Buddhist nuns: इस बात पर अक्सर बहस होती है कि बौद्ध धर्म में भले ही बराबरी की बात होती हो लेकिन महिलाओं के साथ भेदभाव बौद्ध धर्म में भी होता है, अभी के समय की सबसे बड़ी बहस तो केवल इसी बात पर है कि महिला बुद्धत्व को प्राप्त कर सकती है या नहीं.. हालांकि बुद्ध के जो विचार थे, वो तो स्पष्ट थे कि मन की अवस्था बुद्धत्व के लिए जिम्मेदार है, मगर जो पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं की बराबरी के खिलाफ रहा उनके लिए इसे स्वीकार करना आसान नहीं है, वहीं ऐसे में महिलाओ को शायद कमजोर और निर्भर दिखाने के लिए ही उनके लिए प्रमुख 8 गुणधर्म बनाये गए.. जिन्हें हर बौद्ध भिक्षुणी को फॉलो करना अनिवार्य है।
जो असल मायने में आध्यत्मिक गुलामी को दर्शाता है, जहां 100 पुरानी भिक्षुणी को एक दिन के बने पुरुष भिक्षु के आगे झुकना पड़े, तो क्या सही मायने में ये 8 नियम महिलाओं को पुरुषो के साथ बराबरी करने से रोकने के लिए ही बनाये गए थे। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे वो 8 नियम, जिसे भिक्षुणी संघ में जाने से पहले हर महिला को मानना पड़ता है साथ ही क्यों इन नियमो को लेकर लगातार जारी है तीखी बहस।
बौद्ध भिक्षुणी के लिए प्रमुख 8 गुणधर्म
जब गौतम बुद्ध की सौतेली मां और उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने बौद्ध भिक्षुणी बनने की आग्रह किया था, तब बुद्द और भिक्षु संघ ने काफी सोच विचार कर महिलाओं को भी बौद्ध भिक्षुणी बनने पर हामी भरी थी, लेकिन उसी के साथ हर भिक्षुणी के लिए प्रमुख 8 गुणधर्म भी बनाये गए थे, जिन्हें हर भिक्षुणी को मानना होगा अन्यथा वो भिक्षुणी नहीं बन सकती है। एक भिक्षु या भिक्षुणी के तौर सबसे पहले सादा जीवन जीना और बाहरी आडंबरो से आकर्षण खत्म होना अनिवार्य है।
बाहरी सुंदरता को नहीं आतंरिक सुंदरता को महत्व दिया जाना जरूरी है और उसके लिए महिला हो या पुरुष, सभी भिक्षुओं को सिर मुंडवाना अनिवार्य है। उसके अलावा 8 नियम महिला भिक्षुणी संघ में शामिल होने वाली महिलाओं के लिए बने।
बौद्ध भिक्षुणी के नियम – Rules of Buddhist Nuns
पहला नियम, भिक्षुणी चाहे किसी भी उम्र की हो, या फिर कितनी भी पुरानी हो, उन्हें नए भिक्षुणी के समान ही समझा जायेगा। यानि की नई हो या पुरानी सभी एक समान ही मानी जाती है।
दूसरा नियम- जब महिला भिक्षुणी संघ 3 महीने के एकांतवास में रहेंगी तो संघ को पुरुष भिक्षु संघ के समीप रहना होगा, ताकि वो पुरुष भिक्षुओं से आध्यात्मिक ज्ञान और अध्ययन में सहायता ले सकें।
तीसरा नियम-हर महीने में भिक्षणी संग को दो बार किसी भी भिक्षु प्रतिनीधि को संघ में बुला कर उनका आदर सम्मान करते है, और वो प्रतिनीधि तय करते है कि उपासिका का उपवास का दिन कौन सा होगा।
भिक्षुणियों का एकांतवास
चौथा नियम- वर्षा ऋतु में भिक्षुओ और भिक्षुणियों क एकांतवास होता है, और एकांतवास के बाद ग्यारवें महीने के पूर्णिमा को सभी भिक्षुणियों को पावन के लिए आना होगा, जिसे बोधिसत्व का पावन दिन माना जायेगा, इस दिन महिला संघ में किसी भी कारण से अगर कोई वाद विवाद खड़ा हो गया हो तो उसका निवारण किया जायेगा, साथ ही भिक्षुणियां अपने आत्ममार्ग के अभ्यास का लेखा जोखा भिक्षु संघ के सामने रखेंगी।
पांचवा नियम- किसी भी भिक्षुणी ने बौद्ध धर्म में भिक्षुणी बनने का कोई भी नियम तोड़ा तो उन्हें सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार करना होगा, ताकि आत्मज्ञान का मार्ग सही से प्रशस्त किया जा सकें।
छठा नियम- जब आध्यत्मिक अभ्यास पूरा हो जायेगा, तब नई भिक्षुणी को पूर्ण भिक्षुणी बनने के लिए सारे वचन संघ के भिक्षु और भिक्षुणियों के सामने ही लेने होंगे।
सातवा नियम- महिला महिला भिक्षुणी किसी भी भिक्षु की निंदा नहीं करेगी।
आठवां नियम- कोई भी नया भिक्षु ही क्यों न हो महिला भिक्षुणी उन्हें किसी तरह का कोई धर्म का ज्ञान नहीं देंगी, और पुरुष भिक्षु भले ही एक दिन पहले ही भिक्षु क्यों न बना हो लेकिन 100 साल की महिला भिक्षुणी को उसे नमन करना होगा।
पुरुष प्रधान धार्मिक संरचना
हर महिला भिक्षु के लिए इन नियमो को मानना अनिवार्य किया गया, हालांकि गौतम बुद्ध के समय में तो महिला भिक्षुओं को सम्मान मिला, संघ का निर्माण हुआ, लेकिन बाद से समय में पितृसत्तात्मक विचारों के कारण महिला भिक्षुओं को सम्मान नहीं मिलता था, जिससे धीरे धीरे महिला भिक्षुणी संघ कमजोर पड़ता चला गया और धीरे धीरे खत्म हो गया, खासकर थेरवाद परंपरा में, जहां पुरुष प्रधान धार्मिक संरचना को महत्व दिया गया, जिससे महिलाओं की दीक्षा को मान्यता ही नहीं दी जाती थी।
वहीं विलुप्त होती महिला भिक्षुणी संघ को फिर से पुर्नस्थापित करने के लिए विनय पटक में कोई भी नियम नही बतायें गए, वहीं थाईलैंड जैसे देश में तो 1928 में महिलाओं के भिक्षुणी बनने पर ही रोक लगा दी गई थी, वहीं 1996 में श्रीलंका में फिर से महिला संघ को स्थापित करने की कोशिश तो की गई लेकिन उसे मान्यता नहीं दी जाती है। मौजूदा समय में केवल पूर्वी एशिया में मौजूद धर्मगुप्तका परंपरा में ही भिक्षुणी संघ जीवित है।
पेरियार ने माना आध्यत्मिक गुलानी
महान समाजसुधारक पेरियार का मानना था कि महिलाओं के लिए ये जो भी नियम बनाये गए असल में उन्हें केवल आध्यत्मिक गुलाम बनाने के लिए बनाये गए थे। बराबरी जैसी कोई अवधारना तो थी ही नहीं, क्योंकि महिला संघ को भी पुरुष भिक्षु संघ के सानिध्य और समर्थन की आवश्यकता अनिवार्य की गई। महिला संघ को हर महीने एक रेगुलर ड्यूटी की तरह पुरुष संघ को रिपोर्ट देनी पड़ती थी, जो असल में पुरुष संघ द्वारा महिला संघ पर अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए ही बनाये गए थे। हालांकि अंबेडकरवादियों का मानना है कि बुद्ध ने ये नियम इसलिए तय किये थे, ताकि पितृसत्तात्मक विचारधारा के लोगो का विरोध न झेलना पड़े, क्योंकि बुद्ध जानते थे।
कि समाज इतनी आसानी से महिला संघ को स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि नियमो के मानने के बाद भी महिला संघ को सम्मान नहीं मिला, जिसके कारण महिला संघ पूरी तरह से समाप्त ही हो गया। मगर हम इस बात को नहीं झुठला सकते है कि बुद्ध ने महिलाओ को सम्मान देने के लिए, उनके आध्यत्मिक मार्ग को प्रशस्त करने के लिए पूरी तरह से कोशिश की थी।



