BNS की धारा 31 क्या है? जानें सद्भावनापूर्वक किए गए संचार से जुड़े कानूनी अधिकार

BNS Section 31
Source: Google

BNS Section 31: जरा सोचिए एक व्यक्ति है जो काफी लंबे समय से बीमार है, उसे डॉक्टर दवा दे रहा है तो वो ठीक हो जा रहा है और जहां दवा का असर कम हुआ, वो फिर से बीमार पड़ रहा.. डॉक्टर ने बस शक जाहिर कर दिया कि वो बड़े अस्पताल में दिखायें, लेकिन जब व्यक्ति बड़े अस्पताल में गया तो वहां उसे पता चला कि उसे काफी लंबे समय से एक लाइलाज बिमारी और वो जल्द मरने वाला है।

तो फिर जिस डॉक्टर ने उसे बड़े अस्पताल में दिखाने की सलाह दी…मरीज उसे खरी खोटी सुनाता है, उसे ही अपनी हालात का जिम्मेदार ठहराता है, तो क्या ऐसे में वो डॉक्टर वाकई में अपराधी बन जाता है.. और अगर डॉक्टर पर मरीज केस कर देता है तो क्या डॉक्टर के पास ये कानूनी अधिकार है कि वो अपना बचाव कर सकें, और क्या वो केस कानूनन रूप से वैध होगा.. और कानून की कौन सी धारा डॉक्टर की रक्षा करेगी.. जानेंगे सबकुछ डिटेल्स में..

क्या है बीएनएस की धारा 31

साल 2023 में संविधान के भारतीय न्याय सहिंता में हुए बदलावों के बाद बीएनएस की धारा 31 सद्भावनापूर्वक किये गये संचार दर्शाती है, जिसके तहत देश के हर एक नागरिक को ये कानूनी अधिकार दिये गए है कि यदि कोई व्यक्ति सद्भावनापूर्वक संचार करता है और उसके करण किसी को नुकसान या किसी की मौत हो जाती है तो वो बीएनएस की धारा 31 का उल्लंघन नहीं होगा।

बीएनएस की धारा 31 कहती है कि साफ मन और सद्भावना से किया गया कोई भी कार्यकलाप, जिसके पीछे किसी की विकृत मंशा न हो, और नुकसान पहुंचाने के इरादे से न किया गया हो तो वो बीएनएस की धारा 31 के तहत माना जायेगा। इसके मुताबिक अगर किसी के सच बोलने से व्यक्ति का भला न होता हो, लेकिन ये उक्त व्यक्ति और उससे जुड़े लोगों के भविष्य के लिए बेहतर है तो अपराध नहीं होगा।

डॉक्टर की लापरवाही से कुछ नहीं हुआ

जैसे डॉक्टर ने मरीज को सलाह दी थी कि वो बड़े अस्पताल में इलाज कराये, लेकिन वहां मरीज को लाइलाज बीमारी का पता चला, तो उसके लिए मरीज डॉक्टर को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता है, यहां डॉक्टर की लापरवाही से कुछ नहीं हुआ है, कोई लाइलाज बिमारी, एक दिन में या एक हफ्ते में नहीं हो सकती है, जिसके लिए कोई मरने वाला हो.. इसलिए वो बिमारी पहले से होने के चांसेज है.. ऐसे में जिस डॉक्टर ने उसका पहले इलाज किया हो, औऱ जिसने बाद की रिपोर्ट बताई, दोनो ही बीएनएस की धारा 31 के उल्लंघन से बाहर है।

वहीं अगर सच जानने के बाद मरीज की मौत हो जाती है तो भी वो अपराध की श्रैणी में नहीं आयेगा, इसलिए दोनो पर किसी तरह का मामला ही दर्ज नहीं होगा। ऐसे में कोर्ट को अधिकार है कि वो इस मामले को ही खारिज कर दें। क्योंकि दोनो ही जगह डॉक्टर का कोई गलत मोटिव नहीं था मरीज को सलाह देने में या रिपोर्ट बनाने में। बीएनएस की धारा 31 अच्छे इरादे से बताये गए सच और किये गए कामों के बदले उन पर कोई अपराधिक कार्यवाई न हो, उसके लिए काम करने वाले नागरिक के आधिकारों की रक्षा करता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *