Top 5 Dalit news: देश का संविधान लागू हुए आज पूरे 76 साल हो चुके है, पूरा देश भारत का गणतंत्र लागू होने की खुशी मना रहा है लेकिन क्या वाकई में जिस संविधान को बाबा साहेब ने बनाया था, आज उस संविधान के हिसाब से ही देश चल रहा है। जहां उन्होंने दलितो को सम्मान से जीने का अधिकारा दिया था, वहीं आज भी दलित समाज में खड़ा होने के लिए भी संघर्ष कर रहे है। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितों के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में जानेंगे, जो इस वक्त सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियों में है।
भीम आर्मी चीफ ने आगरा में भरी हुंकार
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला भीम आर्मी चीफ और आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद को लेकर है। आजाद ने दलितों को एकजुट करने के लिए 25 जनवरी को आगरा के रामलीला मैदान में विशाल जनसभा को संबोधित किया। आजाद ने दलितों को उनकी ताकत पहचानने और दलितों के खिलाफ खड़े होने वाले को तीखा संदेख दिया है। दलित छात्रों के उत्पीड़न को रोकने के लिए यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सवर्ण समाज के विरोध को लेकर आजाद ने हुंकार भरते हुए कहा कि चंद मुट्ठीभर लोगों के सामने अगर सरकार झुकती है तो फिर 85 प्रतिशत दलित भी बता देंगे कि उनकी ताकत क्या है।
सच्चाई तो ये है कि जो विरोध कर रहे है वो चाहते है कि दलित छात्रों से शिक्षा का अधिकार ही छीन लिया जाए, लेकिन अब दलित एकलव्य नहीं बनेंगे, और न किसी को द्रोणाचार्य बनने देंगे। जो उनका अंगूठा काट सकें। आजाद ने लगे हाथों सरकार के उस रवैए के लिए भी घेरा जब उन लोगों ने शंकराचार्य और उनके समर्थकों के साथ दुर्व्यवहार किया था। आजाद ने कहा कि सरकार बहुत धर्म की बात करती है लेकिन खुद के शंकराचार्य के साथ ज्यादती की गई लेकिन सरकार मूक थी। क्योंकि सरकार को केवल वोट बैंक से मतलब है।
कर्नाटक में दलित राजनीति में बड़ा फेरबदल
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला कर्नाटक से है, जहां की दलित राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है, जिससे अब शायद दलित समाज भी कन्फ्यूज हो जाए कि किसे चुने। दरअसल पिछले कुछ महीनों से लगातार दलित समाज सीएम सिद्धारमैया को पद से हटाकर दलित मुख्यमंत्री की मांग कर रहे थे, क्योंकि उनका आरोप था कि मौजूदा सरकार दलितों के लिए कुछ नहीं कर रही है, लेकिन सीएम ने दलितों और पिछड़े समाज के लिए बड़ा कदम उठाते हुए बंगलूरू में 22 दलित और ओबीसी मठों को 255 करोड़ रुपये की जमीन देने पर मजूरी दे दी है। लेकिन हैरानी की बात है कि अब सरकारी महकमें के लोग सरकार के इस कदम का विरोध कर रहे है।
अधिकारियों का कहना है कि दान की गई जमीन गोमाला जमीन है और शहरी क्षेत्र के अंतर्गत आती है, इसीलिए ये जमीनी निजी कामों के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते है। इसलिए वो कानूनी शिकंजे में फंस सकते है। आपको बता दे कि पिछले साल को शुरुआत में ही दलित और पिछड़े समाज के लिए संतों ने अपने सामाजिक कार्यों और संस्थानों को चलाने के लिए सरकार से जमीन मांगी थी। अब देखना ये होगा कि दलितों को लुभाने के लिए उठाया गया कांग्रेस सरकार का ये कदम कहीं उनपर ही तो भारी नहीं पड़ने वाला है, या जमीन देने की बात केवल विरोध को दबाने के लिए किया गया दिखावा मात्र ही था।
सहारनपुर में दलितों ने उठाया बड़ा कदम
3, दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से है, जहां एक हिंदूवादी परंपरा के खिलाफ दलितों ने बड़ा कदम उठाया है। जो कि ब्राह्मणवादी विचारधारा पर गहरा प्रहार माना जा रहा है। दरअसल सहारनपुर के तीतरो में पड़ने वाले ठल्लों गांव में दलित समाज से आने वाले एक शख्स ने अपनी मां की मृत्यु के बाद ब्राह्मणों की बनाई परंपरा के अनुसार मृत्युभोज करने से इंकार कर दिया है। मृत्युभोज के खिलाफ गांव के पूर्व प्रधान देशराज सिंह ने भी समर्थन दिया है, उन्होंने कहा कि दलित समाज वैसे ही आर्थिक परेशानी से जुझ रहा है, वैसे में मृत्यु भोज के कारण उनपर दोहरा दवाब पड़ता है।
जिससे उनकी हालात और चरमरा जाती है, इसलिए गांव के मांगेराम ने सबसे पहले पगड़ी रस्म के दौरान मृत्यु भोज करने से इंकार कर दिया है। जिसके समर्थन में गांव के बाकी के दलित समाज भी आ गये है। गांव के रविदास मंदिर में पंचायत की गई और सबने इस पर मंजूरी भी दे दी है। राज्य का ये शायद पहला गांव होगा, जहां दलितों ने आर्थिक तौर पर कमजोरी के कारण इतना बड़ा फैसला लिया है, हालांकि इस फैसले की काफी सराहना की जा रही है, लेकिन देखना ये होगा कि ब्राह्मणवादी विचारों पर हुआ ये प्रहार, कहां तक जाने वाला है।
हिमाचल प्रदेश में बढ़ रहे है जातिगत भेदभाव के मामले
4, दलितों से जुड़ा अगला मामला हिमाचल प्रदेश से है, जहां एक दलित नेता को सरेआम गालियां दी जा रही है, उन्हें धमकी दी जा रही है लेकिन पुलिस के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। जी हां, सोशल मीडिया पर एक पोस्ट काफी वायरल हो रहा है, इस पोस्ट में एक जातिवादी दबंग हिमाचल प्रदेश के दलित नेता रवि कुमार को सरेआम शोसल मीडिया पर धमकी देते हुए – चमारो सुधार जाओं जैसे आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है। जहां कानून के हिसाब से जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करना भी अपराध है, वहां मनुवादी मानसिकता वालों की हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वो एक नेता को भी सरेआम गालियां दे रहे है।
लेकिन हिमाचल प्रदेश की पुलिस की आंखो पर भी जातिवाद का चश्मा चढ़ा हुआ है, तभी भी पिछले कुछ महीनों में कितने मामले ऐसे आये जिसमें दलितों के साथ उत्पीड़न किया गया, लेकिन पुलिस भी यहां के जातिवादी लोगो की तरह इसे ‘देव संस्कृति’ और परंपरा का हिस्सा मानकर पल्ला झाड़ने से बाज नहीं आ रही है, जो अब राज्य में दलितो के लिए न्याय व्यवस्था पर ही सवालियां निशान खड़े कर रही है। वैसे आपको क्या लगता है हिमाचल प्रदेश में बढ़ते जातिगत भेदभाव की क्या वजह है, हमे कमेंट करक जरूर बतायें।
मुरैना में दलित सरपंच को उठा ले गए दबंग
5, दलितों से जुड़ा अगला मामला मध्य प्रदेश के मुरैना से है, जहां एक दलित सरपंच को अपनी आबाज बुलंद करने के लिए बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा, उन्हें न केवल उनके घर से अगवा किया गया बल्कि गांव के बाहर पेड़ से बांध कर जातिसूचक गालियां दी गई और बुरी तरह से मारपीट की गई। इस पूरी घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर जारी किया गया है। वहीं मध्य प्रदेश में भीम आर्मी के पूर्व प्रदेश प्रभारी सुनील अस्तेय ने पीड़ित परिवार के लिए आवाज उठाते हुए एक्स पर एक पोस्ट किया है। ये घटना मुरैना ज़िले के केलारस गांव की है, जहां दलित सरपंच के साथ ही इस तरह की अमानवीय घटना को अंजाम दिया गया।
अगवा करने के बाद जब परिवार वालो ने पुलिस से इसकी शिकायत दर्ज कराई तो दबंगो सरपंच को पीटने के बाद उनके घर में अधमरी हालात में छोड़ कर फरार हो गए। हैरानी की बात है कि इतने हंगामे के बाद भी पुलिस ने अभी तक किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की है। सुनील अस्तेय ने राज्य के सीएम मोहन यादव को भी घेरते हुए कहा कि जब राज्य में दलित जन प्रतिनिधि की सुरक्षित नहीं है तो आम दलित जनता का क्या हाल है, उसका अंदाजा लगा सकते है। प्रशासन और सरकार की दलितो के प्रति उदासीनता जातिवादी आतंकियों की हिम्मत को और बढ़ावा देते है। जरूरी है कि अब सरकार इस पर कोई कड़ा कदम उठायें।



