BNS Section 335: झूठा दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाने की कानूनी व्याख्या, जानिए क्या होगी सज़ा

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335 BNS in Hindi: कई बार ऐसी खबरें आती हैं कि किसी के घर के कागज़ नकली बनाकर सरकारी रिकॉर्ड में दिखा दिए गए हैं, या एडमिशन लेने के लिए नकली मार्कशीट बना ली गई है। तो कभी सोचा है कि ऐसे मामले में BNS की कौन की धारा लगती है और ऐसे मामले में किस तरह की सज़ा होगी? तो आपको बता दें, ऐसा करने पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 334 लागू होती है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि ऐसा करने पर कितने साल की सजा का प्रावधान है और बीएनएस (BNS) में इसके के बारे में क्या कहा गया है।

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धारा 335 क्या कहती है? BNS Section 335 in Hindi

जैसा कि आप जानते हैं कि अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग अधिनियम और दंड हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीएनएस (BNS) की धारा 335 क्या कहती है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं। भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 335 उस व्यक्ति पर लागू होती है, जो बेईमानी से या धोखा देने के इरादे से, कोई डॉक्यूमेंट, सिग्नेचर, सील या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाता है। इसका मकसद यह इंप्रेशन बनाना है कि किसी और ने (जिसके पास असल में ऐसा करने का अधिकार नहीं था) डॉक्यूमेंट बनाया है, लेकिन उसने अपना असली काम दिखाने के लिए नकली डॉक्यूमेंट बनाए हैं।

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BNS section 335 important points 

  • आपको बता दें, पहले यह धारा IPC 464 थी। जिसे अब BNS 335 के नए नियमो के साथ लागू किया गया है।
  • अगर कोई व्यक्ति जानता है कि दूसरा व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर है या नशे में है और फिर भी उससे साइन करवाता है, तो यह भी इसी सेक्शन के तहत आता है।
  • यह सेक्शन मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक फ्रॉड करने वालों पर लागू होता है।

BNS section 335 example

मान लीजिए रोहित नाम के एक आदमी ने मोहित से अपने घर की रजिस्ट्री करवाने के लिए कहा लेकिन कागज़ात पूरे न होने की वजह से घर की रजिस्ट्री नहीं हुई, लेकिन मोहित ने नकली स्टाम्प, नकली साइन या नकली कागज़ात बनाकर यह काम किया, वही जब मामले की जांच हुई तो वह दोषी पाया गया और आरोपी के खिलाफ यह सेक्शन लागू हुआ।

बीएनएस धारा 335 की और सजा

इसके अलावा, BNS की धारा 335 यह तब लागू होती है, जब कोई व्यक्ति जानबूझकर इलेक्ट्रॉनिक फ्रॉड करता है। तो इस सेक्शन के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपी को crime करने पर कैद और जुर्माना होता है। आपको बता दें, यह एक गैर-संज्ञेय (non-cognizable) अपराध है, इसलिए पुलिस को जाँच के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति चाहिए होती है। इस अपराध में जमानत मिलना भी काफी मुश्किल हैं। वही पुलिस इस अपराध के लिए बिना वारंट के भी आरोपी को गिरफ्तार कर लेती है।

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