गुप्त राजाओं का संरक्षण और बौद्ध भिक्षुओं की शिक्षा, नालंदा का अनसुना इतिहास

High Discipline in Nalanda
Source: Google

Nalanda only for Buddhists: बौद्ध धर्म का विस्तार तीसरे ईसा पूर्व से 11वी शताब्दी तक काफी हुआ, महान सम्राट अशोक जैसे शासक ने खुद बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया, लेकिन जब पांचवीं शताब्दी में भारत का पहला विश्वविद्यालय नालंदा स्थापित हुआ तब बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को और ज्यादा मजबूत करने का मौका मिला, नालंदा यूनिवर्सिटी, जिसे हम या आप गुरुकुल भी कह सकते है, क्योंकि नियम सारे गुरुकुल के ही थे।

लेकिन जब आप इसके दमन का इतिहास उठाते है तो ज्यादातर यहीं बताया गया है कि बख्तियार खिलजी ने उसके स्वागत में आये बौद्ध शिक्षकों को और छात्रों को गाजर मूली की तरह काटा। उनका कत्लेआम किया। जिससे एक प्रश्न उठता है कि क्या नालंदा केवल बौद्धों का ही था, क्या वहां केवल बौद्ध धर्म की ही शिक्षा दी जाती थी। अपने इस वीडियो में हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि नालंदा को केवल बौद्ध धर्म के आधार और अवधारणाओं तक ही सीमित क्यों कर दिया गया। और इसे केवल बौद्धों का बताने के पीछे की क्या सच्चाई है।

नालंदा विश्वविद्यालय को स्थापित करने की कहानी-

नालंदा विश्वविद्यालय को पांचवी सदी के आसपास 427 ईसवी में गुप्त साम्राज्य के राजा कुमारगुप्त, जिन्हें शकरादित्य के नाम से भी जाना जाता है,  उन्होने स्थापित किया था। वो पूरे भारत का पहला विश्वविद्यालय था। गुरुकुल परंपरा के लगभग खत्म होने के बाद नालंदा गुरुकुल का ही एक रूप था। जहां छात्र आते थे, और कई सालों तक वो यहीं रहा करते थे, एक साधारण जीवन जीते, शिक्षा ग्रहण करते थे लेकिन नालंदा को केवल बौद्ध धर्म का गढ़ कहना गलत होगा। नालंदा को स्थापित करने वाले राजा कुमारगुप्त खुद एक बौद्ध अनुयायी नहीं थे, वो वैष्णव परंपरा को मानते थे, लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म को पूरा सम्मान दिया था। उन्होंने अपने समय में बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनो को पूरा सम्मान दिया था और उन्हें बढ़ावा दिय़ा था।

नालंदा को इसीलिए विश्वविद्यालय कहा गया, बौद्ध विहार नहीं। कहा जाता है कि उनके दरबार में प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के विद्वान काफी सम्मानिय पद प्राप्त था। वहीं बौद्ध ग्रंथ निकायसंग्रह के अनुसार सम्राट अशोक ने भी नालंदा में एक विहार (मठ) की स्थापना की थी। यानि कि नालंदा में बौद्ध धर्म का विस्तार पांचवी सदी से कई पहले से ही हो चुका था। नालंदा विश्वविद्यालय को केवल शिक्षा के मंदिर के रूप मे स्थापित किया गया था, जिसमें मुख्य रूप से बौद्ध दर्शन, योग, चिकित्सा, संस्कृत, खगोल विज्ञान, तर्कशास्त्र, वेदों पुराणों और वैदिक ज्ञान जैसी शिक्षाओं को छात्र एक साथ अर्जित कर सकें इसके लिए स्थापित की गई थी।

हालांकि बौद्ध ज्ञान को स्पेशली महत्व देने के कारण इसे महाविहार भी कहा जाने लगा और यहां भारत के बाहर से भी आने वाले छात्र विशेषकर बौद्ध शिक्षाओं को ही ग्रहण करने आते थे। उनका पहनावा हिंदुओं की तरह नही बल्कि बौद्ध भिक्षु की ही तरह होता था, इसलिए इसे बौद्ध धर्म का गढ़ माना जाने लगा। लेकिन ये केवल एक भ्रांति मात्र है कि नालंदा केवल बौद्धो का था, नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म के अलावा हिंदू धर्म को मानने वाले छात्रों की भी अच्छी खासी तादाद थी, जो अपने धर्म के अनुसार चलते थे, लेकिन चुंकि उनका रहना सहन, पहनावा और आचरण बौद्ध भिक्षुओं की तरह ही था।

सभी छात्रो को सिर मुंडवा कर रखना पड़ता था, एक भिक्षु की तरह ही दिनचर्या काफी सख्त और अनुशासन के साथ रहना होता थी। इसलिए उस वक्त ये फर्क करना थोड़ा मुश्किल होता होगा कि कौन बौद्ध अनुयायी है और कौन हिंदू.. वहीं सभी छात्रो को प्रवेश पाने के लिए एक समान परिक्षा से होकर गुजरना पड़ता था, सभी को एक समान शिक्षा दी जाती थी, जो बौद्ध ज्ञान प्राप्त कर रहा है उसे हिंदू ग्रंथों, वेदों और पुराणों की भी शिक्षा हासिक करना अनिवार्य था, इसलिए सबको बराबर ज्ञान प्राप्त होता था।

नालंदा विश्वविद्यालय असल में बौद्धों के प्रभाव में इसलिए भी रहा क्योंकि उस वक्त बौद्ध धर्म का काफी बोलबाला था, और उसका तेजी से विस्तार हो रहा था। खासकर नालंदा में महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा, दर्शन और अनुसंधानात्मक शिक्षा के वैश्विक केंद्र के रूप में शिक्षा दी जाती थी लेकिन इस बात के प्रमाण कहीं भी नहीं है कि नालंदा में छात्रों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी जाती थी, या उनका बौद्ध धर्म में धर्म परिवर्तन कराया जाता था। यानि कि कुल मिलाकर हम ये कह सकते है कि नालंदा कोई बौद्ध विहार नहीं था, और वो केवल बौद्धो का ही नहीं था। वहां हिंदू छात्र भी पूरे सम्मान के साथ रहते थे। जो केवल ज्ञान का प्रकाश देने के लिए ही प्रचलित हुआ था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *