Gautam Buddha and Amrapali: बुद्द ने जब ज्ञान प्राप्त किया था, उससे पहले राजकुमार सिद्दार्थ गौतम के रूप में उनकी जीवन धन धान्य से परिपूर्ण विलासिता से भरा हुआ था। उनके पिता ने सारे ऐशो आराम की सुविधायें उन्हें मुहैया कराई थी.. लेकिन एक राजकुमार होते हुए भी उन्होंने सत्य की खोज में सारा राजपाट मिट्टी का ढेर समझ कर स्वयं छोड़ दिया था। जब उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया तो वो समझ गए कि केवल सात्विक और सादा जीवन ही आपको सत्य के पास ले जा सकता है.. लेकिन बावजूद इसके एक वक्त ऐसा आया था जब वैशाली की यात्रा के दौरान बुद्ध के तेज और उनके सौंदर्य के प्रभावित होकर तब के समय की सबसे खूबसूरत महिला और मगरवधू आम्रपाली ने बुद्ध को कई बार मोहित करने की कोशिश की थी।
लेकिन बुद्ध की आध्यात्मिकता और शांत व्यक्तित्व के कारण वो सफल ही नहीं हो सकी.. और जल्द ही उसे आहसास हुआ कि उसने गलती की…वहीं बुद्ध का प्रभाव पूरे वैशाली में था.. लोग उन्हें खाने पर निमंत्रित करने के ललायित रहते थे लेकिन अपने अनुयायियो के इंकार करने के बाद भी बुद्ध ने सबके आमंत्रण को छोड़ कर आम्रपाली का आमंत्रण स्वीकार कर लिया.. आखिर क्या थी उसकी वजह..और क्यों एख वैश्या के घर जाना स्वीकार कर लिया था बुद्ध.. क्या ये था बुद्ध का कोई बड़ा संदेश..जानेंगे सबकुछ विस्तार से।
आम्रपाली वैशाली की सबसे सुंदर स्त्री
दरअसल आम्रपाली वैशाली की सबसे सुंदर स्त्री थी, जिसे उसके पिता ने गोद लिया था। लेकिन जैसे जैसे वो बड़ी हुई उसकी सुंदरता ही उसकी दुश्मन बन गई..हर पुरुष उससे विवाह करना चाहता था, जिससे रक्तपात होने का खतरा हो सकता था, नतीजा तब वहां के उच्च लोगो ने ये फैसला सुना दिया कि वो नगरवधू बनेगी और आजीवन अविवाहित रहेगी.. यानि की वो एक वैश्या की तरह जीवन जीयेगी.. और उसे राजा की तरफ से सारे राजशी ठाटबाट दिये जायेंगे। आम्रपाली एक नगरवधू के तरह ही जीवन जी रही थी।
आम्रपाली ने बुद्ध को मोहित करने की कोशिश की
लेकिन जब उसके जीवन में भगवान बुद्ध ने प्रवेश किया तो वो बुत सी हो गई। एक तरफ आम्रपाली को देखने वाला हर शख्स उसकी सुंदरता पर मोहित हो जाता, उसे पाना चाहता, वहीं बुद्ध ने उसे उपभोग की वस्तु की तरह नहीं बल्कि एक पवित्र मां की तरह देखा..उल्टा आम्रपाली उनके तेज से प्रभावित हो गई। आम्रपाली ने सोचा कि ऐसा पुरुष उनके साथ क्यों नहीं है.. आम्रपाली ने कई कोशिशे की बुद्ध को मोहित करने की लेकिन वो सफल नहीं हो सकी.. और धीरे धीरे आम्रपाली को अपनी गलती का अहसास हुई। लेकिन उससे ज्यादा उसका जीवन तब बदला जब एक बौद्ध शिष्य आम्रपाली के घर पर करीब 4 महीनों तक रहा था।
आम्रपाली ने शिष्यों को आमंत्रित किया
दरअसल एक बार की बात है, बुद्ध अपने कुछ शिष्यों के साथ वैशाली आए हुए थे और एक उपवन में रह रहे थे। रोजाना की तरह बौद्ध शिष्य भिक्षा मांगने के लिए जब वैशाली के नगर में घूम रहे थे तभी उनमें से एक शिष्य ने आम्रपाली के द्वारा पर भी भिक्षा मांगी। सबको पता था कि वो एक वैश्या है, इसलिए भिक्षुओं को भी थोड़ी हिचक हुई लेकिन बौद्ध कर एक शिष्य ने बिना हिचके ही भिक्षा की मांग की। आम्रपाली उस भिक्षु से काफी प्रभावित हुई। वो चाहती थी कि भिक्षु उसके साथ रहे, उसने कहा कि वो भिक्षु को पर्याप्त भिक्षा देगी, लेकिन अब वर्षाकाल शुरू होने वाला है, तो वो कहा भटकेंगे उससे अच्छा है कि वो वर्षाकाल में आम्रपाली के महल में रहे।
आम्रपाली को भी सात्विकता की तरफ ले आयेगा
भिक्षु ने ये सुनके केवल इतना कहा कि वो पहले शाक्य मुनि बुद्ध से पूछ कर बताएगा। वो शिष्य बुद्ध के पास गया और सारा वृतांत बताया, जिसे सुनने के बाद बुद्ध ने इजाजत दे दी। लेकिन जब अन्य शिष्यों ने सुना तो वो बुद्ध से पूछने लगे कि एक वैश्या के यहां रहने की इजाजत क्यों दी। बुद्ध ने बड़े शांत मन से कहा कि अगर शिष्य की आस्था उसका आत्मज्ञान शुद्ध नहीं होगा तो वो आम्रपाली के सौंदर्य से मोहित होकर उसके पास ही रह जायेगा लेकिन यदि उसकी साधना सच्ची होगी तो वो आम्रपाली को भी सात्विकता की तरफ ले आयेगा। करीब 4 महीनों के बाद शिष्य आया और उसके पीछे से साफ और शुद्ध मन से चलती हुई आ रही थी आम्रपाली। यानि की आम्रपाली का सौंदर्य आत्मज्ञान को काबू नहीं कर सका।
जब आम्रपाली का निमंत्रण किया स्वीकार
आम्रपाली बुद्ध से मिली तब वो वैश्यावृत्ति छोड़ चुकी थी, सात्विक जीवन जी रही थी.. उसने पवित्र मन से बुद्ध को अपने यहां भोजन पर आमंत्रित किया.. वहीं पास में कई धनी भी थे जो चाहते थे बुद्ध उनके यहां चले, लेकिन सबको को छोड़ कर बुद्ध ने आम्रपाली का निमंज्ञण स्वीकार कर लिया जब शिष्यों ने ऐसा करने का कारण पूछा तो बुद्ध ने उत्तर दिया कि सभी अपने यश और धन का गुणगाण गाने के लिए आमंत्रित करने आये थे, लेकिन आम्रपाली इकलौती ऐसी थी जिसने अपने पापो का अहसास किया.. वो पश्चाताप की आग में जली है, उस अग्नि में जल कर उसका मन पवित्र हो गया।
इसलिए वो अब अपवित्र नहीं बल्कि एक साध्वी है। और साध्वी के यहां भोजन करने में कैसा हर्ज। बुद्ध की ये बात शिष्यों को समझ आ गई…. वो समझ गई कि किसी ने पूर्व में क्या किया वो जरूरी नहीं है बल्कि वो आज क्या है कैसा है, उस पर उसका चरित्र निर्भर करता है। ऐसा था बुद्ध का प्रभाव.. जिनके कारण एक नगरवधू बौद्ध भिक्षुणी बन गई।



