Ambedkar’s Knowledge of Languages: बाबा साहब भारत के सबसे शिक्षित व्यक्ति में से थे। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी पढ़ाई के दम पर 32 डिग्रियां हासिल की थी। उन्होंने अमेरिका और लंदन में जाकर शिक्षा हासिल की.. और वो एक महान वकील, अर्थशास्त्री बन कर वापिस भारत लौटे थे।
लेकिन क्या आप ये जानते है कि यहीं बाबा साहब केवल 32 डिग्रियों के ज्ञाता नहीं थे बल्कि उन्हें भारतीय औऱ विदेशी भाषाओं को मिलाकर करीब 9 भाषाओं का ज्ञान था। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि वो कौन कौन सी भाषायें थी.. साथ ही कैसे इन भाषाओं के ज्ञान के कारण वो बौद्ध धर्म के करीब पहुंच पायें थे.. जिसने उन्हें बौद्ध धर्म चुनने में सबसे ज्यादा मदद की थी।
दलितो और पिछड़ो का सबसे ज्यादा तिरस्कार
बाबा साहब अंबेडकर का जन्म तो वैसे मध्य प्रदेश के महू में हुआ था, लेकिन वो महाराष्ट्रिय पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते थे। खासकर जब वो 2 साल के थे तो वो उनके पिता उन्हें लेकर मध्य प्रदेश से वापिस महाराष्ट्र आ गए थे, जो कि मराठी भाषी राज्य है। इसलिए मराठी भाषा पहली भाषा थी जिसे बाबा साहब ने सीखा था..इसके अलावा बाबा साहब ने हिंदी सिखी और आगे की पढ़ाई के लिए सबसे जरूरी इंग्लिश भाषा सीखी थी। वो जानते थे कि शूद्र होने के कारण संस्कृत का ज्ञान न होने के कारण ही हुआ है, उनका शोषण किया गया, इसलिए धार्मिक ग्रंथो को समझने और पढ़ने के लिए बाबा साहब ने संस्कृत, फारसी और पाली भाषा सीखी थी।
21 साल की उम्र में सभी धर्म ग्रंथो का अध्ययन
कहा जाता है कि बाबा साहब ने 21 साल तक दुनिया के लगभग सभी धर्म ग्रंथो का अध्ययन कर लिया था। उन्हें पढ़ने की जैसी कोई बीमारी थी, अपनी कोलंबियां यूनीवर्सिटी में पढ़ने के दौरान उन्होंने 4 सालो में करीब 2000 किताबें खरीदी थी, इसके अलावा उन्होंने विदेश में अपनी शिक्षा के दौरान अपनी थिसिस औऱ पीएचडी की डिग्री को पूरा करने और उनपर विस्तृत रिसर्च के लिए उन्होंने फ्रेंच भाषा और जर्मन भाषा सीखी थी।
बाबा साहब का ब्रेन इतना शार्प था कि उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से जो कोर्स 8 साल की था उसें मात्र 2 साल 3 महीने में पूरा कर लिया था। जो कि उनकी भाषाओं के ज्ञान के कारण ही संभव हो पाया था। लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से बाबा साहब ने डॉक्टर ऑफ साइंस की पीएचडी की डिग्री पाने वाले वो पहले व्यक्ति थे। बाबा साहब की प्रसिद्धि कोई अचानक नहीं बनी थी.. उसके लिए उनकी सालों की कड़ी मेहनत औऱ तपस्या शामिल है।
कैसे बौद्ध धर्म और बुद्ध से जुड़ा लगाव
बाबा साहब जानते थे कि किसी धर्म को, या किसी विषय के बारे में गहीनता से जानना है, उसे समझना है तो उसी भाषा में समझा जा सकता है। इसलिए बाबा साहब जब धर्मों का अध्ययन कर रहे थे तब उन्होंने उन्होंने बौद्ध धर्म को समझने के लिए बौद्ध धर्म ग्रंथो की भाषा पाली सीखी थी। हम सभी जानते है कि बुद्ध की भाषा और उनके धर्मग्रंधो की भाषा पाली ही थी.. बुद्द के सभी अपदेश पाली में ही है।
जिस कारण बाबा साहब ने पहले पाली सीखी औऱ फिर बुद्ध और बौद्ध धर्म को पढ़ना और समझना शुरु कर दिया। धीरे धीरे उन्होंने जाना कि बुद्ध का रास्ता कैसे आपको सम्मान से जीवन जीने की प्रेरणा देता है, जो जाति व्यवस्था पर नहीं बल्कि कर्म प्रधान को मान्यता देता है.. बाबा साहब ने बौद्ध धर्म को और करीब से जानने का फैसला किया.. उन्होंने अपनी रिसर्च को एक किताब का रूप दिया- बुद्ध एंड हिज धम्मा।
हिंदू धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म को अपनायेंगे
बाबा साहब ने किताब लिखते समय ही ये तय कर लिया था कि वो हिंदू धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म को अपनायेंगे, लेकिन बुद्ध भिक्षुओं के सामने उन्होंने शर्त रखी थी कि वो पहले किताब को पूरा करेंगे, फिर बौद्ध धर्म अपनायेंगे। लेकिन तब शायद उन्हें ये नहीं पता था कि उनका ये फैसला कितना बड़ा बदलाव ला सकता है। उनके साथ लाखों लोग धर्म बदल लेंगे। बाबा साहब समानता और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे थे, उसके लिए अगर हिंदू धर्म छोड़ना भी पड़े तो कोई मलाल नहीं है।
बाबा साहब की लड़ाई और उनके धर्म परिवर्तन करने के फैसले से सभी वाकिफ थे.. और सामूहिक रूप से करीब पौने चार लाख लोगो ने धर्म बदल कर बौद्ध धर्म अपनाया था। ये ऐतिहासिक फैसला था.. बाबा साहब के भाषाओं के ज्ञान और उनकी बौद्धिक ज्ञान ने साबित कर दिया था कि व्यक्ति अगर चाहे तो कुछ भी हासिल कर सकता है और जिसे हासिल न की जा सकें, उसे जाने देना बेहतर। बाबा साहब की शिक्षा और भाषाओं के ज्ञान के कारण ही वो सबसे अलग शख्सियत कहलाये..जिन्हें पूरी दुनिया के लोग पूजते है।



