अप्रैल 2025 से भारत के दक्षिणी हिस्से में एक मुद्दे को लेकर काफी बवाल मचा हुआ है। और ये बवाल तब शुरू हुआ जब आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक फैसला सुनाया था कि जो दलित धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन गए है, उन्हें scst एक्ट के तरह न तो कोई लाभ मिलेगा और उनके साथ हुए भेदभाव के खिलाफ हुए शिकायत को वैध माना जाएगा। याचिकाकर्ता आनंद पॉल जो कि 10 पहले एक ईसाई बन गया था उसने अपनी याचिका सुप्रीम कोर्ट में दे दी।, मुद्दा फिर से वहीं था कि दलितों को मिलने वाले लंबी दलित ईसाइयों को भी मिले।
सिखों और बौद्धों को आरक्षण कब और कैसे मिला?
करीब एक साल बाद 24 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और आनंद पॉल का केस खत्म कर दिया। लेकिन इस फैसले के बाद से दलित ईसाई को एससीएसटी कैटिगरी में रखने और उन्हें भी लाभ देने की मांग तेज हो गई ,लेकिन सवाल ये है कि जहां देश के हिंदुओं के साथ साथ सिखो और बौद्ध को भी आरक्षण मिलता है तो वहीं आखिर देश के ईसाई को मुसलमानों को इसका लाभ क्यों भी दिया गया क्या हुआ था साल 1950 में, जिसमें कारण ये अधूरा क्लॉज बनाया गया था। और क्या वाकई ने दलित स्थाई इस अनुकम्पा के काबिल है। जानेंगे सब कुछ इस वीडियो में।
1950 का आदेश क्या था?
सबसे पहले जानते है कि आखिर 1950 में कौन वो फैसला हुआ था जिसके कारण इसाईयों और मुसलमानों को एससीएसटी कैटेगरी से बाहर रखा गया। दरअसल 1950 में राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने एक कानून पारित किया था, जिसके पैरा नंबर 3 में ये दर्शाया गया है कि अनूसूचित जाति के आधार पर मिलने वाले लाभ, नौकरियों में आरक्षण सभी कुछ पाने के दायरे में हिंदू धर्म के अलावा सिखों और बौद्ध धर्म को मानने वालो को शामिल किया गया था तो वहीं ईसाई और मुसलमानो को इस दायरे से बाहर रखा जायेगा। इसे खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की कैबिनेट में पारित किया गया था।
मुसलमान और ईसाई बाहर क्यों रहे?
ये कानून साफ तौर पर कहता कि अगर कोई हिंदू दलित सिख या बौद्ध अपनाता है तो उसे लाभ मिलेगा लेकिन अगर वो इस्लाम या ईसाइ अपनाता है तो उसके अधिकार खुद ही समाप्त हो जायेंगे। ये संविधान के अनुच्छेद 341(1) के तहत 10 अगस्त 1950 को लागू किया गया था, जिसके बाद साल 1956 में सिखों को और फिर साल 1990 में बौद्धो को भी इस सूची में शामिल किया गया था।
इसमें दो बार प्रावधान भी हुए.. ये बदलाव सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े उन दलितो के लिए किये गए जो समानता की इच्छा रखते हुए सिख धर्म या फिर बौद्ध धर्म अपना लेते है उनके लिए आर्थिक और समाजिक तौर पर मजबूती देने के लिए नौकरी से लेकर शैक्षणिक संस्थानों में भी आरक्षण दिया गया। जैसा कि हिंदू धर्म के दलितों और पिछड़ो को दिया गया है। इसी के साथ फैसला हुआ था कि जब तक संविधान में संशोधन नहीं होता तब तक ये नियम चलता रहेगा।
क्यों दलित ईसाई मांग रहे है आरक्षण
अब सवाल ये उठता है कि धर्म परिवर्तन करने वाले दलित ईसाई भी क्यों चाहते है कि उन्हें आरक्षण मिले.. तो इसका सीधा जा जवाब है.. सामाजिक असमानता..जी हां, शायद आपको विश्वास न हो.. कि हिंदू धर्म में जिस असमानता से तंग आकर .ये लोग ईसाई धर्म या इस्लाम अपनाते है असल में वो बराबरी और सम्मान उन्हें धर्म बदलने के बाद भी नहीं मिलती है। केवल धर्म बदलता है, न तो स्थिति बदलती है औऱ न ही भेदभाव की सोच। दलितों को ईसाई बनाने के लिए ईसाई मिशनरी कई लुभावने वादें करती है, आर्थिक मदद करने की बाद करती है, लेकिन सच तो है ये कि उन्हें कभी वो सम्मान हासिल ही नहीं होता।
दलित ईसाई और हिन्दू दलितों की स्थिति के सामान
केवल कानून रूप से उनका धर्म बदल जाता है, लेकिन दलित होने के कारण लोगो की जो मानसिकता उनके प्रति रही, वो कभी नहीं बदलती है। उन्हें चर्च में भी मूल इसाई हीन भावना से देखते है, तो वहीं हिंदू धर्म में तो उन्हें कानून अस्वीकार्य बना दिया जाता है। ईसाई बनने के बाद भी वो सामाजिक रूप से दलित ही रहते है, जिसके कारण उनकी स्थिति न इधर की रहती है और न उधर की… वो न हिंदू रहते है और न पूरे ईसाई..वो केवल दलित ही रह जाते है। दलित ईसाईयों की स्थिति सही मायने में हिंदू दलितो से कुछ बेहतर नहीं होती.. न तो उनके पास रोजगार होता है और न ही आर्थिक मदद.. ऐसे में सरकार से उनकी लड़ाई कही न कहीं जस्टिफाई लगती है।
आर्थिक कमजोरी और जातिगत भेदभाव के साथ धर्म बदलने के बाद तो उन्हें धार्मिक भेदभाव का भी सामना पड़ता है। मतलब साफ है कि दलितों को ईसाई बन कर भी कुछ भी हासिल नहीं होता है। ऐसे में क्या दलितों को भी 341(1) सूचि में शामिल करना चाहिए या नहीं.. आपकी क्या राय है। क्या धर्म बदलना सहीं फैसला है.. या फिर ऐसे धर्म ही क्यों चुना जायें, जब आपको पुराने धर्म के लाभ चाहिए.. क्या दलित ईसाइयों के लिए सरकार को कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है।



