Therigatha: बौद्ध धर्म में महिलाओं के भिक्षुणी बनने पर काफी विवाद हुआ, महिलाओ के लाखों कोशिशों के बाद उन्हें भिक्षुणी बनने की अनुमति दी गई और भिक्षुणी संघ का गठन किया गया, लेकिन उसी के साथ 8 नियम भी लागू किये गए जिसे भिक्षुणी संघ में शामिल होने वाली हर महिला को मानना होता था, लेकिन फिर भी महिलाओं ने सहर्ष स्वीकार किया, एक भिक्षुणी के तौर पर महिलाओं ने अपने स्वतंत्र विचारों को कविताओं के रूप में व्यक्त किया, जो एक ग्रंथ में संग्रहित किया गया जिसे बौद्ध धर्म में थेरीगाथा कहा जाता है। अपने इस लेख में हम थेरीगाथा के बारे में बतायेंगे जिसे एक ग्रंथ कहा गया जहां बौद्ध भिक्षुणी ने अपनी आजादी का जश्न मनाया है।
थेरीगाथा छोटी कविताओं का एक बौद्ध कलेक्शन
थेरीगाथा एक पाली भाषा में लिखी हुई किताब है, थेरी का मतलब होता है भिक्षुणी और गाथा का मतलब होता है उनकी कहानी.. यानि की भिक्षुओं की कहानी। अमूमन थेरीगाथा में उन भिक्षुणियों के विचार संग्रहित है जो सीनियर हो चुकी थी। थेरीगाथा, असल में सीनियल भिक्षुणी जिन्हें आप बड़ी उम्र वाली नन कह सकते है, वो कविताओं के जरिए अपनी जीवन यात्रा को बताती थी, थेरीगाथा छोटी कविताओं का एक बौद्ध कलेक्शन है, जो कि कैनोनिकल बौद्ध साहित्य के डेवलपमेंट के बाद लिखी गई थी, जिसमें से कुछ तीसरे ईसापूर्व की भी है।
पाली कैनन में मौजूद सुत्त पिटक में थेरीगाथा को छोटी किताबों के कलेक्शन खुद्दक निकाय का एक छोटा सा हिस्सा माना गया है। थेरीगाथा असल में थेरगाथा का ही स्त्री रूप कहा जाता है, थेरगाथा जिसमें सीनियर भिक्षुओं के छंद हैं, उसी तरह से थेरीगाथा में सिनियर भिक्षुणियों के छंद मौजूद है।
बौद्ध भिक्षुणियों की रचनाओ
जिसमें 16 चैप्टर में 73 कविताएँ हैं, यह पहला बौद्ध महिलाओं के साहित्य का लिखित कलेक्शन है। थेरीगाथा में प्रजापति, नंदा या अंबपाली के नामों का जिक्र किया गया है, जो विनय और गोतम बुद्ध के जीवन से ज्ञात रचनाओं को संग्रहित करते है, हालांकि देखने में ये बेहद साधारण रचनायें ही है लेकिन बौद्ध भिक्षुणियों की रचनाओ के नामों के कारण इन्हें ज्यादा पहचान मिली थी, लेकिन इस बात के भी प्रमाण नहीं है कि थेरीगाथा में मौजूद रचनायें वाकई में संघ की सीनियर ननों द्वारा ही की गई थी।
थेरीगाथा का अवलोकन – Overview of Therigatha
थेरीगाथा को असल में पहली बार मगधी भाषा में मौखिक रूप से रची गई थीं, लगभग 80 ईसा पूर्व तक मौखिक रूप से पारित की गईं, लेकिन बाद में उसे पाली भाषा में लिखित रूप दिया गया। जिसमें 101 अलग-अलग ननों के बारे में बात की गई है, हालंकि पहचान केवल 73 की ही की जा सकती है। जिनकी करीब 552 गाथायें शामिल है।
हालांकि महिलाओं को बौद्ध काल में ही काफी क्रिटिसाइज किया गया था। बौद्ध भिक्षुणी के लिए पहले तो उन्हें योग्य ही नहीं माना गया, फिर “शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से पुरुषों की तुलना में कमज़ोर, कम बुद्धिमान और अधिक कामुक” दिखने के बाद भी महिलाओं को पुरुषो से बेहतर माना गया, खासकर भिक्षु संघ को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए आम महिलाओं की भूमिका अहम मानी गई। पुरूष ये मानते थे कि वो महिलाओं जो अपनी जिम्मेदारी निभा रही है वो भिक्षुणियो श्रेष्ठ है, जो सब कुछ त्याग करके वैराग्य को अपना लेती है।
बाहरी आडंबर के लिए कोई स्थान
लेकिन वहीं नन सुभा के वृतांत में महिल ननों की वैराग्य प्रति जो दृढ़ता रही उसने उन्हें इतना महान बनाया है, जहां एक बदमाश ने भिक्षुणी की आंखो की तारीफ की तो भिक्षुणी ने अपनी आंखो ही निकाल कर दे दी.. जो गवाह है कि वो अपने शारीरिक मोह से आजाद होकर आध्यत्म के उस रास्ते पर चल चुकी है, जहां बाहरी आडंबर के लिए कोई स्थान, कोई मोह ही नहीं बचा है। ज्ञान में अलगाव के अंतिम लक्ष्य का उदाहरण भी है।
थेरीगाथा में लिखी रचनाये सबूत है कि आध्यात्मिक कामयाबी के मामले में महिलाएं पुरुषों के बराबर ही है। थेरीगाथा शुरुआत की बौद्ध ननों की भावनाओं का संग्रहण है, जिन्हें सामाजिक दायरो में बंध कर किसी के आधीन रह कर जीने से ज्यादा बेहतर भिक्षुणी बन कर आधयात्म की राह पर चलना अच्छा लगा। ज्ञान प्राप्त करने के बाद महिलाओ को कैसा महसूस हुआ, उनके आनंद की गाथा है, जो आजादी उन्होंने बौद्ध नन बन कर महसूस की थी वो उन्होंने गृहस्थ जीवन में रह कर महसूस नहीं की थी।
महिलाओं की आजादी का पहला ग्रंथ
अपने नन बनने के बाद के अनुभव और आनंद के संग्रहण को ही थेरीगाथा में संग्रहित किया गया है। जिसे महिलाओं की आजादी का पहला ग्रंथ कहा जा सकता है क्योंकि इसमें महिलाओं के अपने नीजि विचार और अनुभव शामिल है। थेरीगाथा बौद्ध काल में महिलाओं की स्थिति और भिक्षुणी बनने के बाद उनके जीवन, और विचारों में आये बदलवा को बहुत खूबसूरती से बताया गया है शायद इसलिए ही थेरीगाथा को आजाद सोच की महिलाओं का संग्रहण माना जाता है। जिसे आज भी बौद्ध धर्म में काफी मान्यता दी गई है। भले ही आज के समय में महिला संघ का पतन हो गया है लेकिन थेरीगाथा बताता है कि बौद्ध काल में बुद्ध ने महिलाओ को वैचारिक आजादी दी थी। आपकी इस पर क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।



