JNU news: आज भी समाज की सोच में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आरक्षण की क्या जरूरत है? अब पिछड़ा वर्ग इतना पिछड़ा नहीं रहा कि उनको आरक्षण की जरूरत हो। सबको अपनी काबिलियत के दम पर ही आगे बढ़ना चाहिए। यहां तक कि जिस भेदभाव की बात की जाती है, उसे नकारते हुए कहा जाता है कि ‘अब तो हम साथ बैठकर खाना खाते हैं, पिछड़ा वर्ग आज भी सिर्फ विक्टिम कार्ड खेल रहा है।’
लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल जरूर उठता है क्या केवल साथ बैठकर भोजन कर लेने भर से सदियों की जड़ें जमाए बैठा जातिगत भेदभाव और मानसिक दीवारें खत्म हो गई हैं? जेएनयू कुलपति (JNU Vice Chancellor) का हालिया बयान इसी बहस को फिर से जिंदा करता है कि क्या समानता केवल कागजों पर है या जमीनी हकीकत में भी? तो चलिए इस लेख के जरिए जानते है आखिर वो क्या बयान है जिसने इस बहस में आग में घी डालने वाला काम किया है।
जानें क्या है पूरा मामला?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडितके एक बयान को लेकर कैंपस में विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने हाल ही में एक पॉडकास्ट में कहा कि दलित और ब्लैक समुदाय (Black community) “हमेशा खुद को पीड़ित बताकर या विक्टिम कार्ड खेलकर आगे नहीं बढ़ सकते।” उनके इस बयान के बाद छात्र संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया और इस्तीफे की मांग उठने लगी।
यह बयान 16 फरवरी को जारी एक पॉडकास्ट के दौरान आया, जिसमें कुलपति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के इक्विटी यानी एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियमों पर चर्चा कर रही थीं। ये नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए हैं। हालांकि कुछ सवर्ण समूहों के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नियमों पर रोक लगा दी है।
पॉडकास्ट में कुलपति ने कहा कि UGC के नियम “अनावश्यक और तर्कहीन” हैं। उन्होंने यह भी कहा कि “किसी को शैतान बनाकर या हमेशा खुद को पीड़ित बताकर आगे बढ़ना आसान नहीं है, यह एक अस्थायी नशे की तरह है।” बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और विवाद बढ़ गया।
कुलपति की सफाई
विवाद बढ़ने पर कुलपति ने कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। उनका कहना है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि दलित समुदाय हमेशा विक्टिम कार्ड खेलता है, बल्कि कुछ लोग ‘वोक’ विचारधारा के तहत ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नियम बनाते समय पूरी सावधानी नहीं बरती गई और इस मुद्दे पर अनावश्यक विवाद खड़ा किया गया है। साथ ही उन्होंने कहा, “मैं खुद बहुजन समाज से आती हूं।”
छात्र संघ का विरोध
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) ने कुलपति के बयान को “स्पष्ट रूप से जातिवादी” बताया है और उनके इस्तीफे की मांग की है। छात्र संघ ने शनिवार को देशभर में विरोध प्रदर्शन करने की अपील भी की है। उनका कहना है कि ऐसे बयान विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव और असमानता को बढ़ावा देते हैं। छात्र संगठनों ने कुलपति के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े होने पर भी सवाल उठाए। दरअसल पॉडकास्ट में कुलपति ने कहा था कि उन्हें RSS से जुड़ाव पर गर्व है और इससे उन्हें विविध विचारों को समझने का दृष्टिकोण मिला।
कैंपस में बढ़ा तनाव
इस पूरे विवाद के बाद JNU कैंपस में माहौल गरमा गया है। छात्र संगठनों का कहना है कि जब तक कुलपति माफी नहीं मांगतीं या पद नहीं छोड़तीं, विरोध जारी रहेगा। वहीं कुलपति का कहना है कि उनके शब्दों को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया है। फिलहाल यह मुद्दा शिक्षा जगत और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
अगर आरक्षण को ‘नशा’ कहा जा रहा है, तो सवाल यह भी उठता है कि क्या सदियों तक संसाधनों और शिक्षा पर एकाधिकार की लत सवर्ण समाज को नहीं रही? जिस शिक्षा को कुछ लोग अपनी जागीर समझते आए थे, आज जब उस पर वंचित वर्गों ने अपना हक जताना शुरू किया, तो ‘मनुवादी’ सोच रखने वालों को बुरा लगना स्वाभाविक है। लेकिन इससे यह हकीकत नहीं बदल जाएगी कि ज्ञान और शिक्षा किसी की निजी संपत्ति नहीं है।
यह तो संघर्ष का सिर्फ एक पहलू है, असली लड़ाई तो उस मानसिकता से है जो आज भी बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रही। जब तक हम ‘साथ बैठकर खाना’ खाने को ही समानता मानते रहेंगे और ‘हक’ को ‘खैरात’ समझते रहेंगे, तब तक जातिविहीन समाज का सपना केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा। असली बदलाव तब आएगा जब काबिलियत की परिभाषा में ‘अवसर की समानता’ को भी जगह मिलेगी।



