंक दूसरी पार्टियों की तरफ जा सकता है।
जब वीपी सिंह सरकार ने लागू किया
साल 1989 में पहली बार देश की राजनीति में एक और पार्टी उभरी.. जनता दल… इसके मुखिया वीपी सिंह ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में सरकार में आने के बाद मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का वादा किया था, जिससे वो ओबीसी वर्ग को साध सकें, उन्हें थोड़ा फायदा भी हुआ, 143 सीटें जीतें तो सही लेकिन कांग्रेस ने 197 सीट लाकर जनता दल का समीकरण बिगाड़ दिया..मगर राजीव गाँधी ने सरकार बनाने से इंकार कर दिया और फाइनली वीपी सिंह की सरकार सत्ता में आई और अपने वादे के मुताबिक 7 अगस्त 1990 के दिन मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान कर दिया गया।
बीजेपी ने समर्थन वापिस ले लिया
लेकिन जैसा कि राजीव गाँधी को उम्मीद थी, मंडल कमीशन को लेकर दक्षिण को छोड़कर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए, कई सवर्ण छात्रों ने आत्मदाह करने की कोशिश की, इस प्रदर्शन की आग को दबाने के लिए उस वक्त जनता दल की समर्थक पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर का मुद्दा उठाया। रथ यात्रायें शुरु की, लेकिन कुछ भी फायदा न होते हुए देख कर बीजेपी ने समर्थन वापिस ले लिया, जिससे वीपी सिंह की सरकार गिर गई..मगर तब तक वो अपना काम कर चुके थे.. मगर मंडल कमीशन की राह अभी कहां आसान होने वाली थी। इंदिरा साहनी ने फिर से इसे चुनौती दी.. और तब पहली बार क्रिमी लेयर सामने आने आया।
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ का मामला बहुत उछला और सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण कानूनी तौर पर वैध है, लेकिन कोर्ट ने इसमें कुछ नियम लागू कर दिये, जिसमें प्रमोशन में लागू करने से रोका गया साथ ही ओबीसी समुदाय के आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को ओबीसी आरक्षण से बाहर रखने के लिए ‘क्रीमी लेयर’ का कॉन्सेप्ट लागू किया गया। मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर ओबीसी वर्ग को भी ताकते दी गई.. उन्हें भी एससी एसटी वर्ग की तरह अलग औऱ विशेष माना गया, जो एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम माना गया।



