UP Elections: आगामी चुनाव को लेकर दलित वोट बैंक पर है सबकी नजर, क्या इस बार मायावती कर पाएंगी कमबैक

Mayawati, UP Election
Source: Google

UP Elections: उत्तर प्रदेश की सियासत में अब एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। जहां अब तक समाजवादी पार्टी अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए दलितों को साधने का दावा करती थी, वहीं अब भाजपा सरकार ने भी अपनी रणनीति पूरी तरह ‘दलिट पॉलिटिक्स’ पर केंद्रित कर दी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा अब पूरी तरह दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने का मन बना चुकी है? बसपा के कमजोर पड़ते आधार के बीच, भाजपा और सपा दोनों ही इस बड़े वोट बैंक पर अपना एकाधिकार जमाने की होड़ में हैं।

और पढ़े: Top 5 Dalit news: मैनपुरी में दलित किशोरी के साथ सामूहिक दुष्कर्म, पुलिस ने दर्ज किया मामला

सपा और बसपा के बीच गठबंधन की संभावनाएं

प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज होती दिख रही है। खासकर दलित वोट बैंक को लेकर सभी दल सक्रिय हो गए हैं। हाल के बयानों और राजनीतिक गतिविधियों से यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या एक बार फिर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन की संभावनाएं बन रही हैं।

सपा और बसपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में ढाई दशक पुराने ‘गेस्ट हाउस कांड’ की कड़वाहट को भुलाकर हाथ मिलाया था, लेकिन चुनाव नतीजों के तुरंत बाद यह गठबंधन टूट गया। अब करीब 6 साल बाद राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर सुगबुगाहट है कि क्या ये दोनों दल अपनी पुरानी नजदीकियों को फिर से तलाश रहे हैं? हालांकि, मायावती के हालिया रुख ने इन चर्चाओं पर फिलहाल विराम लगा रखा है।

और पढ़े: BNS Section 311: घातक हथियारों के साथ लूट या डकैती, जानें क्या हैं सज़ा के प्रावधान

दलित वोट पर सभी की नजर

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद यह साफ दिखा कि दलित वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभा सकता है। ऐसे में सपा, बसपा और भाजपा तीनों दल इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की रणनीति बना रहे हैं। भाजपा की रणनीति में दलित महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर बड़े कार्यक्रम शामिल हैं। पार्टी का फोकस सिर्फ भीमराव आंबेडकर तक सीमित नहीं है, बल्कि कांशीराम, संत रविदास, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, झलकारी बाई, बिरसा मुंडा जैसे कई प्रतीकों को भी शामिल किया गया है।

सपा की ‘पीडीए’ रणनीति

सपा ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) फॉर्मूले के जरिए सामाजिक गठजोड़ मजबूत करने की कोशिश शुरू कर दी है। इसी क्रम में बसपा के पूर्व वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में शामिल होना भी राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। अखिलेश यादव ने कहा कि सपा और बसपा के रिश्ते मजबूत हो रहे हैं और भविष्य में और गहरे हो सकते हैं। उन्होंने 2019 गठबंधन का जिक्र करते हुए उम्मीद जताई कि दोनों दल मिलकर संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं।

मायावती की अलग तैयारी

दूसरी तरफ मायावती भी 2027 चुनाव को लेकर सक्रिय हो गई हैं। बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती पर बड़े आयोजनों की तैयारी की जा रही है। हालांकि, अभी तक मायावती ने सपा के साथ गठबंधन को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है और उनका रुख सावधानी भरा माना जा रहा है।

भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग

भाजपा भी दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए मिशन मोड में काम कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को दलित समाज तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

गठबंधन की संभावना कितनी?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बताया जा रहा है कि अभी सपा-बसपा गठबंधन को लेकर कोई ठोस संकेत नहीं है। अखिलेश यादव के बयान को ‘सॉफ्ट पॉलिटिकल मैसेज’ के तौर पर देखा जा रहा है, जबकि मायावती की रणनीति फिलहाल स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनाए रखने की लगती है। हालांकि, यह भी सच है कि 2027 चुनाव से पहले यदि राजनीतिक समीकरण बदलते हैं और भाजपा को चुनौती देने की जरूरत महसूस होती है, तो सपा-बसपा के बीच फिर से गठबंधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अभी गठबंधन तय नहीं है, लेकिन बयान और राजनीतिक गतिविधियां यह जरूर दिखाती हैं कि दलित वोट की राजनीति 2027 चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर बनने जा रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *