Vijayawada news: हाल ही में आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) के विजयवाड़ा (Vijaywada) से एक चौकाने वाली खबर सामने आई। जहाँ एक दलित माँ पिछले नौ सालों से अपनी बेटी की हत्या के इंसाफ मांग रहीं लेकिन उसे अभी तक न्याय नहीं मिला है। जिसके बाद,अब आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने गुंटूर ज़िले (Guntur district) के नल्लापाडु पुलिस (Nallapadu Police) को फटकार लगायी है और सवाल की आखिर क्यों पुलिस इसे आत्महत्या बता रहीं है। तो चलिए आपको इस लेख में पूरे मामले के बारे में विस्तार से बताते हैं।
दलित बच्ची की संदिग्ध हालात में मौत
जब हम कहते हैं कि हमारे देश में रहने वाले दलितों को परजीवी की श्रेणी में रखा जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे दूसरों से अलग हैं। हालाँकि, दलितों की वर्तमान स्थिति के कई उदाहरण हैं, चाहे उन्हें परजीवी माना जाए या नहीं। हर दिन दलितों के साथ अत्यचार होता है और फिर सालो तक भी उन्हें न्याय नहीं मिलता है। ऐसा ही एक मामला आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा से सामने आया है।
जहां 2017 में एक दलित बच्ची की संदिग्ध हालात में हुई मौत को लेकर होनो वाली ढिलाई को लेकर आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (Andhra Pradesh High Court) ने गुंटूर जिले के नल्लापाडु पुलिस को जमकर लताड़ लगाई है। दरअसल 28 फरवरी, 2017 को गुंटूर के बुदमपाडु के सेंट मैरी इंजीनियरिंग कॉलेज (St. Mary’s Engineering College) में पढ़ने वाली दलित छात्रा गरनेपुडी श्रावणी संध्या की कॉलेज में संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी।
पुलिस ने आत्महत्या करार देने की कोशिश
पुलिस ने इस मामले में जांच को बंद करने के लिए इसे आत्महत्या करार देने की कोशिश की थी, लेकिन अमृतालुर मंडल के गोपयापलेम की रहने वाली श्रावणी संध्या की मां गरनेपुडी जयलक्ष्मी ने पुलिस पर आरोप लगाया कि कॉलेज प्रबंधन और उसके रूममेट्स ने मिलकर उनकी बेटी की हत्या की है, लेकिन बार-बार थाने के चक्कर लगाने के बाद भी पुलिस के कानो पर जूं तक नहीं रेंग रही थी।
पीड़िता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया
जिसके बाद थक हार कर जयलक्ष्मी ने 6 जुलाई, 2017 को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, तब से एक मां अपनी बेटी के लिए न्याया का इंतजार कर रही है। हालांकि इस मामले में सुनवाई करते हुए 6 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बट्टू देवानंद (Justice Battu Devanand) ने पुलिस को लताड़ लगाते हुए पूछा जब सारे सबूत हत्या का इशारा कर रहे है तो फिर पुलिस इसे आत्महत्या क्यों बताना चाह रही है।
इस सुनवाई के बाद भी पीड़िता को अभी नहीं पता कि आखिर कब तक उन्हें अपनी बेटी के लिए न्याय का इंतजार करना पड़ेगा। वही एक मामला एक बार फिर सरकार की न्यायता पर सवाल उठता है कि आखिर कब तक दलित समुदाय को अपने हक़ की लड़ाई लड़नी पड़ेगी आखिर कब उन्हें न्याय मिलेगा।



