Zen Buddhism: जब बौद्ध धर्म की स्थापना की बात होती है तो भारत में बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्द ने महायान परंपरा की नींव रखी थी, जो कि करीब 600 सालो से भी ज्यादा तक अकेले ही फली फूली, लेकिन जैसे जैसे भारत के बाहर बौद्द धर्म का प्रचार हुआ, वैसे वैसे उसकी पद्दति भी बदलती गई। आज बौद्ध धर्म में महायान, थेरवाद, वज्रयान, जैसे संप्रदाय है। सभी मानते तो बौद्ध धर्म को ही है लेकिन सबकी पद्दति अलग अलग है। इन तीन संप्रदाय के बारे में काफी चर्चा भी होती है, लेकिन एक और संप्रदाय है, जिसका उत्पत्ति भारत में नहीं बल्कि चीन में हुई है, जो आज चीन से निकल जापान और कोरिया तक पहुंच गया लेकिन भारत में इसकी चर्चा कम होती है।
ये तीनो देशों में अलग अलग नामो से प्रचलित है, इसलिए हो सकता है कि इस पद्दति को लेकर लोगों में कंफ्यूजन हो सकता है। इस पद्दति को कहते है जेन बौद्ध धर्म… अपने इस वीडियो में जेन बौद्ध धर्म के बारे में जानेंगे..कैसे आज ये चीन से निकल कर जापान और कोरिया तक पहुंच गया, साथ ही ये भारतीय बौद्ध धर्म से कितना अलग है।
जेन बौद्ध धर्म की शुरुआत
जेन शब्द असल में एक जापानी शब्द है, जेन शब्द की उत्तपत्ति संस्कृत भाषा के शब्द ध्यान से निकला है, और जापानी भाषा में जेन का मतलब होता है गहन चिंतन करना। जेन संप्रदाय का सूत्र असल में बौधिधर्मा द्वारा शुरु किया गया था, जो कि मुख्य रूप से समुराय योद्धाओ के लिए किया गया था। बोधिधर्म एक भारतीय बोद्ध भिक्षु थे, जिन्होंने चीन में ध्यान की शिक्षाओं की शुरुआत की थी। जिसे चान कहा गया, इसके बाद से वियतनाम में फैला और वियतनामी थियेन बन गया, उत्तर-पूर्व में कोरिया में सेओन बौद्ध धर्म बन गया, और पूर्व में जापान में जापानी ज़ेन बन गया। जेन स्रोत सैद्धांतिक अध्ययन और पारंपरिक प्रथाओं को कम महत्व देते हुए ये मानते है।
कि केवल ज़ाज़ेन यानि की ध्यान के माध्यम से सीधी समझ और एक गुरु से बात करके दीक्षा को पाया जा सकता है। जेन सम्प्रदाय में गुरु असल में समुराय लोगो को पेंटिंग, कैलिग्राफी, प्रकृति कविता, पौराणिक साहित्य, फूलों की सजावट और चाय समारोह के बारे में सिखा कर उन्हें प्रकति के करीब ले जाने की सीख दी जाती रही है। जिससे कारण तलवारबाज़ी और मार्शल आर्ट भी ज़ेन संप्रदाय के प्रभाव में डूबे हुए थे। जेन परंपरा को मानने वाले को कड़ा अनुशासन, निस्वार्थता और सहजता के साथ रहना अनिवार्य होता है।
जेन बौद्ध धर्म का विस्तार क्यों
हालांकि बाकि के संप्रदाय जहां एशिया के अलग अलग हिस्सो में बढ़े, और अपनी सहूलियत के हिसाब से महायान, थेलवाद और हीनवान की परंपरा को मानने लगे, उन्ही के बीच चीन , वियतनाम, कोरिया, जापान में जेन परंपरा का भी विकास हुआ। हालांकि जेन परंपरा में बौद्ध भिक्षुओं की अलग अलग शिक्षाओं से व्यक्तिगत अनुभव और ध्यान से माध्यन से बुद्धत्व को जगाने की कला पर जोर दिया जाता है, जो कि गुरु की देखरेख में होता है, इससे इसका छोटा लेकिन मजबूत संप्रदाय स्थापित होने लगा। खासकर 20वीं सदी में एलन वाट्स और डी.टी. सुजुकी जैसे लोगों ने जेन संप्रदाय के बारे में विशेष गहन शोध कर जेन ग्रंथो का अनुवाद किया था, इसे फॉलो किया था, और इसके विस्तार में अहम भूमिका निभाई था। जिससे ये पश्चिमी देशों में फैलने लगा।
कौन थे बौधिधर्मा- जेन संप्रदाय के संस्थापक
चीन में 520 ई. में चान संप्रदाय की स्थापना की गी, जिसे दक्षिण भारत के एक राजकुमार बौधिधर्मा ने की थी, जो कि चीन आने से पहले बौद्ध भिक्षु बन गए थे। कहा जाता है कि चीन में मार्शल आर्ट्स, कुंफू कला भी इनकी ही देन है। हालांकि ये किवंदती ही कहलाती है, लेकिन कथाओ के अनुसार बोदिधर्मा ने उत्तरी चीन की गुफाओ में 9 सालो तक खुली आंखो से ध्यान किया था। बोधिधर्म का संबंध तपस्वी अनुशासन, गंभीर ध्यान, योग, मानसिक शक्ति और शाओलिन मार्शल आर्ट स्कूल से है, उन्होंने बताया कि शास्त्रों को समझने के लिए शब्दों या अक्षरो की जरूरत नहीं है ये सीधे मन की स्थिति पर निर्भर करती है, आपके शास्त्र, आपके स्वाभाव को बता देंगे, जब आपने बारे में किसी को सही तरीके से ज्ञान होगा तो वो बुद्धत्व को प्राप्त कर लेगा।
चीन के लोग बोधिधर्मा को दारूमा के नाम से बुलाते है, नये साल के मौके पर दारूमा गुड़िया का इस्तेमाल मन्नत पूरी करने के लिए किया जाता है, जिसमें गुड़िया की बड़ी बड़ी आँखो में से एक को पेंट कर दिया जाता है जो कि बुरी ताकतो और बुरी शक्तियों को दूर रखते है, और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो दूसरे आँखो को पेंट कर दिया जाता है। कुल मिलाकर हम ये कह सकते है बौदिध धर्म भले ही शांति और अहिंसा का ज्ञान देता है लेकिन जेन बौद्ध धर्म में शास्त्रों के माध्यम से गुरु की दीक्षा लेकर भी बुद्धत्व को प्राप्त किया जा सकता है।



