बाबा साहब क्यों मानते थे कि बिना समानता के लोकतंत्र अधूरा है? जानिए उनकी दूरदर्शी सोच

Baba Saheb Ambedkar
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Ambedkar’s views on democracy: भारत रत्न बाबा साहब आंबेडकर की दूरदर्शी सोच को लेकर पहले भी कई बार चर्चा की जा चुकी है। जिस तरह का संविधान बाबा साहब ने भारत की जनता को दिया, वो केवल बाबा साहब ही कर सकते थे। ये संविधान सभा में बैठा हर एक व्यक्ति जनता था कि अगर भारत जैसे विशाल देश को सुचारू रूप से चलाना है तो बाबा साहब जैसे महान शख्सियत ही इस जिम्मेदारी को निभा सकते है।

बाबा साहब ने लोकतंत्र देश के लिए जो विचार रखे वो इस बात का सबूत थे कि केवल वही एक भेदभाव से हटकर बराबरी की नींव वाला संविधान बना सकते है। उन्होंने भारत को सबसे बड़ा लोकतंत्र केवल इसी लिए बनाया कि ताकि देश में समानता उत्पन्न हो… भेदभाव को खत्म करके सबको बराबरी का संदेश दिया.. और लोगो के अधिकारो की रक्षा करने वाले क्लॉजेस भी बनायेँ। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि बाबा साहब क्यों लोकतंत्र के लिए समानता को आधार मानते थे। क्या सोचते थे बाबा साहब लोकतंत्र और समानता को लेकर।

लोकतंत्र को लेकर बाबा साहब के विचार

हम सभी जानते है कि लोकतंत्र एक ऐसी सत्ता है, जिसमें ताकत उस देश की जनता के हाथों में होती है। देश का प्रतिनीधि जनता के हाथों से तय होता है, जो सबूत है देश में राजनीतिक समानता की, अभिव्यक्ति की आजादी की, और नियमित, स्वतंत्र तथा निष्पक्ष कानून व्यवस्था और चुनाव व्यवस्था की। बाबा साहब ने संविधान के माध्यम से दलितों और पिछड़ो को न केवल लोकतंत्र में एक मजबूत ताकत दी थी बल्कि पहचान भी दी। लोकतंत्र के कारण दलित पिछड़े किसी एक सीमा में बंधे नहीं रहे जिससे उन्हें सामाजिक-आर्थिक उन्नति का एक मजबूत रास्ता मिला था।

लोकतंत्र व्यवस्था पर विचार

जनता के हाथों में ताकत देकर उन्होंने ये भी सुनिश्चित कर दिया कि जाति, सामाजिक दर्जे की परवाह किये बिना सभी जाति धर्म के लोग एकमत होकर अपना प्रतिनीधि चुने.. जिसमें जातिगत असमानता आड़े न आये। बाबा साहब को भले ही ये नहीं पता था कि भविष्य में वो देश को सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाने की नींव रखने वाले है लेकिन लोकतंत्र व्यवस्था पर विचार उन्होंने पहली बार 1917 में ही साउथबोरो समिति’ (या मताधिकार समिति) के सामने अपनी गवाही देकर व्य़क्त कर दिये थे। इस गवाही में ही बाबा साहब ने साफ कहा था कि सामाजिक उत्थान के लिए और मजबूत लोकतंत्र के लिए जरूरी नींव है कि दलितों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सशक्तिकरण काफी मजबूत होना चाहिए। तभी उन्होंने विधायी निकायों में आरक्षित सीटों की मांग की।

बौद्ध का धम्म ही लोकतंत्र और बराबरी का संदेश देता

बाबा साहब ने 1935 में छपी उनकी किताब “जाति का विनाश” (The Annihilation of Caste) में में भी लोकतंत्र को एक ऐसी सहभागी जीवन शैली का हिस्सा बताया जहां सबके अधिकार बराबर हो। इसे ही वो लोकतंत्र का दूसरा आधार मानते थे। बाबा साहब मानते थे कि हिंदू धर्म में ऐसा संभव ही नहीं है इसलिए बौद्ध का धम्म ही लोकतंत्र और बराबरी का संदेश देता है। बाबा साहब बराबरी को लेकर कहते थे कि एक संपूर्ण लोकतंत्र तभी संभव है जब केवल ऊपरी तौर पर ही नहीं बल्कि आतंरिक तौर पर भी समानता हो.. ये समानता केवल सामाजिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी होनी चाहिए।

राजनीतिक लोकतंत्र के लिए जरूरी है

बाबा साहब कहते थे कि जब तक देश में जातिवाद मौजूद है, कोई कितने भी बदलाव की कोशिश कर ले, संपूर्ण लोकतंत्र नहीं हो सकता। जाति व्यवस्था को खत्म किये बिना लोकतंत्र संभव नही है.. राजनीतिक लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि सामाजिक लोकतंत्र अनिवार्य है, तभी एक ऐसे समाज की नींव रखी जा सकती है जहां स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को अहमियत दी जाती हो। जातिगत भेदभाव को खत्म करते दलितों और पिछड़ो को भी सामाजिक औऱ राजनैतिक तौर पर बराबरी की भागीदारी देना अनिवार्य है। बाबा साहब कहते थे कि समानता औऱ स्वातंत्रता एक ही सिक्के के दो पहलू है। स्वतंत्रता न होने पर समानता की नींव ही हिल जाती है।

सामाजिक रूप से शसक्त बनाने के लिए आरक्षण

गरीब और पिछड़े और गरीब हो, औऱ अमीर पूंजीपति और अमीर हो.. तो फिर लोकतंत्र के कोई मायने नहीं है। जरूरी है कि सरकार को ऐसे कदम उठाने होंगे ताकि दलितों औऱ पिछड़ो को सम्मान से जीने का अधिकार मिले.. बाबा साहब ने भले ही दलितों औऱ पिछड़ो को आर्थिक और सामाजिक रूप से शसक्त बनाने के लिए आरक्षण दिया हो लेकिन अब ये कोई ताकत नहीं बल्कि हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है, और वो भी दलितों के खिलाफ ही। चाहे कितनी भी कोशिश की जाये बराबरी करने की.. लेकिन तब तक लोगो के विचारों में परिवर्तन नहीं आता तब तक लोकतंत्र औऱ समानता पूरी तरह से एक साथ नहीं आ सकते है।

सच तो ये है कि अंबेडकर समाज में पिछड़ो और कमजोर वर्गो को सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूती देने के साथ साथ राजनैतिक रूप से भी ताकतवर देखना चाहते थे। वो एक ऐसे समाज ऐसे देश को चाहते थे जहां धर्म,  जाति और वर्गों के भेदभाव से हटकर समतावादी समाज को सर्वोपरि माना जाता हो।

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