बौद्ध धर्म के अनुयायियों को कई महत्वपूर्ण नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है, लेकिन ये नियम कई बार आपको दिक्षा प्राप्त करने के लिए पालन करना अनिवार्य होता है.. उन्ही नियमों से एक नियम है जिसे हर एक भिक्षु पालन करना चाहता है तो वो है वर्षावास का नियम.. जो हर किसी के बस की बात नहीं है। सालों की तपस्या औऱ ध्यान के बाद ही भिक्षु वर्षावास के काबिल बनता है..वर्षावास का नियन, जिसे खुद बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध ने ही शुरु किया था.. पाली भाषा में इसे “वस्सवसा” कहा जाता है जिसमें वस्स का मतलब है वर्षा और वसा का मतलब है वास करना।
यानि की वर्षा ऋतु के दौरान निवास करना। ये एक ऐसी परंपरा है जो बुद्द के काल से ही चली आ रही है, और आषाढ़ पूर्णिमा से लेकर आश्विन पूर्णिमा तक बौद्ध भिक्षुओं का समय वर्षावास का माना जाता है। इंग्लिंश कैलेंडर की बात करें तो ये महीने जुलाई से शुरु होकर अक्टूबर तक होते है। बौद्ध धर्म में जहां बौद्ध भिक्षु जगह जगह भिक्षा मांग कर अपनी साधना पूरी करते है वहीं वर्षावास के दौरान उनका जीवन और कठिन हो जाता है. अपने इस वीडियो में वर्षावास के बारे में विस्तार से जानेंगे साथ ही कैसे वर्षावास बौद्ध भिक्षुओं को आध्यात्म के और करीब ले जाने में काफी सहायक होता है।
वर्षावास की परंपरा
बौद्ध धर्म का एक अहम ग्रंथ विनय पिटक में बुद्ध ने वर्षावास पर जाने औऱ क्यों इन तीन महीनों में बाहर विचरण करने की मनाही है उसके बारे में बताया गया है। दरअसल बुद्ध ने देखा था कि जब भारत में मानसून यानि की वर्षा ऋतु आती थी, तब नदियों और नालों का पानी उफान पर रहता था, वहीं बारिश के कारण सांप बिच्छु जैसे जहरीले जीव भी अपने अपने बिलो से बाहर निकल कर आते थे, और बौद्ध भिक्षु नंगे पैर रहा करते थे, ऐसे में एक तरफ भिक्षा मांगने के लिए नदी नालों को पार करने में कई बार ऊफान की चपेट में आ जाते थे, वहीं जहरीले जीवों के हमले के कारण भी भिक्षुओ की जान चली जाती थी, वहीं भिक्षु एक साथ काफी संख्या में निकलते थे।
वर्षावास के दौरान वातावरण शांत
जिससे खेतो में लगी हुई फसलो को नुकसान होता था, किसानो की मेहनता का सम्मान होना अनिवार्य था.. क्योंकि वहीं भिक्षुओ के लिए अन्नदाता थे। जिसके बाद बुद्ध ने तय किया कि मानसून के समय में भिक्षु भिक्षा मांगने नही जायेंगे बल्कि विहार में रहकर बौद्ध धर्म और गहन अध्ययन करेंगे, विपश्यना ध्यान। इसी के साथ वर्षा के कारण किसानों और गृहस्थों के पास भी काम कम होता था, ऐसे में उनके पास पूरा समय होता था उपदेश सुनने का, क्योंकि वर्षावास के दौरान वातावरण शांत और ध्यान के लिए सबसे योग्य समय होता है।
ऐसे में वर्षावास के दौरान न केवल भिक्षु खुद की रक्षा करते हुए आध्यत्मिकता के करीब जाते है बल्कि वो दूसरो को भी बौद्ध धर्म की शिक्षा देकर बुद्ध से जुड़ने के लिए प्रेरित करते है। वर्षावास के दौरान बौद्ध भिक्षुओं को एक दूसरे से अपने अनुभव शेयर करने का मौका मिलता है। जिससे भिक्षुओं के बीच सामूदायिक बंधन मजबूत होता है। वर्षावास पुण्य व आत्म-विकास के मार्ग पर चलने के लिए सबसे सटीक रास्ता है।
केवल उच्चतर दीक्षा पाने वाले ही करते है वर्षावास
वर्षावास करने के कई सख्त नियम है, जिसमें सबसे पहला नियम है कि वर्षावास केवल उन्हीं भिक्षुओं और भिक्षुणियों पर लागू होता है जिन्होंने उच्चतर दीक्षा प्राप्त की है… सबसे पहले नवप्रवेशी भिक्षु जिन्हें सामनेर कहा जाता है, और नवप्रवेशी भिक्षुणियों जिन्हें समानेरी कहा जाता है, उन्हें गुरू के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण के बाद दिक्षित करके उच्चतर दीक्षा यानि की उपसम्पदा को प्राप्त किया जाता है। उच्चतर दीक्षा पूरी होने के बाद भिक्षुओं से 227 अनुशासनात्मक नियमों का पालन करना अनिवार्य है तो वहीं भिक्षुणियों को 311 अनुशासनात्मक नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
भिक्षु और भिक्षुनिणों के आचरन पर ध्यान
वर्षावास के दौरान उच्च स्तरिय भिक्षु सभी भिक्षु और भिक्षुनिणों के आचरन पर ध्यान देते है, और तीन महीने बीतने के बाद “पावरना समारोह” होता है, जिसमें वर्षावास करने वाले भिक्षु शामिल होते है। और वहां उन भिक्षुओं को लेकर चर्चा होती है जिन्होंने ध्यान के माध्यम से कोई ज्ञान पाया और किसी का आचरन उन्हें सही नहीं लगा हो, ऐसे में उन पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा होती है। उसे सुधारने के लिए उचित उपाय सुझाए जाते हैं। वर्षावास के बाद एक महीने के लिए वस्त्राभूषण का महीना शुरु होता है जो एक महीने कर चलता है, जिसमें किसी भी तिथि को तय कर मंदिर या मठ में वर्षावास पालन करने वाले भिक्षुओं के समूह को “कथिना वस्त्र” दिया जाता है, जिसे चीवरदान भी कहा जाता है। जिसे भिक्षु पूरा साल धारण करते है।
वर्षावास केवल भिक्षुओं की आत्मशुद्धि, ध्यान का ही पर्व नहीं है बल्कि ये बुद्ध के बतायें अहिंसा के रास्ते को और मजबूती से प्रशस्त करते है। वर्षावास केवल एक समय नहीं बल्कि आत्मशुद्धि का सबसे अहम तरीका भी है। जो बुदध के करीब ले जाने में अहम माना जाता है, औऱ बौद्ध धर्म के लिए सबसे अहम परंपरा के रूप में स्थापित हो चुका है। जिसे बौद्ध धर्म से जुड़ा हर एक भिक्षु करना चाहता है।



