Top 5 Dalit news: कहते है कि आज शोसल मीडिया पर ज्यादातर फेक चीजे ही बताई जाती है, लेकिन अगर ये शोसल मीडिया न होता शायद हमें कभी इस बात का पता ही नहीं चलता कि वाकई में सबका साथ सबका विकास की आड़ में दलितो का उत्पीड़न कितना गुणा बढ़ गया है। जातिवादी मानसिकता कितनी ज्यादा हावी हो चुकी है कि दलितो को अपने लिए आवाज उठाने पर अपशिष्ट तक खाना पड़ रहा है। तो चलिए आपको स लेख में पिछले 24 घंटे में दलितो के साथ होने वाली घटनाओ के बारे में बतायेंगे, जो इस वक्त शोसल मीडिया पर काफी सुर्खियों में है।
रुचि तिवारी का एक और वीडियो आया सामने
1, दलितो से जुड़ा पहला मुद्दा दलितो के संघर्षों का, ब्राह्मणवाद के खिलाफ आवाज उठाने वाले बाबा साहब के संघर्षों का मजाक उड़ाने वाली तथाकथित पत्रकार रूचि तिवारी को लेकर है, एक तरफ रूचि तिवारी के चेहरे से जातिवादी आतंकी होने का पर्दाफाश हुआ है, तो वहीं अब उनकी एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें वो रोते रोते खुद को ही पीड़ित बता रही है।
वो कह रही है कि उनकी खबर को तोड़ मरोड़ कर दिखाया गया है, कहीं का वीडियो कहीं और एडिट किया गया है, उन्हें जान से मारने की धमकी दी जा रही है, रेप की धमकी मिल रही है। इतना ही नहीं रूचि ने कहा कि उन्हें घर से निकलने में अब डर लग रहा है। मेरा गला दबाया गया था, मैं खाना तक नहीं खा पा रही हूं, मुझे मॉब लिंचिग करके मारने की कोशिश की गई है, मैने जो भी किया वो अपने डिफेंस में किया है।
लेकिन रूचि तिवारी की जो वीडियो पहले आई है, वो कहीं भी उनके इस दर्दभरे बयान से मैच नहीं होती है। रूचि के वायरल वीडियो आने के बाद बहुजन छात्रों ने भी अपनी ताकत दिखाते हुए न केवल रुचि का विरोध किया था, बल्कि उनके खिलाफ मामला भी दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन वहां भी जातिवादी आतंकियों ने आकर पुलिस के सामने ही बहुजन छात्रों को रेप, और जान से मारने की धमकी दी थी।
ऐसे में आप खुद अंदाजा लगा सकते है कि जो कानून के सामने उनका मजाक उड़ा सकते है। फिर पीठ पीछे दलितो के साथ कैसा व्यावहार करते होंगे। और वाकई में असली पीड़ित कौन होगा। वैसे बता दें कि शायद रूचि तिवारी के आंसुओ को देखकर अब जातिवादी वकील अनिस मिश्रा ने पहले ही 8 मार्च को दिल्ली में आंदोलन करने का ऐलान कर दिया है। वैसे रूचि तिवाकी के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए आप भी बता ही सकते है कि असली विक्टिम कार्ड कौन खेल रहा है।
यूजीसी के नियमों के लिए आवाज उठाना दलित को पड़ा भारी
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला उड़ीसा से है, जहां यूजीसी के नए नियमो को लागू करने के लिए लड़ाई लड़ रहे है एक दलित युवक को न केवलल जबरन गोबर खाने के लिए मजबूर किया गया बल्कि उससे जबरन बजरंग दल उसका बाप है और गाय उसकी मां है, कहलवाया गया है। सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो काफी वायरल हो रहा है, जिसमें साफ देखा जा सकता है कि कैसे जमीन पर बैठे व्यक्ति को जबरन गोबर खाने पर मजबूर किया जा रहा है।
उड़ीसा में जातिवादी भेदभाव के लगातार कई संगीन मामले सामने आ चुके है। जो बताते है कि दलितो को अपनी आवाज उठाने से पहले भी ये सोच लेना चाहिए कि कहीं अपने हक की आवाज उन पर ही तो भारी नहीं पड़ने वाली है। क्योंकि प्रशासन हो या शासन, दोनो ही मनुवादियों की हाथों की कठपुतली बन चुकी है। न तो वो उनके खिलाफ कोई कदम उठाने वाली है, और न ही उन्हें इतनी आसानी से सजा मिलने वाली है।
जिसका सीधा उदाहरण आप यूजीसी के नए नियमो को फिर से लागू करने के लिए लड़ने वाले बहुजन छात्रो के साथ हुई बर्बरता को देख सकते है। जब सवर्णों ने हंगामा किया तो कोई कार्य़वाई नहीं हुआ लेकिन दलितों के साथ न केवल मारपीट हुई बल्कि उन्हें जेल में भी भरा गया… तो दलित अब आवाज भी उठाने से पहले 100 बार सोचें.. क्योंकि न्याय अब उनसे दूर है, आपको क्या लगता है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।
कोच्चि में दलित पुजारी ने दिया पद से इस्तीफा
3, दलितो से जुड़ा अगला मामला केरल के कोच्चि से है, जहां एक जातिगत भेदभाव और लगातार जान से मारने की धमकी मिलने के बाद मजबूरन मात्र नियुक्ति के 4 महीने बाद ही दलित पुजारी को पद से इस्तीफा देना पड़ा। ये घटना त्रावणकोर के आलंगड़ कोडुवझंगा पल्लथुपरम्बिल की है, जहां पिछले 2 साल से एक दलित पुजारी को पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाने पड़ रहे है ताकि उसके साथ जो अन्याय हुआ उसके खिलाफ कार्यवाई हो सकें।
दलित पुजारी पी.आर. विष्णु जो कि त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड में काम करता था। उसने अपनी आपबीति सुनाते हुए कहा कि बड़ी मुश्किलों और लंबी लड़ाई के बाद उसे विष्णु परवूर ग्रुप के तिरुवल्लूर सब-ग्रुप के तहत आने वाले वातुरक्कावु देवी मंदिर में पुजारी के तौर पर काम मिला था, लेकिन उन्हें लगातार जातिगत भेदभाव और धमकियां मिल रही है। जिससे वो नौकरी छोड़ रहे है, पुजारी ने खुलासा किया कि वो दो साल पहले थथप्पिल्ली भगवती मंदिर में भी विकल्प के रूप में पुजारी था।
लेकिन वहां से भी धमकी देकर छुड़वा दिया, और जब इस मंदिर में नियुक्ति हुई तो पुजारी ने मूर्ती के गहने के नकली होने का खुलासा किया, जिसके बाद से उसे परेशान किया जा रहा है, जबकि उनके आरोपो को जांच भी नहीं की जा रही है। उन्हें पिछले मामले में ही 2 साल लग गए मामला दर्ज कराने में, ऐसे में अभी जो उनके साथ हो रहा है उसे लेकर वो कैसे न्याय की उम्मीद कर सकते है।
महाराष्ट्र के एक गांव की नई पहल
4, दलितो से जुड़ा अगला मामला महाराष्ट्र के अहमदनगर से है, जहां जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए गांव की पंचायत ने एक बड़ा कदम हुआ है, जिसकी काफी तारीफ भी हो रही है। ये खबर अहमदनगर जिले के सौदाला गांव की है, जहां जातिवादी मानसिकता को तोड़ने के लिए गांव के अलग अलग जातियों और धर्मों के 15 युवाओं ने एक साथ रक्तदान कर ये ऐलान किया है कि गांव की पहचान जाति से नहीं बल्कि भाईचारे से होगी। इतना ही नहीं सौदाला गांव ने खुद को “जातिमुक्त गांव” घोषित कर दिया है।
सरपंच शरद आरगडे ने ग्रामीणों की सर्वसम्मति से जातिमुक्त गांव बनाने का फैसला किया गया है, जो केवल पुरे महाराष्ट्र का ही नहीं बल्कि पूरे भारत का पहला गांव बन गया है जिसने खुद को “जातिमुक्त गांव” घोषित किया है। गांव की ये पहल पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन गई है, अगर ये पहल और मजबूत होगी तो जातिवाद वाकई में जरूर खत्म हो जायेगा, और बाबा साहब का समान समाज का सपना पूरा हो जायेगा।
पंजाब यूनिवर्सीटी में जातिगत भेदभाव का मामला
5, दलितो से जुड़ा अगला मामला पंजाब के चंडीगढ़ से है, जहां एक सिख धर्म से आने वाले दलित शख्स को भी यूनिवर्सिटी में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, सोशल मीडिया पर पंजाब यूनिवर्सिटी के एक दलित असिस्टेंट प्रोफेसर, हरप्रीत सिंह का वीडियो काफी वायरल हो रहा है, हरप्रीत ने बताया कि वो इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप काम करते है, लेकिन पिछले 2 सालो से उन्हें और उनके दूसरे दलित साथियों को जातिवादी टिप्पणी और अपमान का सामना करना पड़ रहा है।
हरप्रीत ने अपने ही डिपार्टमेंट की प्रोफेसर डॉ. स्मृति शर्मा पर आरोप लगाया कि वो अक्सर उन्हें अपमानित करती है। इतना ही नहीं जब उनका प्रोमोशन हुआ तो प्रोफेसर डॉ. स्मृति शर्मा ने उनके खिलाफ ही शिकायत दर्ज करा दी, उन्होंने कहा कि वो सिस्टेमैटिक जातिगत भेदभाव” का शिकार हो गये है। उन्होंने ये भी कहा कि चेयरपर्सन डिपार्टमेंट के फैकल्टी मेंबर्स और यूनिवर्सिटी अथॉरिटीज़ के सपोर्ट के बिना कोई इस तरह से बार बार अपमान नहीं कर सकता है।
हरप्रीत ने टीचर के साथ साथ दलित छात्रों के साथ होने वाले जातिगत उत्पीड़न का भी खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि अगर कॉलेज उनकी अपील पर जल्द से जल्द कोई कार्यवाई नहीं करता तो वो धरना देने पर मजबूर हो जायेंगे। हैरानी की बात है कि एक तरफ यूजीसी के नए नियमो को लागू नहीं करने दिया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ दलित छात्रों को तो छोड़िये टीचर को भी नहीं बख्शा जा रहा है।



