डॉ. अंबेडकर ने क्यों कहा कि 24 सितंबर 1932 को उनसे हुई थी महाचूक? जानें पूरा सच। Poona Pact

Poona Pact Mahatma Gandhi vs Ambedkar,
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Poona Pact: 24 सितंबर 1932 की तारीख वो तारीख है जब मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती मैंने की थी, ये बोल है भारत रत्न बाबा साहब भीम राव आंबेडकर के। जी हां, बाबा साहब जिन्होंने कभी भी अपने किसी फैसले पर पछतावा नहीं किया, चाहे वो एक मृत बेटे को छोड़कर लन्दन जाना हो या फिर पढ़ने के लिए पूरे समाज से लड़ना हो। चाहे हिन्दू धर्म छोड़कर कर बौद्ध अपनाना हो या फिर मनुस्मृति जलाना हो, बाबा साहब ने अपने जीवन में ऐसी कोई गलती नहीं की जिससे उन्हें पछतावा हो, लेकिन बावजूद इसके वो मानते थे कि उनके जीवन में एक गलती ऐसी हुई थी जिसके कारण उन्हें आजीवन पछतावा हुआ, अगर वो गलती न की होती तो शायद आज दलितों की स्थिति अलग होती।

लेकिन केवल राष्ट्रपिता महात्म गांधी की सुरक्षा के लिए बाबा साहब को वो जहर का घूंट पीना पड़ा जिसमें पूरे दलित समाज के सपने जल गए। तब पहली बार बाबा साहब की आंखों में भी आंसू आ गए थे, लेकिन वो चाह कर भी उस गलती को होने से रोक नहीं पाए थे। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि आखिर वो कौन सी गलती थी बाबा साहब की जिसके बारे ने बाबा साहब ने खुद बात की है, और क्यों बाबा साहब इस गलती को सुधारना चाहते थे। क्या हुआ था ऐसा इस तारीख पर, जिसका अफसोस बाबा साहब को मरते दम था रहा था। क्या गलती हुई थी बाबा साहब से।

दलितों को सामाजिक बराबरी के लिए उत्थान

बाबा साहब ने दलितों को सामाजिक बराबरी देने के लिए और उनके उत्थान के लिए अनगिनत कदम उठाए। वो दलितों के लिए आजीवन लड़ते रहे थे, लेकिन इस लड़ाई को मजबूती देने के लिए 1909 की ही तरह जिस तरह से मुसलमानों को अलग निर्वाचन क्षेत्र दिया गया वैसे ही बाबा साहब ने दलितों को भी अपना प्रतिनिधि चुनने और एक जनप्रतिनिधि चुनने के अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की थी। उस वक्त गांधी जी पूना के यरवदा जेल में थे। अंग्रेजी हुकुमत ने बाबा साहब की मांग को मान भी लिया था लेकिन गांधी जी ने जेल में रह कर भी बाबा साहब के इस सपने को तोड़ने की चाल चल ली थी।

जो भी बाबा साहब को जानता है वो ये जरूर जानते होंगे कि भले ही दुनिया के लिए गांधी जी महात्मा हो, राष्ट्रपति हो, लेकिन बाबा साहब ने उन्हें कभी भी महात्मा नहीं माना.. बाबा साहब उन्हें मिस्टर गाँधी कहते थे, उनका मानना था कि गाँधी जी असल में बहुत ही पहुंचे हुए और चालाक शातिर राजनेता थे। बाबा साहब गांधी जी के दलितो को हरिजन कहने और दलितों के प्रति जो सहानुभूति गांधी जी दिखाते थे उसे ढोंग मानते थे। गांधी वर्ण व्यवस्था को सपोर्ट करते थे, और उसे बनाये रखने के लिए, उसे न्याय संगत बताने के लिए गहरी चाल चली थी। बाबा साहब साफ कहते थे कि जो उनके बीच का हो वहीं उनकी स्थिति को अच्छी से समझ पायेगा।

पूना पैक्ट को क्यों मानते है सबसे बड़ी गलती

24 सितंबर 1932… के दिन पूना का यरवड़ा जेल एक अजीब सी शांति में घिरा हुआ था, सामने थे अपने आंदोलनों से अंग्रेजी हुकुमत को झुकाने वाले महात्मा गांधी और उसके दूसरे तरफ खड़े थे बाबा साहब अंबेडकर.. एक तरफ गांधी मानते थे कि वर्ण व्यवस्था समाज की अहम नीव है, और ये बनी रहने चाहिए लेकिन बाबा साहब इसे दलित उत्पीड़न का सबसे बड़ा कारण मानते थे, बाबा साहब जानते थे कि वो इस व्यवस्था को खत्म तो नहीं कर पायेंगे तो क्यों न ऐसी व्यवस्था तैयार की जाये जिससे दलित स्वयं में मजबूत होने लगे.. इसके बाबा साहब 1931 में लंदन में आयोजित हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में दलितो की स्थिति को ब्रिटिश सरकार के सामने जाहिर करने पहुंचे थे।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड

इस दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के सामने बाबा साहब दलितो की स्थिति वास्तविक कंडीशन का ब्यौरा पेश किया और अलग निर्वाचन मंडल की मांग की। चुंकि यह सम्मेलन भारतीय संवैधानिक सुधारों पर चर्चा करने के लिए आयोजित किया गया था, लेकिन ये सम्मेलन बेनतीजा रही थी, लेकिन बाबा साहब के मुद्दे पर तत्कालीन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने उनकी बातों पर विचार करने का फैसला किया था। 16 अगस्त 1932 को, ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक पुरस्कार की घोषणा की, जिसके तहत पिछड़े लोगो को अलग निर्वाचन देने की मांग को मंजूरी दे दी गई थी।

य़रवड़ा जेल में आमरण अनशन

उससे पहले मोर्ले-मिंटो सुधार जो कि1909 में और मोंटेगु-चेम्सफोर्ड सुधार 1919 में लागू करके पहले ही अलग निर्वाचन क्षेत्र देकर लागू की जा चुकी थी, इसलिए इसे तीसरी बार लागू करना कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन जहां बाबा साहब सांप्रदायिक पुरस्कार का समर्थन कर रहे थे तो वहीं महात्मा गांधी इसके कट्टर विरोधी थे, उन्होंने दलील दी कि इससे हिंदू धर्म में ही बंटवारा हो जायेगा और राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने की साजिश करार दिया था,  और वो इसके विरोध में य़रवड़ा जेल में आमरण अनशन पर बैठ गए। बाबा साहब किसी कीमत में ये पुरुस्कार चाहते थे, लेकिन उन पर गांधी जी को बचाने का दवाब डाला गया और जब पूना पैक्ट की नींव रखी गई।

शैक्षिक अनुदान का एक हिस्सा निर्धारित

24 सितंबर 1932 की तारीख के दिन, गाँधी जी, बाबा साहब, मदन मोहन मालवीय समेत 23 लोग जेल में मौजूद थे और तब अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग को खत्म करते हुए पूना पैक्ट साइन किया गया.. जिसके आधार पर  विधानमंडल में दलित वर्गों की सीटों को दोगुना करके 80 से 147 कर दी गई थी। इसके अलावा शैक्षिक अनुदान का एक हिस्सा निर्धारित किया गया। इसके अलावा सार्वजनिक सेवाओं में भी उचित प्रतिनिधित्व को महत्ता देने की बात स्वीकार की गई। पूना पैक्ट ने दलितो को अलग एक शक्ति तो दी थी, लेकिन फिर भी बाबा साहब इससे कभी संतुष्ट नहीं हुए थे।

बाबा साहब ने माना कि ये एक मजबूरी में लिया गया फैसला था, इससे दलित राजनीतिक रूप से मजबूत होने के बाद भी सवर्णो के गुलाम ही रहे, वो संयुक्त  निर्वाचन क्षेत्र के कारण सवर्णों की हाथो की कठपुतली बन कर रह गए। पूना पैक्ट से कारण दलितों के लिए जो मजबूती हासिल की जा सकती है.. वो कमजोर हो गई.. पूना पैक्ट को लेकर उन्हें और ज्यादा विचार करना चाहिए था। बाबा साहब ने कहा कि वो अपने लोगो को राज्यसत्ता का हिस्सा चाहते थे लेकिन उन्हें कुछ सीटें बढ़ा कर दे दी गई.. जो किसी धोखे की तरह था। दलित फिर से सवर्णों के अधीन हो गये… जिसे बाबा साहब अपनी सबसे बड़ी गलती मानते है।

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