Daruma Doll: अक्सर आपने देखा होगा कि छोटी गुड़िया का इस्तेमाल तांत्रिक लोग काली शक्तियों को सिद्ध करने में लगाते हैं…कहीं सड़कों पर छोटी गुड़िया को पूज कर छोड़ दिया जाता है तो कई बार गुड़िया में सूई चुभाने की घटनाएं भी सामने आती हैं…लेकिन क्या आपने सोचा है कि एक छोटी गुड़िया जो दिखने में साधारण लगती हो, वह किसी देश की संस्कृति और धर्म को अपने अंदर समेट सकती है? हम बात कर रहे हैं जापान की मशहूर पारंपरिक डॉल, दारुमा डॉल की…जिसका बौद्ध धर्म में काफी ज्यादा महत्व है और यह जापान के लोग इसे काफी लकी मानते हैं.
सफलता का प्रतीक दारुमा डॉल – Daruma Doll
दरअसल, दारुमा डॉल एक गोल, खोखली औऱ बिना हाथ पैर वाली गुड़िया होती है. इसे लाल रंग में बनाया जाता है क्योंकि लाल रंग एशियाई संस्कृति में सौभाग्य, समृद्धि और सफलता का प्रतीक माना जाता है. लेकिन इस दारुमा डॉल की सबसे खास बात इसका गोल और भारी बेस होना है…जो इसे गिरने के बाद भी तुरंत खड़ा कर देता है. जापानी में इसे लेकर एक कहावत भी है कि सात बार गिरो, आठवीं बार उठो…लेकिन यह डॉल सिर्फ सौंदर्य या सजावट का हिस्सा नहीं है. इसमें मन, इच्छा और दृढ़ता की ताकत छिपी है. जापान में लोग जब भी कोई लक्ष्य तय करते हैं तो दारुमा डॉल की एक आंख को रंगते हैं. और जैसे ही वह लक्ष्य पूरा होता है इस डॉल की दूसरी आंख भी रंग दी जाती है.
दारुमा डॉल का भारत और बौद्ध धर्म से कनेक्शन
अब आप सोच रहे होंगे कि इसका भारत और बौद्ध धर्म से क्या कनेक्शन है. बात कुछ ऐसी है कि दारुमा डॉल का इतिहास बोधिधर्म से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने राजपरिवार को त्याग कर बौद्ध भिक्षु बनने का फैसला लिया था. वो कांचीपुरम के राजा स्कंद वर्मन के तीसरे पुत्र थे, जिन्होंने सबकुछ त्याग दिया था और मदुरै में एक बौद्ध भिक्षु बन गए थे.
उन्होंने 6वीं शताब्दी में चीन और फिर जापान की यात्रा की और महायान बौद्ध धर्म की, जेन शाखा का संदेश इन देशों में फैलाया. कहा जाता है कि बोधिधर्म ने दीवार की ओर मुंह करके, अपने हाथ-पैर मोड़कर लगातार 9 सालों तक ध्यान किया. यही कारण है कि दारुमा डॉल गोल और बिना हाथ-पैर के बनी है और यह सीधे बोधिधर्म की साधना का प्रतीक है.
जापान का शोरिनजान दारुमा-जी मंदिर
ध्यान देने वाली बात है कि जापान का शोरिनजान दारुमा-जी मंदिर, वहां दारुमा डॉल का सबसे बड़ा केंद्र है. 1697 में इसे गुनमा के ताकासाकी शहर में स्थापित किया गया था. इस मंदिर में हजारों दारुमा डॉल के विशाल ढेर लगे हुए हैं. यहां अक्सर लोग अपने किसी बड़े काम को शुरु करने से पहले जरुर आते हैं. वे नई गुड़ियां खरीदते हैं और पुरानी गुड़ियों को लौटाकर आभार व्यक्त करते हैं. अगस्त 2025 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान की यात्रा पर गए थे, तब उन्होंने भी इस मंदिर का दौरा किया था. वहां के मुख्य पुजारी रेव सेशी हिरोसे ने उन्हें दारुमा डॉल भेंट की थी.
दारुमा डॉल की खासियत – Features of Daruma Doll
आपको बता दें कि दारुमा डॉल की एक और खासियत यह है कि इसे आम तौर पर कागज या लकड़ी से ही बनाया जाता है. इस डॉल की ऊंचाई कुछ इंच से लेकर कई फीट तक हो सकती है. डॉल का यह नाम संस्कृत से लिया गया है और यही कारण है कि भारत से इसका जुड़ाव बताया जाता है. एक जापानी वेबसाइट (daruma.jp इसे बोलिएगा मत) के अनुसार, दारुमा डॉल दृढ़ता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है.
इसे लक्ष्य निर्धारण और उन्हें पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यानी यह सिर्फ गुड़िया नहीं बल्कि जीवन में हार न मानने और लगातार प्रयास करने का संदेश भी देती है. इसलिए दारुमा डॉल सिर्फ जापानी संस्कृति का प्रतीक नहीं बल्कि भारत और जापान के बीच बौद्ध धर्म का एक मजबूत सेतु बन चुकी है.



