Buddha and Sarnath Connection: बौद्ध धर्म की पवित्रता जितनी गहरी है, उतनी ही पावन हैं वो जगहें जहां भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण पल बिताए. नेपाल के लुंबिनी में जन्म, बिहार के बोधगया में ज्ञान प्राप्ति और फिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी से महज 10 किलोमीटर दूर सारनाथ वही स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था.
मुगल काल में बौद्ध स्थलों पर कितने ही हमले हुए, कई जगहें खंडहर बन गईं लेकिन सारनाथ का वो पवित्र पीपल वृक्ष और उसकी छांव में गूंजा पहला धर्मोपदेश आज भी जीवित है. बोधगया के बाद बौद्ध अनुयायियों के लिए सारनाथ का स्थान सबसे ऊंचा है. हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं और दर्शन करते हैं और जाते वक्त पीपल का एक पत्ता जरूर साथ ले जाते हैं.
भगवान बुद्ध और सारनाथ का संबंध
दरअसल, बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे 7 साल की कठिन तपस्या के बाद भगवान बुद्ध को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई. उन्हें ज्ञान हुआ कि इच्छाएं ही दुख का कारण हैं और यही जीवन-मृत्यु के चक्र को चलाती हैं. भगवान बुदध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद तय किया कि वो अपने इस ज्ञान को आम जनमानस तक पहुंचायेंगे और फिर यहीं से उनकी परम ज्ञान की यात्रा शुरु हुई.
इसी क्रम में वो पहले वाराणसी पहुंचे और फिर सारनाथ पहुंचे. इतिहासकार बताते हैं कि भगवान बुद्ध जानते थे कि काशी ज्ञान की नगरी है. यहीं उन्हें उनके पहले पांच शिष्य मिलेंगे और हुआ भी कुछ ऐसा हीं..
सारनाथ में पहला उपदेश
सारनाथ का नाम भगवान शिव के एक रूप सारंगनाथ से पड़ा. भगवान बुद्ध जब यहां पहुंचे तो एक पीपल वृक्ष के नीचे उन्होंने अपने पांच शिष्यों, कौंडिन्य, अस्साजी, भद्दिया, वप्पा और महानाम को पहला उपदेश दिया. इसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है. यहीं भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को चार आर्य सत्य और आष्टांगिक मार्ग का ज्ञान दिया. इन 5 शिष्यों ने मिलकर बौद्ध संघ की नींव रखी और यहीं से बौद्ध धर्म का विश्वव्यापी प्रसार शुरू हुआ.
भगवान बुद्ध का प्रकृति प्रेम
सारनाथ में जिस पीपल वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को ज्ञान दिया, वहां आज के समय में धमेख स्तूप खड़ा है और वही पास में पीपल का पेड़ भी खड़ा है. इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था…43.6 मीटर ऊंचा और 28 मीटर व्यास वाला यह स्तूप ईंटों और मिट्टी से बना हुआ है. इसकी दीवारों पर फूल-पत्तियों की नक्काशी, ब्राह्मी लिपि में शिलालेख जैसी चीजें भगवान बुद्ध के प्रकृति प्रेम को दर्शाते हैं. सारनाथ में यह सबसे संरक्षित और महत्वपूर्ण स्थल है.
सारनाथ का पीपल पत्ता पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक
जब भी बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग सारनाथ की यात्रा पर जाते हैं तो पवित्र पीपल वृक्ष से एक पत्ता तोड़ कर अपने साथ जरूर ले जाते हैं. कहा जाता है कि सारनाथ की हर एक वस्तु बुद्धमय है. इसलिए पीपल की एक एक पत्ति भगवान बुद्ध की पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक होता है.
जिससे अद्भुत शांति और ऊर्जा को बनाये रखने के लिए लोग अपने घरों में रखते हैं. वहीं कहा जाता है कि जब भगवान बुद्ध की मृत्यु हुई तो उनकी अस्थियों को 8 राजाओं को बांट दिया गया, जो स्तूपों के अंदर भारत से नेपाल तक रखे गए.
बौद्ध धर्म की चार प्रमुख नगरी
आपको बता दें कि भारत में मौजूद 4 प्रमुख बौद्ध नगरी, लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर बौद्ध धर्म के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जहां हर एक बौद्ध के लिए जाना किसी बड़े सपने का पूरा होने जैसा होता है…सारनाथ में ही भगवान बुद्ध की अस्थियों का एक खंड भी रखा हुआ है, जिसे खुद सम्राट अशोक ने स्तूप का निर्माण कर रखवाया था. वहीं, सारनाथ संग्रहालय में अशोक चक्र को सुरक्षित रखा गया है.
सारनाथ के अन्य दर्शनीय स्थल
इसके अलावा सारनाथ आने वाले बौद्ध अनुयायियो को यहां पर अशोक का चतुर्मुख शेर स्तंभ, चौखंडी स्तूप, राजकीय संग्रहालय, जैन मंदिर, चीनी मंदिर मूलगंज कुटी विहार, श्री लंका मंदिर और नवीन बिहार जैसे प्रमुख बौद्ध मठ देखने को मिलते हैं. बोधगया का बोधि वृक्ष जहां ज्ञान का प्रतीक है, वहीं सारनाथ का पीपल उपदेश का प्रतीक है. दोनों ही भगवान बुद्ध के जीवन के अभिन्न अंग हैं. यहां आकर हर श्रद्धालु खुद को भगवान बुद्ध के करीब महसूस करता है.



