भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है, जहां हर किसी को अपनी इच्छा से अपने धर्म को मानने और उसके अनुसार चलने की आजादी है। भारत का संविधान अनुच्छेद 25 (Article 25) में ये साफ बताया गया है हर व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म मानने, अभ्यास करने और प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन BNS 2023 में धारा 106 के जरिए यह स्पष्ट किया गया कि छल, दबाव या प्रलोभन देकर किसी का धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो उसे कानूनी शिकंजे में फंसना पड़ेगा।
हालांकि तमाम कानूनों के बाद भी धर्म परिवर्तन जारी है… इसमें सबसे ज्यादा शोर इसाई धर्म में परिवर्तन को लेकर होता है..यहां तक कि कोर्ट भी ये कहती है कि अगर किसी ने ईसाई धर्म अपना लिया तो उसे दूसरे धर्म में मिलने वाले फायदे नहीं दिये जायेंगे, ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर कोई इस्लाम अपना लेता है तो उनका क्या होता है… दूसरा सवाल ये है कि भारत के दलितों को सबसे ज्यादा धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया जाता है, ऐसे में अगर दलित इस्लाम अपनाते है तो क्या वो वाकई में इस्लाम के कहलाते है… भारत में असल में दलित मुस्लिम है कौन… और क्या हिंदू धर्म की ही तरह उन्हें इस्लाम में भी जातिगत भेदभाव झेलना पड़ता है…जानेंगे इस वीडियो में डिटेल में..
कौन है मुस्लिम दलित
जिस तरह से हिंदू धर्म में एससी एसटी वर्ग के लोगों बहुजन कहा जाता है, वैसे ही इस्लाम धर्म में दलितों के लिए “पसमांदा शब्दों का प्रयोग पिछड़े, दलित और आदिवासी मुसलमानों के लिए किया जाता है। मुगल काल में जबरन गैर मुसलमानों को मुसलमान बनाया गया था, लेकिन हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था के कारण उत्पीड़ित लोगो ने तेजी से धर्म परिवर्तन किया जिसमें दलित बहुजन समाज के लोग ही सबसे ज्यादा रहे है। इसमें दलित इस्लाम धर्म में परिवर्तित हुए, लेकिन इस्लाम में आकर भी केवल उनका धर्म बगदा है, स्थिति नहीं..क्योंकि कागजो पर केवल मुसमान लिखने के उनके साथ होने वाले भेदभाव में कोई कमी नहीं आई.. हां, पहले ये हिंदू दलित थे और अब मुस्लिम दलित बन गए है।
बाबा साहब ने क्यों इस्लाम से दूरी बनाई
हालांकि बाबा साहब जैसे महान समाज सुधारक ने भी ये कहा था कि हिंदू धर्म से जातिगत भेदभाव कभी खत्म नहीं होगा.. इतना ही नहीं बाबा साहब ने बौ द्ध धर्म अपनाने से पहले जब धर्मों का अध्ययन शुरु किया था तो उन्होंने पहले यहीं समझा था कि इस्लाम धर्म में जातिगत भेदभाव नहीं होता, क्योंकि उनके ईश्वर अलग अलग नहीं बंटे है, सबको साधना करने की इजाजत है, लेकिन जब उन्होंने इस्लाम का अध्ययन किया तो पाया कि मुसलमानों का भाई चारा केवल मुसलमानों के लिए है न की अन्य समाज के लिए”.. यानि की जो जन्म से मुसलमान है. उन्हें ही पूरी तरह से स्वीकार किया जाता है, लेकिन अगर कोई परिवर्तित होकर आता है तो उन्हें पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
पहचान न बदले इसलिए टाइटल नहीं बदले
भारत में आपको ऐसे कई इस्लाम कम्युनिटी मिल जायेंगे, जिन्होंने धर्म बदला, नाम बदला लेकिन अपना टाईटल नहीं बदला..हालांकि कुछ दलितो को लगता है कि धर्म बदलने से शायद उन्हें जातिगत भेदभाव न झेलना पड़े, लेकिन क्या वाकई में ऐसा है, आईये जानते है। हिंदू धर्म में जहां दलितो की बस्ती अलग हुआ करती है, इस्लाम धर्म में आये दलितों को ये नहीं झेलना पड़ता है। लेकिन जो दलित इस्लाम अपनाते है उन्हें कई तरह से कानूनी कार्यवाई से होकर गुजरना पड़ता है। इसके लिए नाम बदलने से लेकर उनके बच्चों के एडमिशन तक में कानूनी प्रक्रिया शामिल है। जिसके लिए इस्लामिक कानून उनकी कोई मदद नहीं करता है बल्कि उन्हें खुद इसके लिए कोर्ट जाकर लड़ना पड़ता है। आकड़ो की माने तो मौजूदा समय में भारत में मुस्लिमों को जो आबादी अभी मौजूद है उनमें से 75 प्रतिशत असल में दलित समूह से ही आते है।
मुसलमान अशरफ या सैयद वर्ग
इस्लाम में इन्हें गैर अशरफ, अजलाफ, या अर्चल, जिसका मतलब नीच होता है, के रूप में पहचाना जाता है। ये मुसलमान सामाजिक रूप से खुद को उंची जाति का समझने वाले मुसलमान अशरफ या सैयद वर्ग के होते है। आप इस्लाम धर्म में दलितो के साथ होने वाले भेदभाव का अंदाजा केवल इसी बात से लगा सकते है कि उन्हें अशरफों और सैयदो की कब्रिस्तान से अलग जगह दी जाती है। दुख की बात तो ये है कि सरकार की तरफ से भी इन दलितो को एससी का दर्जा नहीं दिया जाता है, जिसके कारण अनुसूचित जाति में मिलने वाले आरक्षण का लाभ तक नहीं मिलता है।
कुल मिलाकर हम ये कह सकते है कि इस्लाम अपनाने के बाद भले ही उन्हें साधना करने का अधिकार मिले… समाज का हिस्सा माना जाता हो, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल अलग है। दलित हमेशा दलित ही बन कर रह गए है.. धर्म बदलने से भी जाति नही बदली… आर्थिक रूप से अभी भी कमजोर है.. और शायद आने वाले समय में भी उनकी हालात और बद से बदतर हो सकती है। आपको क्या लगता है कि क्या धर्म बदलने के बाद स्थिति बदल सकती है, दलित मुसलमान की स्थिति भी हिंदू दलितों से ज्यादा सुधरी नहीं है। आपकी क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।



