Jammu Kashmir news: हाल ही में जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट से एक अहम खबर सामने आई। एक अहम फैसले में, कोर्ट ने कहा कि बिना किसी बेइज्जती के इरादे से लिए गए जाति के नाम SC/ST एक्ट के तहत नहीं आते हैं।
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
दलितों का अपमान करना, उनके साथ भेदभाव करना, उन्हें जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित करना सदियों से चला आ रहा है। इतना ही नहीं, मनुवादी सोच वाले लोग दलितों को उनकी जाति के नाम पर गाली देकर भी अपमानित करते हैं। लेकिन जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने इस मामले में ऐतहासिक निर्णय लिया है दरअसल,जम्मू कश्मीर में लगातार ये मुद्दा उठाया जा रहा है कि सरकार के साथ साथ न्याय पालिका भी एससी एसटी एक्ट को कमजोर करने की साजिश में लगी है, वो लगातार इस कानून पर नए नए बेतुके फैसले सुना रही है। इसी कड़ी में अब जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने एससी एसटी एक्ट (SC-ST Act) को लेकर एक फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल जाती का नाम लेने से , या एससी एसटी समुदाय के व्यक्ति को गाली देने से वो इस एक्ट में शामिल नहीं होगा।
जाति का नाम लेना हमेशा अपराध नहीं
कोर्ट ने कहा कि उसके लिए आरोपी की सार्वजनिक जगह पर जाति के नाम पर गाली दी गई हो.. जिसके कई चश्मदीद होने चाहिए.. तभी वो इस एक्ट के अंतर्गत अपराध होगा। बता दें कि ये मामला डोडा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले कास्तीगढ़ में एक सड़क उद्घाटन समारोह में शिकायतकर्ता पर हमला किया था और मेघ समुदाय होने के कारण उसे चिनल जैसे जातिसूचक शब्दो से बुलाया गया था।
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लेकिन कोर्ट ने इस अपील को खारिज करते हुए एसे एससी एसटी एक्ट से बाहर करते हुए कहा कि चूंकि “चिनल” शब्द जम्मू और कश्मीर अनुसूचित जाति आदेश, 1956 में शामिल ही नहीं है, इसलिए इसे जाति का नाम नहीं कहा जा सकता। वहीं केवल एक नाम लेने से ये अपराध नहीं हो सकता है।
हैरानी की बात है कि कानून उन शब्दों को भी जातिसूचक नहीं मानता है जो संविधान में दर्ज नहीं है लेकिन सदियों से दलितों और पिछड़ों के लिए इस्तेमाल किये जा रहे है। ये केवल इशारा है कि कोर्ट भी जातिवादी आतंकियों को आजादी दे रही है कि जो संविधान में नहीं है आप उन नामों से अपमान कर सकते है.. और आजाद घूम भी सकते है। तो भला कैसे ये कानून दलितों और पिछड़ो के लिए सहायक होगा। जवाब आप खुद सोच कर बताइयें।



