Who Were the Shudras: बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर ने अपने जीवन में सबसे ज्यादा महत्व शिक्षा को दिया था। उन्होंने न केवल 32 डिग्रियां हासिल की थी, बल्कि समाज सुधार की दिशा में कई ठोस कदम भी उठाए थे। उन्होंने देश की तरक्की के साथ साथ देश को कैसे आगे बढ़ाना है उसपर भी अपने विचार व्यक्त किए थे, अपने विचारों को दुनिया तक पहुंचाने का सबसे बेहतर तरीका उन्होंने किताबों को माना, और कई अहम किताबे भी लिखी, लेकिन इसमें सबसे ज्यादा विवादित रही उनकी किताब who were the shudras?
बाबा साहब की किताब शूद्र कौन
भारत के पहले समाज सुधारक और दलितों और महिलाओं की शिक्षा पर जोर देने वाले ज्योतिबा राव फुले को समर्पित ये किताब साल 1946 में प्रकाशित हुई थी, जो असल में बाबा साहब के उस गहन शोध का सार है जिसमें बाबा साहब ने शूद्रों की उत्पत्ति और उनके लिए ब्राह्मणों द्वारा उठाए विकृत कदम और उसे मानने से इंकार करने वाले कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को उठाया है। जिसमें सबसे ज्यादा उन्होंने मनुस्मृति की आलोचना की है। मनुस्मृति के प्रति उनकी राय क्या थी वो उन्होंने 1927 में ही बता दिया जब उन्होंने मनुस्मृति की प्रतियां जलाई थीं अपने इस लेख में हम बाबा साहब की किताब शूद्र कौन थे, में उन्होंने मनुस्मृति ने लिखे कुछ बातों को सिरे से खारिज करते हुए मानने से साफ इनकार किया था।
क्षत्रियों का बहिष्कार भी समाज में सबने स्वीकार
जब आप बाबा साहब की किताब को पढ़ेंगे तो पायेंगे कि बाबा साहब ने खुद इस बात का खंडन किया है कि शूद्र कभी आर्यो के आने से पहले भारत की धरती पर थे ही नहीं। आर्यो के साथ भी केवल तीन वर्ण व्यवस्था ही आई थी, जिसमें एक ब्राह्मण थे, दूसरे क्षत्रिय थे और तीसरे वैश्य थे। लेकिन जो शूद्र बने, वो असल में क्षत्रिय वंश के थे, जिनका बहिष्कार ब्राह्मणों ने कर दिया था, और उन्हें सामाजिक रूप से अलग थलग कर दिया गया। तब क्षत्रियों से ज्यादा ब्राह्मणों का मूल्य था, नहीं तो सामाजिक बहिष्कार सहना पड़ता, इसलिए उन क्षत्रियों का बहिष्कार भी समाज में सबने स्वीकार किया और उन्हें शूद्र कहा गया। धर्म ग्रंथो में भी शूद्रो को लेकर अध्याय जोड़ दिया गया।
ब्राह्मणों की कुंठित विचारो के कारण
बाबा साहब ने अपनी किताब में कहा कि शूद्र असल में वो क्षत्रिय है जिन्होंने ब्राह्मणों की दकियानूसी सोच और दमनकारी नीति को मानने से इंकार कर दिया था, नतीजा ब्राह्मणों ने उनके लिए कोई भी धार्मिक कार्य करने, उनका उपनयन संस्कार करने पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्हें मजबूरी में सभ्य समाज से अलग थलग होकर बाहरी हिस्से में जाकर रहना पड़ा। ब्राह्मणों की कुंठित विचारो के कारण उनसे जमीन का मालिकाना हक छीन लिया गया। उन्हें इस स्थिति में पहुंचा दिया गया कि वो दास बनने के लिए मजबूर हो गये। उनसे सेवा तो ली जाती लेकिन उन्हें अछूत करार दिया गया। ब्राह्मणों ने अपनी कुंठा शांत करने के लिए उन्हें अपने अत्याचार का जरिया बना लिया। उनके शोषण को न्याय संगत करार दे दिया गया।
मनुस्मृति को लेकर बाबा साहब के विचार
बाबा साहब ने माना था मनुस्मृति कोई धर्मग्रंथ नहीं है, बल्कि को समाज को बांटने वाला ग्रंथ है। बाबा साहब की नजरो में मनुस्मृति दलितों और महिलाओं के लिए गुलामी करने की सीख देती है, जो कि पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और अमानवीय है। बाबा साहब ने मनुस्मृति के कई बातों का जिक्र किया जिसका खंडन उन्होंने किया था- जिसमें सबसे पहला था- जन्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था… अगर आप मनुस्मृति को छोड़ कर वेदों के बारे में जानेंगे तो पायेंगे कि वेदों में भी जन्म के आधार पर जाति व्यवस्था कहीं बताई ही नहीं गई, वेदों में कहा गया कि व्यक्ति की पहचान उसके काम के आधार पर तय होनी चाहिए न कि जन्म के आधार पर.. लेकिन मनुस्मृति में इसे सही करार दिया गया, जिसे बाबा साहब ने हिंदू धर्म के लिए सबसे बड़े कोढ़ की तरह माना था।
स्वामी के दास बने रहना ही शूद्रो की नियती
वहीं शूद्रों और महिलाओ को शिक्षित होने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया। शूद्रो को हमेशा दास बन कर अपने मालिक की छत्रछाया में ईमानदारी से जीवन जीने को कहा है औऱ उसी मालिक के मर जाने की बात की है, मतलब जन्म से लेकर मरने तक अपने स्वामी के दास बने रहना ही शूद्रो की नियती है। वो न तो खुली हवा में सांस ले सकते है, न खुद से फैसला कर सकते है, न वो कोई वो धर्म ग्रंथ पढ़ सकते है.. अगर ब्राह्मणों के बनाये नियमों को तोड़ने का किसी शूद्र ने प्रयास भी किया तो उनके लिए कठोर और अमानवीय सजा तय की गई, जिसमें कान में गर्म शीशा डलवा देना, उनकी लिंग कटवा देना, आंखो निकलवा देना। ताकि दुबारा कोई उनके खिलाफ जाने की हिम्मत न करें।
महिलाओं की दशा भी कोई शूद्रों से बेहतर नहीं
न तो वो संपत्ति अर्जित कर सकते थे, न उन्हें जरूरत से ज्यादा पैसे रखने की अनुमति होती थी.. जो कि पूरी तरह से अन्नायपूर्ण था, वहीं महिलाओं की दशा भी कोई शूद्रों से बेहतर नहीं बताई गई। सदैव पुरुषों के आधीन रहने की सीख दी गई, और आधीन रह कर केवल घर के पुरुषों की सेवा करने को ही स्वर्ग का रास्ता बताया गया है। इस सोच को फैलाई गई कि आजाद सोच की महिलाओ को समाज कुल्टा की तरह देखता है, जिसे किसी पुरुष का सानिध्य नहीं मिलेगा, और ऐसी स्त्री नरक की भागी होगी।
महिलाओं और पुरुषों की बौद्धिक और क्षमता
लेकिन बाबा साहब ने सीधे इन विचारो का खंडन करते हुए कहा कि ये केवल महिलाओ को दासी बनाये रखने की एक चाल मात्र थी, उनकी आजादी को छीन कर उन्हें आगे बढ़ने, तरक्की करने से रोकने के लिए… किसी ये तो कई ग्रंथों में लिखा है कि बाहुबल में भले ही पुरुष महिला से बेहतर हो, लेकिन जब उनकी काबिलियत, सहनशीलता, मैनेजमेंट की बात होती है, तो महिलाएं पुरुषों के कई गुणा बेहतर है। वो घर चलाने के साथ साथ देश चला सकती है, जो कि अकेले एक पुरुष के बस में नहीं है। इसलिए महिलाओं और पुरुषों की बौद्धिक और क्षमता की लड़ाई में विजय हमेशा महिलाओ की ही होती है.. और यहीं डर के कारण मनुस्मृति ने महिलाओं को हीन और कमजोर बनाने की मानसिकता को बढ़ावा दिया था।
बाबा साहब की किताब ने शूद्रों को सही मायने में वो स्थान दिला दिया था जिसे ब्राह्मणी समाज कभी स्वीकार ही नहीं कर सकता था, और यहीं कारण था कि इस पर इतना विवाद हुआ था। वैसे आपको क्या लगता है, बाबा साहब ने जो भी मुद्दे इस किताब में उठाये और जिनका उन्होंने खंडन किया.. वो किस हद तक ब्राह्मणवादी सोच पर प्रहार कर पायें है।



