Baba Saheb Ambedkar: ये तो हम सभी जानते है कि जब बाबा साहब ने संविधान का निर्माण किया था तब उन्होंने दलितो औप पिछड़ों को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त करने के लिए मात्र 10 सालो के लिए ही आरक्षण देने की पेशकश की थी। हालांकि उन्हें तब शायद इस बात का अहसास था कि आरक्षण जिसे दलितों के उत्थान और उनके आगे बढ़ने की सीढ़ी बना कर पेश किया गया था, वो दलितो के उत्पीड़न, उनपर अत्याचार का कारण भी बन सकती है, और इसलिए इसे केवल 10 साल के लिए ही लागू किया गया था।
लेकिन संविधान के लागू होने के 10 साल पूरे होने से पहले ही 6 दिसंबर 1956 को बाबा साहब का अचानक निधन हो गया और तब से ये क्लॉज तमाम राजनीति कारणों से हटाया ही नहीं गया.. और इसके कारण आज दलितों की क्या स्थिति है उससे हम या आप बखूबी वाकिफ है.. हालांकि संसद चाहे तो आरक्षण अब भी हटा सकती है लेकिन क्या आप ये जानते है कि संविधान निर्माता बाबा साहब ने संविधान के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक ऐसा क्लॉज भी बनाया है, जिसे चाह कर भी कोई भी सरकार, कोई भी संसद नहीं बदल सकती है, अपने इस लेख में हम उसी क्लॉज के बारे में जानेंगे..और क्यों लिया था बाबा साहब ने ये फैसला।
संशोधन की शक्ति
दरअशल संविधान का अनुच्छेद 338 ये अनुमति देता है कि अगर जरूरत हो, और संवैधिक हो तो संविधान में संशोधन किया जा सकता है। लेकिन यहां ये भी तय किया जाता है कि संशोधन संविधान की मूलभूत पहचान और मूल्यों को संरक्षित रख कर ही किया जायेगा। लेकिन अनुच्छेद 338 की अनुमति के बावजूद भी कुछ ऐसे नियम है जिसमें बदलाव नहीं किये जा सकते है।
क्या था 1973 का केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामला
दरअसल 24 अप्रैल साल 1973 के दिन सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की बैंच ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया था। जिसके अनुसार संसद को भले ही संशोधन करने का अधिकार दिया गया है, और संविधान में पूरी तरह से साफ साफ नही बताया लेकिन बावजूद इसके संविधान के basic structure of doctrine के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। इसमें शामिल है भारत की लोकतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और कानून के शासन, जिन्हें किसी भी हाल में न तो बदला जा सकता है और न ही निरस्त किया जा सकता है।
संविधान की सर्वोच्च्ता ही सर्वोपरि
संसद भले ही अनुच्छेद 368 का इस्तेमाल करके संशोधन कर सकती है लेकिन वो भी अपने दायरे में, संसद कोई भी वो संशोधन नहीं कर सकती है जिससे संविधान की मूल पहचान को खत्म करने की कोशिश की गई हो। इस सिद्धांत में कई बिंदुओ को शामिल किया गया है, जिसमें संविधान की सर्वोच्च्ता ही सर्वोपरि है, न्यायपालिका पूर्ण रूप से स्वतंत्र है, सभी विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की शक्तियों को अलग अलग बांटा गया, कोई एक शक्तियों का भोग नहीं कर सकता है।
बेसिक स्ट्रक्चर में बदलाव किया
हमेशा लोकतांत्रिक और गणतंत्रात्मक सरकार का ही चुनाव और उनका शासन, यानि की सरकार हमेशा जनता ही चुनेगी, हर एक नागरिक की स्वतंत्रता और गरिमा बनी रहेगी, किसी भी राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा, देश को एकजुट रखना सबसे महत्वपूर्ण है, जैसे सिद्धांतों को शामिल किया गया था। संविधान में लिखो ये सिद्धांत बदले नहीं जा सकते है और न ही उनका दुरुपयोग किया जा सकता है.. सही मायने में बेसिक स्ट्रक्टर के कारण ही संसद के भी हाथ बंधे हुए है, नहीं तो जैसे हालात इस वक्त है।
दलितो और पिछड़ो का जिस तरह से हनन हो रहा है, उसे देखकर लगता है कि अगर बेसिक स्ट्रक्चर में बदलाव किया जाता तो दलितो और पिछड़ो को भी रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की तरह कब का देश से बाहर निकाल दिया गया होता। 1973 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ये कहा गया कि संसद संविधान के किसी भी अनुच्छेद या क्लॉस में बदलाव कर सकती है, लेकिन मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी.. और न भविष्य में ऐसा किया जा सकेगा।
संविधान को लेकर बाबा साहब की दूरगामी सोच पर पहले भी कई बार चर्चा की जा चुकी है, लेकिन बाबा साहब ने जो संविधान बनाया है उसके कारण ही इतना बड़ा देश सुचारू रूप से चल रहा है। हालांकि जिन दलितो के उत्थान के लिए उन्होंने इतनी लंबी लड़ाई लड़ी थी वो अब भी जारी है। मगर उनके कारण ही देश में दलितो को कुछ तो सम्मान और आर्थिक शसक्ति मिली है।



