Why Buddha Denied God: बौद्ध धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमें ईश्वर के अस्तित्व को माना ही नहीं जाता, यानि कि जो बुद्ध को मानते है वो कहते है कि बुद्ध ने सीधे तौर पर ईश्वर को मान्यता ही नहीं दी, और बौदध धर्म के अनुयायी बुद्ध को ही भगवान मान कर पूजने लगे। उन्हें ही भगवान बुलाने लगे, जबकि बुद्ध ने खुद को स्वयं केवल मानव कहा था। ऐसे में जब वदिक काल से ईश्वर का, परम शक्ति का अस्तित्व संसार में होने की बात की जाती है।
वैदो पुराणों में ईश्वर के होने, इस संसार की रचना करने वाले, इसे चलाने वाले के बारे मे बातें होती है, तो फिर बुद्ध ने ईंश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार क्यो कर दिय़ा था। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्या सच में बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व को नकारा था.. अगर हां तो इसके पीछे की वजह क्या थी।
बुद्ध मार्गदाता है मुक्ति दाता नहीं
गौतम बुद्ध ने जब अपना ज्ञान लोगो तक पहुंचाने की यात्रा शुरु की तब उन्होंने चार आर्य सत्य और 8 अष्टांगिक मार्ग के जरिये लोगो को मुक्ति का मार्ग बताया था, यानि कि जो लोग बुद्ध को मुक्ति का साधन मानते है, असल में ये अवधारना ही गलत है। बुद्ध वो है जिन्होंने स्वंय कहा था वो मुक्ति का मार्गदाता है, वो मुक्ति दाता नहीं है। यानि की वो केवल आपका सत्य की तरफ मार्ग प्रशस्त करेंगे, लेकिन उसपर चलना है या नहीं या उस मार्ग पर कैसे चलना है, ये व्यक्ति को खुद ही तय करना होता है। बुद्ध कहते थे कि संसार किसी ईश्वर ने नहीं बनाया बल्कि प्रतीत्यसमुत्पाद यानि की कारण प्रभाव के नियमों से चलता है।
किसी भी व्यक्ति का दुख उसके स्वयं की उत्पन्न की गई विचार है, जिससे कोई भी अन्य निकाल नहीं सकता सिवाय स्वंय उस व्यक्ति के। व्यक्ति के सुख दुख के लिए कोई परम शक्ति जिम्मेदार नहीं है बल्कि आपके खुद के कर्म जिम्मेदार है, अगर आप अपने कर्मो को सुधार लेंगे तो स्वयं दुखो के आजाद हो जायेंगे। ईश्वर के नाम पर हम अपने कर्मो को कमजोर करके उसपर ही निर्भर होने की कोशिश करते है, जिससे हमारा कर्म प्रभावित होता है। संसार में कुछ भी स्थाई नही है, इसलिए शाश्वत ईश्वर का सिद्धांत सही कैसे हो सकता है।
हमारा जीवन दीये की ज्योत की तरह
बुद्ध कहते है कि व्यक्ति का सबसे बड़ा लालच यहीं है कि वो हमेशा रहना चाहता है, लेकिन बौद्ध धर्म आपको निर्वाण का मार्ग बताता है। बुद्ध के अनुसार जिसने निर्वाण प्राप्त किया वो जीवन मरण के चक्कर के आजाद हो जायेगा.. जैसे एक मोमबत्ती है, जब वो जलती है तो मोम के साथ जलने वाली बाती पूरी तरह से खत्म हो जाती है, वैसे ही मनुष्य के आत्म जब तक पूरी तरह से खत्म नहीं होती तब तक ये चक्र भी खत्म नहीं होता।
क्यों कहा जाता है भगवान
जब आप पाली स्क्रिप्चर देखेंगे तो पायेंगे कि उसमे बुद्ध को ही भगवान कहा गया है, लेकिन सच तो ये है कि बुद्ध के लिए भगवान नहीं बल्कि भगवा का इस्तेमाल किया गया है, जिसका मतलब होता है एक ऐसा व्यक्ति जो भाग्यशाली हो, पूज्यनीय हो, जिसने सभी द्वेष, मोह, क्रोध, लोभ और सभी अवगुणों से मुक्ति पा ली हो, वो व्यक्ति जो पवित्र और ज्ञान से परिपूर्ण हो.. वहीं भगवा है, वहीं भगवान है। बुद्ध के जीवन और उनके ज्ञान को दर्शाने वाला ग्रंथ त्रिपिटक में भगवान शब्द गौतम बुद्ध के लिए ही इस्तेमाल किया गया है।
ईश्वर को न मानने वाला नास्तिक
हालांकि बुद्ध ने कभी भी स्वयं ईश्वर को लेकर चर्चा नही की क्योंकि वो मानते थे कि ये समय व्यर्त करने वाला एक अप्रासंगिक विषय है, जिस पर चर्चा करना व्यर्थ है। जबकि मनुष्य को स्वयं के भीतर झांक कर अपने विकारो को खत्म करने पर ध्यान देना चाहिए। कुल मिलाकर हम ये कह सकते है कि जैसा कि हिंदू धर्म में कहा जाता है कि ईश्वर को न मानने वाला नास्तिक कहलाता है वैसे ही बौद्ध धर्म भी एक नास्तिक धर्म है, जो ईश्वर के अस्तित्व तक को नहीं मानता है।
जो ये मानता है कि व्यक्ति स्वयं का पालक है, और अपनी अंतर्रात्मा को जागृत करके वो मुक्ति पा सकता है। बुद्ध के विचार आज भी जारी है, बौद्ध धर्म को मानने वाले ईश्वर को मानने को बजाये खुद को पवित्र करने की कोशिश करते है, इसलिए उन्हें दूसरे की जाति धर्म से कोई लेना देना नहीं होता, वो केवल मानवता को ही धर्म मानते है।



