इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, शादी या धर्म बदलने से नहीं बदलती जाति

Allahabad High Court
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Allahabad High Court: ये तो सूना था कि शादी के बाद लड़कियों का सरनेम (surname) बदल जाता है, पिता के सरनेम के बजाए पति का उपमान जोड़ा जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि लड़कियों की जाति (Caste) भी बदल जाती है। लोग खूद को बचाने के लिए क्या- क्या तर्क देते है। जैसे लोग अपनी सुविधा के अनुसार अपने विचार बदल लेते है ठीक उसी तरह … इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक अहम फैसला लेते हुए भी अपने विचार साफ कर दिए है कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से तय होती है और सिर्फ धर्म (Religion) बदल लेने या शादी कर लेने से वह इसे नहीं बदल सकती है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई महिला शादी कर ले, तो इससे उसकी जाति नहीं बदल जाती।

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क्या था पूरा मामला?

यह मामला दिनेश (Dinesh) और आठ अन्य लोगों की ओर से दायर आपराधिक अपील से जुड़ा था। इन लोगों ने अलीगढ़ (Aligarh) की विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) और एससी-एसटी एक्ट (SC-ST Act) के तहत समन जारी किया गया था।

एक महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि कुछ लोगों ने उसके साथ मारपीट की और झगड़े के दौरान उसके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। इस घटना में महिला समेत दो अन्य लोग घायल भी हुए थे। मामले की सुनवाई करते हुए अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम) (SC/ST Act) ने आरोपियों के खिलाफ समन जारी किया था। आरोपियों ने इसी आदेश को हाईकोर्ट (Allahabad High Court) में चुनौती दी।

आरोपियों की दलील क्या थी?

आरोपियों का कहना था कि शिकायतकर्ता महिला जन्म से अनुसूचित जाति की है और मूल रूप से पश्चिम बंगाल (west Bengal) की रहने वाली है। लेकिन उसने जाट समुदाय (Jat community) के एक व्यक्ति से शादी कर ली है, इसलिए अब उसकी जाति बदल गई है। ऐसे में एससी-एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत मामला बनता ही नहीं है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अनिल कुमार (Justice Anil Kumar) ने 10 फरवरी को दिए आदेश में साफ कहा कि कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल सकता है, लेकिन धर्म परिवर्तन के बाद भी उसकी जाति वही रहती है और शादी से भी किसी महिला की जाति नहीं बदलती। मीडिया द्वारा मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि कोर्ट ने कहा कि आरोपियों की यह दलील कानूनी तौर पर टिकाऊ नहीं है, इसलिए अपील खारिज की जाती है।

“क्रॉस केस” वाली दलील भी नहीं मानी

राज्य सरकार के वकील ने यह भी बताया कि शिकायत में बताई गई घटना और एफआईआर (FIR) में दर्ज घटना एक ही तारीख की है। यानी दोनों घटनाएं साथ हुई थीं। ऐसे में यह कहना कि शिकायत बदले की भावना से दर्ज की गई है, सही नहीं है।

हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने माना कि ट्रायल कोर्ट (trial court) ने मेडिकल रिपोर्ट, शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों को ध्यान में रखते हुए ही आरोपियों को समन जारी किया था। सिर्फ इस आधार पर कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ केस दर्ज कराया है, किसी शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता।

क्या है इस फैसले का मतलब?

इस फैसले से यह साफ हो गया है कि जाति (Caste) जन्म से तय होती है, धर्म (Religion) बदलने से जाति नहीं बदलती और शादी के बाद भी महिला की जाति वही रहती है। हाईकोर्ट (High Court) का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा सकता है।

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